शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

सीप सा होना चाहती हूँ ......




सीप यूँ तो अक्सर ही  
मोती सहेजे रखती है 
अपने दामन में बरबस 
उसकी चमक संजोये 
अनजानी उम्मीदें जगा 
इंद्रधनुषी रंग सजा 
संजीवन जीवंत हो जाती है 
पर  …
कभी - कभी 
जानी पहचानी प्यास जगा 
सीप नि:शब्द रह जाती है 
मोती तलाशते स्पर्श 
रूखे सन्नाटे की 
रिक्ति विरक्ति में 
दामन रीता ही पाते हैं 
और हाँ !
सीप और मोती 
अलग रहने पर भी 
दूर कहाँ हो पाते हैं 
सीप की गोद सहेजे रहती है 
मोती की चमक 
मोती भी तो सराहता है 
सीप की दुलराती छाँव 
बस यूँ ही 
बरसती बूँदे देख - देख 
मन बावरा बहक गया 
सीप को खोजते - खोजते 
धड़कन में मोती सा दमक गया  …… निवेदिता