शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

पत्र मुहावरों से भरा

 


ऐ #कलम_के_धनी मेरे मन !

अकसर ही तुमको बोल देती थी कि #तीन_पाँच_मत_करो और तुम जो बोलनेवाले होते थे उसको #गूंगे_के_गुड़ जैसा अनुभव करते #चुप्पी_साध_लेते थे और मेरे मन के बिखराव को अपने #अंक_में_समेट मुस्करा देते । मैं तो बहुत बाद में समझ पायी थी कि इस #रंग_बदलती_दुनिया में इस तरह #अक्ल_के_घोड़े_दौड़ाना या #अरण्य_रूदन करना व्यर्थ है क्योंकि सभी #अपनी_खिचड़ी_अलग_पकाना चाहते हैं । यह समझने में मुझे बहुत समय लग गया कि उनकी मुँहदेखी करती बातों के पीछे उनका मतलब सिर्फ #अपना_उल्लू_सीधा_करना ही था । मतलब निकल जाने के बाद उनकी #अंगारे_उगलती बातें सुन कर मेरी समझ तो जैसे #घास_चरने ही चली जाती थी ।


परन्तु जानते हो मैं भी बिलकुल #अड़ियल_टट्टू की तरह #अंगारों_पर_पैर_रखते_हुए ही फिर उनको समझाने का प्रयास करने लगती हूँ ... इस पूरी रस्साकशी में मुझे #अँगूठी_में_नगीने सरीखे साथी मिले ,जिन्होंने #अंधा_बनाने वालों के समक्ष मुझ #अल्लाह_मियाँ_की_गाय सरीखी कलम का साथ दे कर उनके लिये #अंगूर_खट्टे कर दिये । 


और पता है दोस्त ! इन चन्द नगीनों का साथ मेरा मनोबल इतना बढ़ा गया कि #अपने_अड्डे_पर_चहकने वाले #मुँह_की_खाने लगे और मैं #अपनी_खाल_में_मस्त रहने लगी । अब न जाने कितनी अठखेलियाँ सूझती हैं कि जब जहाँ का  #अन्न_जल_बदा_होगा वहीं हम #अर्श_से_फर्श तक का जीवन जियेंगे । #आग_पर_तेल_छिड़कने वाले लोगों से दूर हो उनका साथ ही करना चाहिये जिनकी प्रवृत्ति ही #आग_पर_पानी_डालने की हो ,बाकी #आँख_पर_पड़ा_पर्दा तो समय हटा ही देता है ।


अब तक के जीवन में इतना तो समझ ही गयी हूँ कि कितना भी #आटा_गीला हो जाये #आँखें_तरेरने वालों के न सोच कर #आकाश_पाताल एक कर सब कुछ #आँचल_में_बाँधना ही श्रेयस्कर है । #"आस्तीन में साँप" को पालना तो #"आग पानी को साथ" रखने जैसा ही है ,जो ध्यान न देने पर #"आठ - आठ आँसू" रोना पड़ता है ।


#"इधर -उधर की बात" करने से तो अच्छा है #"इतिश्री" करना ,क्योंकि #"इज्जत उतारना" तो सब जानते हैं ,परन्तु यह तो हमको ही बताना होगा कि #"इन तिलों में तेल" नहीं जिससे वो #"अपना उल्लू सीधा" कर सकेंगे ।


अब सोचती हूँ कि तुमसे ही #"दिल हल्का" कर लिया करूँगी और सुनो ! तुम #"ईद का चाँद" मत बन जाना । तुमसे बातें करते ही #"उन्नीस - बीस करती ज़िंदगी के #"काले बादल" न जाने कहाँ #"उड़नछू" हो जाते हैं । 


"राम - सलाम" करती रहना और मेरे मनोबल की रीति पड़ती "गागर में सागर" भर जाना ... तुम्हारी "किताबी कीड़ा" 'निवी'

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

#अतिथि_एक_दिन_का ( हिंदी दिवस )



#अतिथि_एक_दिन_का ( हिंदी दिवस )


अच्छी भली सो रही थी और सपनों में ,पर्वतों के पार दूर कहीं क्षितिज पर सैर कर रही थी कि अचानक ही धीमे से तेज ... और भी तेज होती "खट - खट" की आवाज़ ने आराम करती हुई पलकों को जबरदस्ती खोल ही दिया । 


मैं भी किसी प्रकार उनींदी पलकों को खुला रखने का प्रयास करती सी दरवाज़े की तरफ बढ़ चली ,"कौन है भई  ? इतनी सुबह - सुबह किसी के घर कोई आता है क्या ? " 


दरवाज़े को खोलती मैं वहीं पड़ी कुरसी पर बैठ गयी ,"आ जा भई ,अब बैठ भी जा और अपना नाम ,काम सब बता ही दे ।" 


सामने बड़ी ही आकर्षक परन्तु प्रौढ़ छवि खड़ी दिखाई दे रही थी । अरे हाँ ! बड़ी ही मनमोहिनी मुस्कान भी छाई थी उस प्रभावित करते चेहरे पर ,"बैठती हूँ बेटे परन्तु तुम अपनी आँखें तो खोलो ... बन्द होती पलकों से तो तुम कुछ स्पष्ट देख भी नहीं पाओगी और न जाने कितने विचार आ कर मेरी छवि धूमिल कर ओझल कर देंगे ", अब उसकी हँसी थोड़ी और मुखर हो गयी । 


अब मैंने सप्रयास स्वयं को और भी चैतन्य किया और उस को और भी ध्यान से देखने लगी । उसके केशों की प्रत्येक लट अपने स्थान पर एकदम दुरुस्त थी , जैसे किसी ने उनको किसी क्रीम से व्यस्थित कर रखा हो । केशों को विभक्त करती माँग भी कितनी सीधी सी थी जैसे आप ,तुम ,तुम्हारा ,तू कौन सा शब्द किसको क्या बोलना है पहले से ही पता हो । उन्नत मस्तक गर्व से चमक रहा था परन्तु कहीं भी गुमान की झलक भी नहीं थी । आहा ! आँखें कितनी ममता से भरी ... जैसे पलकों की बाँहें फैला सबको अपने आँचल में ही समेट लेंगी । उसके अधर भी कितने सहज भाव से प्रत्येक भाषा ,ज़ुबान ,बोली ,लैंग्वेज सब बरसती फुहारों में अविरल स्रवित कर रहे थे ।


उसके व्यक्तित्व की गरिमा से प्रभावित हो कर स्वयं को संयत करती सी मैं अपने इस एक दिन के गरिमामयी अतिथि के स्वागत को ततपर हो उठी ,"आइये पहले आप यहाँ बैठिए तो ... चाय - कॉफी क्या पसंद करेंगी ... या फिर कुछ ठंडा लेंगी ... नाश्ता साथ में ही करते हैं ... "


वह विहँस पड़ीं,"अरे वाह ! एक दिन के अतिथि ,वह भी बिना बुलाया ... इतना सत्कार कर रही हो ! तुम सब तो कल खूब ठहाके लगा रहे थे कि पूरे साल जिसको भुलाये रखा ,सिर्फ एक दिन के लिये उसको याद क्या करना ... या जो ढ़ंग से बोल भी नहीं पाते ,वो क्यों कोई दिवस मना कर पर्व जैसी महत्ता दें ... फिर मेरी पसंद - नापसंद को इतना महत्व देना ,कुछ विचित्र नहीं लग रहा क्या ? "


मैं उनकी मित्र की तरह छेड़ने वाली बातों में उलझ कर फिर से उनके पास ही बैठ गयी ,"आप ऐसा क्यों कह रही हैं ... मैं तो आपसे आज पहली बार मिली हूँ ,आपका नाम तक नहीं जानती ,फिर मैं आपको कुछ भी गलत्त कैसे बोल सकती हूँ ... कल आप कब मिली थीं मुझसे ,मुझे तो कुछ भी याद नहीं आ रहा ।" 


"यही तो विद्रूप है कि मैं सदैव तुम्हारे साथ रहती हूँ, परन्तु तुम पहचानती ही नहीं हो । मैं #हिंदी हूँ ... कल ही तो तुमने मेरा दिवस - #हिंदी_दिवस  मनाया था और मजाक बनाया था कि जो साल भर कभी हिंदी नहीं बोलते उनको मुबारक ... जो उनहत्तर ,उन्यासी ,नवासी में अंतर नहीं समझते उनको #हिंदी_दिवस मुबारक ... । मेरी आज की स्थिति एक ही दिन में तो आयी नहीं है । जैसे एक - एक दिन कर के मेरा चलन कम हुआ है वैसे ही एक - एक दिन कर के ही मुझको मेरी पूर्वस्थिति वापस मिलेगी ",वह स्नेह से मेरे हाथों को सहलाती हुई उठ खड़ी हुई । 


अपने विचारों में उलझी मैंने जब सामने देखा ,तब वहाँ जाते हुए कदमों का एक धुंधला साया भर था । सम्भवतः मुझे उलझनों में घिरा देख मेरी पहचान मुझ से हाथ छुड़ा कर कहीं दूर जाने लगी थी । 


मैं एक दृढनिश्चय के साथ उठ खड़ी हुई और चल दी अपनी मातृभाषा के आँचल में हिंदी दिवस ,हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़े के सितारे टाँकने !

                                 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 14 सितंबर 2020

हिन्दी : दोहवलि

 हिन्दी हिन्दी सब  कहें ,सीखे नहीं विधान ।

स्वर व्यंजन भी याद हो ,मात्रा का रख ध्यान ।।


उच्चारण भी शुद्ध करो ,प्रवहमान तब जान ।

तत्सम तद्भव लो समझ ,त्रुटियों का ले ज्ञान ।।


अलग - अलग हर भाव के ,इसमें रखे निशान ।

कण्ठ तालु अरु हलक से ,बोलो समझ विधान ।।


नाम संबंध के अलग, रहती भिन्न पुकार ।

समझो इसकी महत्ता ,भाषा है संस्कार ।।


   ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 13 सितंबर 2020

मन बावरा है न ....

 मन बावरा है न 

आज चाँद बनने को मचल पड़ा

मानो माँ की उंगली थामे 

उचका था बचपन चाँद पकड़ने को !


चाँद बनना है पर वह

आसमान में चमकने वाला नहीं 

न ही पानी से भरे थाल में लहराता !


चाँद बनना है पर वही 

चातक की आँखों में चमकता आस बन 

शिशु की किलकारी में किलकता मामा बन !


 मेरे चाँद से मन को पाने के लिये

मत सजाना प्रयोगशाला 

नहीं खोजना गड्ढ़े मन की गहराई में !


बस जगा लेना सम्वेदनाओं को 

मेरा ये चाँद विहँस बस जायेगा

चमकता ही रहेगा तुम्हारे आनन पर !

              ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 7 सितंबर 2020

लघुकथा (संवाद ) : दास्तान ए लेखनी और शमशीर ...

 दास्तान ए लेखनी और शमशीर ...


मेरे सामने तुम कुछ नहीं हो । तुमको तो चलने के पहले स्याही रूपी रक्त पीना पड़ता है ।


हाँ .. हाँ ... यदि मैं पहले रक्त पीती हूँ ,तब तुम भी तो बाद में रक्त ही तो पीती हो ।


तुमको तो इन्सान अंगुलियों के इशारे से नचाता रहता है ,जबकि मुझे चलाने में उसको पूरी ताक़त लगानी पड़ती है ।


मुझको चलाने के लिये वह बचपन से ही विधिवत शिक्षा भी लेता है और यदि तब नहीं सीख पाता तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर सीखता है। तुम्हारी याद तो उसे तभी आती है ,जब वह इतना शक्तिशाली हो जाता है कि तुमको सम्हाल सके । 


बोल तो ऐसे रही हो जैसे तुम कोई बहुत तुर्रम खाँ हो ... 


हाँ ! हूँ मैं तुर्रम ख़ाँ 


कैसे ? 


अरे ! मुझे जानती नहीं हो ,जरा सा भी लहरा जाऊँ तो ख़ुदा को जुदा और अर्श को फ़र्श कर दूँ ... मेरे शब्दों में इतनी ताक़त है ।


हाँ ! मान गयी तुम मुझसे शक्तिशाली हो । मैं जब लहराती हूँ तब एक ही बार में जीवन ले लेती हूँ ,परन्तु तुम तो जिन्दा रहते हुए भी कई - कई बार मारती रहती हो । 

                                     ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

रस्मे उल्फ़त

 आज की इस आपाधापी के दौर में 

कुछ यूँ रस्मे उल्फत चलो निभाते हैं


कुछ मैं करती हूँ कुछ तुम समेट लो

चलो कुछ यूँ अपने काम बाँट लेते हैं


नानाविध भोजन हम पका लाते हैं 

बर्तनों की निगहबानी तुम कर लो


झाड़ू डस्टिंग तो हम कर ही आएंगे 

पोछे की बाल्टी जानम तुम ले आओ


कहो तो सौंफ इलायची हम चख लेंगे 

तुम तो बस वो सौंफ़दानी उठा लाओ 


किधर चल दिये अब ऑफिस को तुम

जरा रुको लैपटॉप मैं ले कर आती हूँ


वक्त का पहिया चल पड़ा उल्टी चाल

दो से चार हुए अब चार से फिर दो हुए


ई सी जी के रिपोर्ट सी  देखती चेहरा

कभी कुछ शब्द भी तुम  लुटा जाओ 


बीतती जा रही अनमोल ये ज़िंदगी

बाद में तुम भी याद कर पछताओगे


कितने लम्हों को थामे ये 'निवी' खड़ी

दो चार लम्हे तुम भी कभी खोज लाओ 

       .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 2 सितंबर 2020

लघुकथा ( संवाद ) : कनिष्ठा


सुनो 

हूँ

बहुत सोचा पर एक बात समझ ही नहीं आ रही😞

क्या 

अधिकतर लोगों को देखा है कि वो तीन उंगलियों में ,यहाँ तक कि अंगूठे में भी अंगूठी पहन लेते हैं ,परन्तु सबसे छोटी उंगली को खाली ही छोड़ देते हैं । 

हा ... हा ... सही कह रहे हो 

अरे हँसती जा रही हो ,कारण भी तो बताओ 

हा ... हा ... अरे सबसे छोटी होती है न किसीका ध्यान ही नहीं जायेगा इसीलिये ... 

मजाक मत करो सच - सच बताओ न ,तुम क्या सोच रही हो 

अच्छा ये बताओ ,हम कहीं जाते हैं तो तुम मेरी छोटी उंगली ,मतलब कनिष्ठा क्यों पकड़ लेते हो 

अरे वो तो किसी का ध्यान न जाये कि हमने एक दूजे को थाम रखा है ,बस इसीलिये ... 

अब समझे तर्जनी पकड़ाते हैं किसी को सहारे का आभास हो इसलिये ...

हद्द हो यार तुम ,मैं बात करूंगा आम तुम बोलोगी इमली ... 

सुनो तो ... कनिष्ठा प्रतीक है प्रेम का ...

प्रेम का ? 

हाँ ! हम जिसके प्रेम में होते हैं उसकी हर छोटी से छोटी बात भी महत्व रखती है ...

वो तो ठीक है परन्तु कनिष्ठा को आभूषण विहीन क्यों रखना ?

क्योंकि जब दो प्रेमी अपने होने का एहसास करते हैं तब वो कनिष्ठा पकड़ते हैं क्योंकि रस्सी का सबसे छोटा सिरा पकड़ लो तो दूरी खुद नहीं बचती । पकड़ में मजबूती नहीं होती पर विश्वास होता है । अब इस छुवन में आभूषण बैरी का क्या काम ... हा ... हा ...

तुम भी न बस तुम हो 💖💖

                ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

गीत : प्रणय की बेला

 देख रही मैं सपन अनोखे ,

आ पहुँची प्रिय प्रणय की बेला !


निशा भोर की गैल चली है

तारों ने तब घूँघट खोला ,

मन्द समीर उड़ाये अंचल

रश्मि किरण का मन है डोला ,

पागल मन हो जाता विह्वल

रोज सजाता जीवन मेला !


माया में मन भटक रहा है

पल - पल करता जीवन बीता ,

अनसुलझी लट खोल रहा है

जीवन का हर घट है रीता ,

अंत समय जब लेने आया

मन फिर से हो गया अकेला !


बन्द नयन वह खोल रहा है

सच जीवन का वह बतलाता ,

तेरा - मेरा झूठा नाता

रह रह कर वह है समझाता ,

विहग तो उड़ जाये अकेला

लोभ सजाये मन का तबेला !

   .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 30 अगस्त 2020

काश .....

 काश ...

ज़िंदगी किताब होती 

थोड़ी सी ही नहीं 

बस बेहिसाब होती 

बिखर जाते पन्नों को 

चुभन के साथ

बाँधे रखती पिन 

चुभन में भी अपनी

मिठास रखती 

पन्नों का बिखराव 

समेट छुपा रखती

काश ! ज़िंदगी सुलझी गणितीय हिसाब होती !!!


काश ...

ज़िंदगी फूलों की 

बरसती बरसात होती

सूख जाती पंखुड़ियाँ 

खुशबू की फुहार होती

सजाते चटख रंग 

तितली के शोख पंख

हथेलियों की रेखाओं में 

कर जाते बसेरा 

और बस ही जाते 

उन ख्वाबो से कच्चे रंग

काश ! ज़िंदगी बेमुरौव्वत लहरों की न धार होती !!!

                              ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

लघुकथा : वो कुर्सी


अकसर शाम होते ही दो कुर्सियाँ ले जाकर बालकनी में रख देती थी और नजरें घड़ी की सुइयों के साथ हिचकती ,कसकती आगे बढ़ती जाती थीं । हाँ ! उस समय  सिर्फ दो ही काम होते थे कभी रूखी लगती सूनी सी सड़क को देखती तो कभी घड़ी को ...बहुत देर यही होता रहता था । फिर ढलती शाम और रात के गहराते साये हक़ीकत से रु - ब - रु करवा देते थे और कोरी कुर्सियाँ अंदर आ जाती थीं । 


अनायास ही कुछ खिलखिलाती आवाज़ें सुनाई देने लगी थीं । पड़ोस में एक नया परिवार आ गया था । उनके बच्चे खेलते हुए इस तरफ आ गयी गेंद को वापस देने की पुकार लगाते हुए खिलखिला देते थे और मैं मन्त्रमुग्ध सी उनकी हँसती सूरत में लड्डूगोपाल को महसूस करने लगी थी । 


अब भी बाहर दो कुर्सियाँ ले जाती हूँ ... एक पर बैठी ,बच्चों की गेंद के इस पार आने की प्रतीक्षा करती हूँ और हाथ में थामी हुई किताब को पढ़ने का प्रयास किये बिना ही दूसरी खाली कुर्सी पर छोड़ देती हूँ । 


पास ही रखे 'कारवाँ'  से गाना गूँज उठता है "ज़िंदगी कैसी है पहेली .... "


सच ये मन भी न कहाँ - कहाँ भटकता रहता है !

                                  ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

लघुकथा : #पहला_प्यार

 लघुकथा : #पहला_प्यार


लाडो ! चल खाना खा ले ।

उहूँ 

चल न बेटा ,इतना भी क्या गुस्सा । सब तेरा भला ही तो सोच कर कह रहे हैं । 

इसमें क्या भला सोच रहे हैं ?

अरे लाडो पहले पढ़ाई कर ले ,फिर जो तू कहेगी सब मानेंगे । परन्तु अभी नहीं ।

माँ ! तुम नहीं समझ रही हो । पहला प्यार है मेरा ... 

हाँ लाडो तुम्हारी बात समझ रही हूँ ।

नहीं समझ रही हो । पहला प्यार भूलना आसान नहीं होता ( सिसकता प्रतिरोध )

गलत्त बोल रही है तू । कोई भी हो वह पहला प्यार खुद से करता है ।

खुद से ... मतलब ? 

हॉं ! 

कैसे ? 

तू मुझे क्यों प्यार करती है  ?

अरे यह क्या बात हुई ... माँ को प्यार करने का कोई कारण होता है क्या ! 

हाँ होता है । तू मुझसे नहीं उसको प्यार करती है जो तेरी माँ है । मेरी जगह कोई और होती तो तू उसको भी प्यार करती । मुझको प्यार करने के लिये मेरा नहीं तेरा होना जरूरी है ।

क्यों उलझा रही हो माँ ! 

नहीं आज तुझे समझना होगा । तू है इसलिये पढ़ रही है ,नृत्य सीख रही है ,गा रही है और उस व्यक्ति के लिये तड़प रही है ,जो अभी तेरे दिल - दिमाग तक ही आ पाया है । अभी वो तेरे जीवन में कहीं नहीं है ।

माँ !

लाडो ! इसीलिये कह रही हूँ कि पहले खुद को प्यार कर और इतनी योग्य बन जा कि सब तेरी बात को सुने ,समझें और मानें भी । 

हम्म्म्म

अभी तेरी उम्र बहुत कम है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की योग्यता भी नहीं है । 

परन्तु माँ ...

दो बातें अच्छे से समझ ले कि यदि वह तुझसे सच्चा प्यार करता और गरिमा को समझता है तो तेरी बात को भी समझेगा और तेरी प्रतीक्षा भी करेगा । दूसरी बात कि तुम दोनों इतने क़ाबिल हो जाओ कि एक दूसरे की गरिमा को बिना कुछ भी कहे ही बनाये रख सको ।

माँ ! तुम न होती तो मेरा क्या होता ... 

हा ! हा ! हा ! मैं ऐसा इसीलिये बोल रही हूँ क्योंकि मैं खुद को बहुत प्यार करती हूँ । मेरी बेटी परेशान होती तो मैं भी तो चैन से नहीं रह पाती । 

                 .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 23 अगस्त 2020

गीत : सजा गया विरहन का सावन ...

 महक रहा है हलका - हलका ,

बालों में गूँथा जो गजरा ।  

देख रहा है छलका - छलका ,

नयनन में हँसता वो कजरा ।।


बोल रही है बहकी - बहकी ,

हिना हथेली में  मुस्काई ।

बिखर गई थी ढ़लके - ढ़लके ,

चुनरी माथे पर वो छाई ।।  


चूड़ी कंगन करते पागल ,

छनक - छनक कर गाते जाये । 

पाँवों में पहनी जो पायल ,

भरमाती उर को वो जाये ।। 


सजनी मचले बहकी - बहकी ,

घर आये परदेसी साजन । 

बिंदिया खिली चमकी - चमकी ,

सजा गया विरहन का सावन ।।   

 .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 22 अगस्त 2020

संवाद : बूँद और मोती

बूँद और मोती


बहुत दिनों बाद उसको देख कर वह किलक पड़ी : अरे !तुम ... कितने दिनों बाद मुलाकात हुई है और ये क्या ... तुम मुझसे इतने अलग कैसे लगने लगे 


 मोती : मतलब ?


बूँद : आसमान से तो हम दोनों ने साथ ही यात्रा शुरू की थी ।


मोती : हाँ ! की तो थी ...


बूँद : फिर तुम में इतनी चमक भर गई और मैं ... 


मोती : ना बहन दिल छोटा नहीं करते 


बूँद : नहीं ... नहीं ... तुम मुझसे सच - सच बताओ न ये कैसे हुआ ?


मोती : बताऊँ !


बूँद : और क्या ... कबसे पूछ रही हूँ और तुम बता ही नहीं रहे हो । अच्छा समझ गयी सब तुमको ही तो अपने पास रखना चाह रहे हैं और सराह भी रहे हैं । और मैं ... मुझे तो गलती से भी उनके ऊपर पड़ जाने पर झटक देते हैं । 


मोती : फिर वही बेकार की बातें कर रही हो ।


बूँद : समझ गयी ,तुम चाहते ही नहीं हो कि मैं खुद को सुधारूँ ...


मोती : तुम भी ... जानती हो हममें यह अन्तर परिवेश की वजह से आया है । मैं सीप में चला गया तो मोती बन गया और तुम दरिया में मिल कर जीवनदायिनी बन गयी । 


बूँद : जीवनदायिनी


मोती : और क्या ... कभी तुम प्यास बुझा जाती हो तो कभी फसल को सींच देती हो ... 


बूँद : हाँ ! यह तो है 


मोती : आज तुमको मेरी चमक आकर्षित कर रही है पर जानती हो मुझको तो कुछ पलों के लिये पहनने को निकालते हैं ,नहीं तो बाकी समय तो तिजोरी में ही मेरा दम घुटता रहता है । 


बूँद : तुम्हारा दम घुटता है ?


मोती : हाँ ! और तुम देखो कितनी मुक्त हो हवा के झूले पर सवार हो कर धरती आकाश सब घूमती हो ।


बूँद : शायद हम में भी इन्सानी प्रवृत्ति आ गयी है । दूसरों का जीवन ही अधिक अच्छा और आकर्षक लगता है ।

                                   .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

नवगीत : गान नहीं था साधारण ....

परम्परायें रहीं देखतीं

गान नहीं था साधारण !


शिशु अबोध किलक नहीं पाता

अपने सब छूटे जाये

नाव समय भी खूब सजाता

अंधेरा घिरता जाये  

रश्मि किरण भी सच को ढँकती

नियति करे तब निर्धारण !


पूछ रहे सभी कुल का नाम 

मौन सभी सामर्थ्य रही 

गुणी देखते नहीं क्यों काम 

वेदना अविरल हो बही

धधक रही थी उर में ज्वाला

पीर तभी बनती चारण !


बतलाता परिचय जो अपना 

ज्ञान कभी मिलता कैसे

झूठ छुपाये सौ परतों में 

पहुँच गया छल कर जैसे

चक्र फाँस सब मंत्र भूलता

चढ़ा शाप था गुरु कारण !

   .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 17 अगस्त 2020

हाइकु ....

 हाइकु


मिट्टी का तन 

चक्रव्यूह सा चाक

फौलादी मन


डूबती शाम

उलझन में मन 

उर की घाम


टूटते वादे

बिखरती सी यादें

मूक इरादे


रूखी अलकें

नमकीन पलकें

कहाँ हो तुम 


खुले नयन

बुझा जीवन दीप 

मन अयन


चकित आँखें 

भरमाया सा मन 

बेबस तन


बिछड़ा साथी

राहें हैं अंधियारी 

बात हमारी

      .... निवेदिता श्रीवास्तव "निवी"

शनिवार, 15 अगस्त 2020

वीर बाँकुरे

 वीर बाँकुरे ...


देश के रक्षक वीर बाँकुरे ,

आन देश की रखते प्यारे ।

अपनी माटी शीश सजा के,

ऊंची राष्ट्र ध्वजा फहरा के ।।


जय हिन्द का घोष हैं करते ,

निज प्राण का मोह ना करते ।

गगन धरा या सागर  गहरा ,

हर जगह लगाते हैं पहरा ।।


देश हित पर करे जो शंका ,

बज रहा हो युद्ध का डंका ।

चल देती वीरों की टोली ,

जय हिन्द की लगा कर बोली ।।


अरिदल को फिर गरल पिला कर ,

धूसर में भी पुष्प खिला कर ।

झूम रही टोली बलशाली ,

इनसे हम हैं गौरवशाली ।।

    .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'


मंगलवार, 11 अगस्त 2020

गीत : शर शय्या पर समय विराजे

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राधे - राधे 

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शर शय्या पर समय विराजे 

टेर रहा हो कहाँ कन्हाई !


बात धर्म की तुम हो करते 

परे सदा अन्याय हटाया 

नहीं शीश को देखा मोहन  

नेह चरण पर था बरसाया  

माया का यूँ चक्र चलाया  

अलख सत्य की सदा जगाई  


मान एक धागे का जाना 

वस्त्रों के तब ढ़ेर लगाये 

नहीं किसी को कुछ सूझा था 

बोल नहीं सच्चाई पाये 

आ पहुँचे तुम भरी सभा में 

द्रुपद सुता की आन बचाई  !


सुनो जरा मेरे मनमोहन

बतला दो गलती तुम सारी 

मैंने कब क्या पाप किया था     

बाणों की शय्या क्यों मेरी  

गंगा तट पर हूँ मैं लेटा  

जैसे हो मेरी अँगनाई !


सुनो पितामह तुम इस सच को

वही काटते जो हैं बोते  

चक्र चले अनगिन कर्मों का 

परिणाम सुखद कब हैं होते 

हर पद इक गरिमा है रखता  

नही राह सच की क्यो भायी !


  .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

कब मिलोगे ...

कब मिलोगे ...

पूरे चाँद की चमकती रात अंधेरी लगती है ,
अकसर ख़ामोश सी पूछती है कब मिलोगे !

बिखरी अलकों से पूछती अधखुली पलकें 
तुम्ही बताओ ऐ स्वप्न सच बन कब मिलोगे !

मुझसे दूर जाती नामालूम से लम्हों की कतारें ,
ठिठकती अटकती सी पूछती है कब मिलोगे !

दूर जाते क़दमों की सुनती हूँ जब कोई आहट ,
धड़कना छोड़ कराहती पूछती है कब मिलोगे !

मोती बनने की चाहत में स्वाति नक्षत्र खोजती ,
सीप में समाती हर बून्द पूछती है कब मिलोगे !

कहते हो तुम भोले का महानिवास (श्मशान) मुझे भाता , 
पता है कहीं मिलो न मिलो वहाँ जरूर मिलोगे ! 

यादों की मंजूषा छुपाये कितना शांत है साग़र
सिसकती लहरों से 'निवी' पूछती हैं कब मिलोगे !
                              ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

नवगीत : यादों की महकी अमराई


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विहस रही बदली वो पगली
यादों की महकी अमराई 
*
बैठ रहा पाटे पर वीरा 
मंगल तिलक लगाये बहना 
सुन आँखों से वो बोल रहा
तू ही है इस घर का गहना 
जब जब तू घर आ जाती है
आती खुशियाँ माँ मुस्काई 
*
मन तरसे अरु आँखें बरसे 
विधना ने क्यों रोकी राहें
नाम लिया है कुछ रस्मों का
रोक रखी वो फैली बाँहें
टीका छोटी से करवाना 
याद मुझे कर हँसना भाई
*
बीती बात याद जो आये
भर भर जाये मेरी अँखियाँ 
इस बरस तू नहीं आयेगी
बता गयी हैं तेरी सखियाँ
एक बार तू आ जा बहना 
कर लेंगे हम लाड़ लड़ाई 
*
रीत निभाना याद दिलाते 
कदम ठिठक बढ़ने से जाये
संस्कारों ने रोक रखा है
चाह रही पर आ नै पाये
पढ़ चिट्ठी अपनी बहना की 
भाई की आँखें भर आई
      ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'


शनिवार, 1 अगस्त 2020

नवगीत : बिलख बिलख वसुधा है रोती ...


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बिलख - बिलख वसुधा है रोती
समझ नहीं कोई पाया

हर्ष - विषाद उर में बस जाये  
प्रेम विशाल दिखा जाता ,
तब अंतर्मन संवाद करे 
नयन जलद सा खिल भाता ,
वीणा यादों की गान करे 
गीत पुरातन तब गाया ,
बिलख - बिलख वसुधा है रोती
समझ नहीं कोई पाया !
*
उम्मीदों की गगरी छलकी
समय विभीषण आ जाये ,
पर्वत - पर्वत घूम रहा था
छुपा अमिय रहा बताये ,
भूकम्पी सी आहट दे कर 
झटका घर को गिरा गया ,
बिलख - बिलख वसुधा रोती
समझ नहीं कोई पाया !
*
नयनों से जब जब नीर बहे
आसमान क्रंदन भरता ,
आस जगा साहस यूँ भर कर 
दायित्व वहन है करता ,
कर्तव्यों की बलिवेदी पर
हर पल की वह मौत जिया ,
बिलख - बिलख वसुधा है रोती
समझ नहीं कोई पाया !
 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

दोहा गीतिका : अवनी धमनी सी सखी

दोहा गीतिका

अवनी धमनी सी सखी ,प्रेम सुधा बरसाय ।
दूषित उसको क्यों करो ,सुन लो ध्यान लगाय ।।

जब जब काटो पेड़ को ,नई लगाओ पौध ।
शुद्ध हवा कैसे मिले ,धरा सूख जब जाय ।

बात प्रदूषण की करें , सुनो लगा कर ध्यान ।
उद्द्यम हमने क्या किया ,जरा सोच समझाय ।।

पानी घटता जा रहा ,बुझे नहीं अब प्यास ।
फेंक रहे क्यों व्यर्थ ही ,कुछ लो अभी बचाय ।।

धरा सोच कर रो रही ,आँसू बहे अपार ।
लाल बनो तुम मातु के ,लोचन नीर बहाय ।। 

मलबे से मत तुम भरो ,कैसे ले वो साँस ।
मन उदास उस का हुआ  ,तुम दो उसे हँसाय ।। 

 ..... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

नवगीत : जियूँ मैं कैसे ....



***
पीर गहन हो यूँ बह निकली
शब्दों की ज्वाला हो जैसे

उर का ग़म नयनों में झलके 
अनायास झलक गया ऐसे
बाँध सकी ना बिखरी अलकें
करूँ बन्द मैं पलकें कैसे 

पर्वत का आँसू है झरना
नदी हर्ष की गाथा कैसे
पीर गहन हो यूँ बह निकली
शब्दों की ज्वाला हो जैसे

बदल बदल कांधा थे चलते
संग सदा जो लगते अपने
जली शलाका वही बढ़ाते
देखे थे जिनके ही सपने

हिय को तो पाहन कर लूँ
पर बतलाओ जियूँ मैं कैसे
पीर गहन हो बह निकली
शब्दों की ज्वाला हो जैसे

.... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 29 जुलाई 2020

नवगीत : पिय मिलन को चली है रजनी !

नवगीत
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ओढ़ चुनरिया तारों वाली
पिय मिलन को चली है रजनी !

झूम रहा है अम्बर सारा
रवि पहने ओसन की मालाH
उर में सजा बसन्त है न्यारा
नज़रें बन जाती मधुशाला

किरणों के संदेसे आये
मधुमय यादें हैं सजनी
ओढ़ चुनरिया तारों वाली
प्रिय मिलन को चली है रजनी !
*
गगन मगन हो हो कर बरसे
विटप झूम लहराते जायें
इस पल जियरा क्यों है तरसे
अरमां भी अब सारे गायें

चंचल कलियाँ बहती तितली
आकर्षण का केंद्र बनी
ओढ़ चुनरिया तारों वाली
पिय मिलन को चली है रजनी !

*
उमड़ घुमड़ कर नदियाँ विहसी
छू कर तट कर रही किलोलें
मदिर मदिर अधरन पर बरसी
अरमानों के पड़ रहे हिंडोले

चन्द्रकिरण सी बातें छलकी
मनुहार की थी फुहार  घनी
ओढ़ चुनरिया तारों वाली
पिय मिलन को चली है रजनी !
       .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 29 जून 2020

लघुकथा : माँ

लघुकथा : माँ

नन्हा सा अवि अपनी बाल चित्र कथा के पन्नों पर अंकित चित्रों को देखता कुछ - कुछ बोलता जा रहा था और वह अपने काम करती उसकी जिज्ञासा भी शांत करती जा रही थी । अचानक से उसकी चुप्पी से चौंक कर वह उसके पास पहुँच गयी ,"अवि !क्या हो गया बेटा ?"

"माँ ! सारी माएँ अपने बच्चे की सुरक्षा के लिये सतर्क रहती हैं ,फिर ये शेरनी अपने बच्चे को इस हाथी की सूँड़ में कैसे छोड़ कर आराम से टहलती चल रही है और उसको देख भी नहीं रही है ",नन्हा अवि शेर के नन्हे के लिये चिंतित था ।

"बेटा ! माँ कोई भी हो वह सिर्फ माँ होती है ", वह हँस पड़ी ,"बताओ कैसे ?"

अवि भी खिलखिलाता उसके गले मे झूल गया ,"हाँ माँ ! जैसे वो पड़ोसन काकी सब पर गुस्सा करती हैं ,परन्तु हम सब बच्चों को सिर्फ लाड़ । हमारे लिये आप सब को भी डाँटती हैं न !"
            ... निवेदिता श्रीवास्तव'निवी'

बुधवार, 24 जून 2020

लघुकथा : दीवाल


लघुकथा : दीवाल

चाय पीने का मूड हो रहा ..

 अच्छा ...

साथ में ऑमलेट भी बना लो ,मजा आ जायेगा ...

ठीक ...

और सुनो टोस्ट करारे सेंकना ...

ठीक ...

ये क्या हर बार एक शब्द 'ठीक' बोल रही हो । मैं बात कर के बात खत्म करने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम वहीं अटकी हुई हो ...

मूक नजरें और भी चुप ...

अरे यार होता है न कभी - कभी ... हम एक दूसरे के पन्चिंग बैग ही तो हैं । टेंशन उतारो फिर साथ - साथ ...

शायद तुम भूल गए हो कि पन्चिंग बैग की सहनशक्ति समाप्त होने पर अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति बदल कर  बड़ी मजबूत दीवाल बन जाता है ... एक चुप पर अप्रभावित दीवाल ...
          ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 23 जून 2020

मैंने जीना सीख लिया है ...

मैंने जीना सीख लिया है ...

तुम हँसते रहे मेरे दाँत बड़े बोल कर
मैं बस एक कदम घूम गयी
तुम्हारे छोटे दाँत मुझे भी दिख गए
रुमाल हटा ठहाके लगाना मैंने सीख लिया है
मैंने जीना सीख लिया है !

आँखों का चश्मा दिखाने उठी तुम्हारी उंगलियाँ
मैंने बस नजरें उठायी
तुम्हारी आँखों में छुपी वहशत मुझे दिख गयी
बस ठहरी आँखों से देखना मैंने सीख लिया है
मैंने जीना सीख लिया है !

मेरे लिखे को बेकार बताती तुम्हारी झुंझल
मैंने बस तुम्हारा पासवर्ड देख लिया
तुम्हारी खोली हुई सभी साइट मैंने देख लिया है
मैंने खुद से खुद को ही पढ़ना सीख लिया है
मैंने जीना सीख लिया है !

हँसी उड़ाती छंदमुक्त छंदबद्ध की बातें
मैंने तुम्हारे मन के झरोखे देखे
तुम्हारे मन में छुपे अहंकार को मैंने देख लिया है
जिंदगी को आँखों में आँखे डालना सीख लिया है
मैंने जीना सीख लिया है !
                     ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 21 जून 2020

पापा ....

संस्मरण

यादों में तैर रही है एक बच्ची जो सबकी बहुत लाड़ली ,दुलारी है कई भाइयों ( तब कजन्स नहीं होते थे न ,सिर्फ भाई - बहन ही होते थे 💖 ) की छोटी सी चंचल बहन । बहन ऐसी कि हर समय उसके बोल चहचहाते रहते और क़दम थिरकते ही रहते थे ,चाहे वो सीढ़ियों पर चढ़ रही हो या उतर रही हो ... जानती थी न कि उसको संभालने वाले हाथ गिरने नहीं देंगे ।

एक दिन अपने पापा के साथ स्टेशनरी की दुकान पर किताबें देखती हुई वह अनायास ही बोल पड़ी थी ,"पापा ! यह किताब तो किसी को मिली ही नहीं थी ,अब सिर्फ मेरे पास ही होगी । कितना मजा आयेगा ।"

पापा ने उसको दुलराते हुए कहा था ,"तुम्हारे पास कुछ होना बहुत अच्छी बात है वह भी तब ,जब वह ज्ञान और अच्छा व्यवहार हो ,सामान नहीं । अगर तुम और बच्चों को भी यह किताब दोगी तब सब मिलकर पढ़ेंगे । कितना मजा आएगा !"

"पर पापा ! मुझे क्यों मजा आयेगा ", वह फिर ठुनक पड़ी ।

"सबसे पहली बात तो यही कि अगर किताब मिलेगी ही नहीं ,तब हो सकता है टीचर दीदी उस किताब को कोर्स से ही हटा दें ... ",पापा ने समझाया ।

पापा को लगा कि वह उसकी बात समझ रही है ,तब  उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई ," अपने पास की चीजों और ज्ञान को बाँटना बहुत जरूरी है । अगर अपने आसपास के लोगों को भी प्यार करती हुई सिखाती चलोगी ,तब तुम्हारे साथ के सभी लोग उस ज्ञान को समझने लगेंगे और तुमको कभी भी अकेलापन नहीं लगेगा । "

"हाँ पापा ! आप कह तो सही रहे हैं । पर ऐसा करने से मैं हमेशा फर्स्ट भी तो नहीं आ पाऊँगी ,"फिर एक सवाल पूछ बैठी थी वह ।

पापा हँस पड़े थे ,"ऐसा करने से तुम यहाँ ही नहीं कहीं भी प्रतियोगिता से घबराओगी नहीं । और सब को सिखाते हुए तुम्हारा रिविज़न भी तो साथ - साथ ही होता रहेगा । "

उस बच्ची ने इस बात को अपने अंतर्मन में बसा लिया था ।

जानते हैं वह बच्ची और कोई नहीं मैं ही थी 😊 अपने पापा की इसी सीख की वजह से आज भी जो भी और जितना भी आता है सब के साथ बाँटती और सबका स्नेह बटोरती रहती है ।

कभी कहा नहीं था ,पर आज कह ही देती हूँ ... पापा आप का होना एक विशाल दरख़्त का साया रहा है हमेशा  । उस ऊपरवाले का बहुत - बहुत शुक्रिया कि उसने मुझे आपकी बेटी बना कर भेजा 🙏
                              ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 16 जून 2020

थी ...

थी ...

सच कब से इधर से उधर भटकती वो सबके मुँह से बस यही सुन रह थी ... पहले के कुछ शब्द अलग - अलग से  होते ,परन्तु अंत मे यही 'थी'  ही आ कर वाक्य को पूर्ण कर रहा था ।

कहीं सच मे कुछ नम तो कुछ बहती हुई पलकें थीं ,तो कहीं मन की उदासी आँखों को खुश्क ही छोड़ गई थी । मन को चुभती हुई सी कुछ अपनी तो कुछ बेगानी सी वो शक्लें भी थीं ,जो अपने मैचिंग दामन से जबरन ही आँखों को पोछ कर  लाल कर रही थीं । सच ये लाली चुभ रही थी । फिर एक 'थी'  मेरी ही बात में आ गया ...

मुझे कोई पहले ही नहीं महसूस कर पाता था तो अब क्या करता ... मैं निर्विघ्न हो उन्मुक्त भाव से विचरण करती अंदर अपने कमरे में भी पहुँच गयी कि चलो एक झलक इसकी  भी ले लूँ ... वो क्या कहते हैं न कि मोह जल्दी जाता नहीं ,मन को लटकाए भी रखता है और भटकाये भी !

सारा सामान ही एक तरह से अलमारियों से बाहर पलट दिया गया था और निशानी बता - बता कर सब अपनी पसन्द की चीजें खुद पर लगा - लगा कर देखते और जँचने की कम्फर्मेशन आते ही समेटने की जुगाड़ में लगे थे ।

तभी उस तरफ आती बेटी की आवाज़ कानो में अमृत घोल गयी ,सोचा चलो एक बार और लाडो को देख लूँ । कमरे में घुसते ही वहाँ का दृश्य देखते ही उसकी दृढ़ता फफक पड़ी ,"हमने आप सब से कितनी बार हाथ जोड़ कर मना किया था कि माँ के सामान को कोई नहीं छुएगा परन्तु आप लोग मान ही नहीं रहे हैं और फिर से उनके सामान को हड़पने आ गये । शायद आप को समझ नहीं आ रहा है कि आप के लिये ये सारा सामान सिर्फ साड़ी ,ड्रेसेज और गहने हैं ,पर हम सब के लिये इसमें हमारी माँ की खुशबू बसी है ,उनके होने का एहसास है । आप सब बाहर निकलिए यहाँ से ,क्योंकि भाभी नहीं बल्कि मैं इस कमरे में ताला लगा कर चाभी उनको दूँगी । कहीं भाभी ने ये कर दिया तो आप सब तो उस बिचारी के प्राण तो बोल - बोल कर ही ले लोगे ।"

सच मेरी बिट्टो जरा भी न बदली थी ,सबको खरी - खरी सुनाने और अपनी भाभी के सम्मान की परवाह खुद से भी ज्यादा करती रही है ।

उस को दुलराने के लिये अपने फैले हुए हाथों को तुरंत ही समेट लिया था ... अब मैं स्पर्श से परे जो हो गयी हूँ !

भीगी पलकों में मन की नमी भरे बाहर आ गयी । दोनों बेटे हतप्रभ से एक दूसरे को देखते असमंजस में भटक रहे थे । सच यही काम मैं नहीं कर पाई ,उनको दुनियादारी नहीं सिखा पायी । शर्मिंदा हूँ बच्चों ! पर अब समय ही तुम लोगों को ये सिखायेगा ।

बच्चों से नजरें चुराती बाहर आई तो देखा अच्छी खासी भीड़ इकट्ठा थी ,उसमें वो सब भी शामिल थे जिनको मुझे जीवित देखने की छुट्टी नहीं मिल पाई थी । आज सब एक - दूसरे से कहते खड़े थे ,"सुख में न पहुँचो कोई बात नहीं ,पर दुख में तो जरूर जाना चाहिए । आखिर परिवार होता किसलिये है !"

सब मेरी सभी चाहतों को भूल ही गये थे ,तभी तो देह - दान की मेरी चाहत को अनदेखा कर धार्मिक कर्मकांड करने में लगे हुए हैं ।

सच कहूँ तो मैं जीना चाहती थी ... मरने के बाद भी ,दूसरों के शरीर मे जीवित रहते अपने अंगों के द्वारा ... जो दुनिया मैं नहीं देख पाई थी, वो देखना चाहती थी उन नई आँखों में समा कर !

निराश सी वापसी की यात्रा के लिये तैयार होती ,बच्चों की छवि बसा कर निकलने को ही थी कि आवाज़ सुनाई पड़ी ,"सुनो ! सिंवई जरूर बनवाना ,उसको बहुत पसंद थी ।"

मैंने पलट के चेहरा देखने की कोशिश नहीं की क्योंकि उस व्यस्त आवाज़ को पहचान गयी थी ,जो आज भी बहुत व्यस्त ही है ।

                    .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 12 जून 2020

शिव - स्तुति

शिव - स्तुति

हृदय पधारो हे त्रिपुरारी
टेर लगा मैं तो हूँ हारी
कंठ उतारा शिव का प्याला
मन मेरा बन गया शिवाला

अंतर्मन छवि सिंधु निहारी
मैं - मेरा सब तुझ पर वारी
गौरा सह तुम आओ भोले
वाणी बस बम बम बम बोले

पुष्प हार मैं ले कर आऊँ
श्रद्धा के मैं दीप जलाऊँ
आंगन अपनी छाया कर दो
वर से मेरी झोली भर दो
... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 4 जून 2020

क्यों सोचें ....

कितना सफर है बाकी
कहाँ तक चलना होगा
कहाँ ठिठकनी है साँस
बांया ठिठका रह जायेगा
या दाहिना चलता जायेगा !

फिर सोचती हूँ
क्यों उलझ के रह जाऊँ
गिनूँ क्यों साँस कितनी आ रही
आनेवाली साँस को नहीं बना सकती
गुनहगार जानेवाली साँस का
ऐ ठिठकते कदम ! गिनती भूल चला चल
पहुँचने के पहले क्यों सोचूँ
अभी बाकी कितनी है मंज़िल !

जब तक चल सकें चलते रहें
सुर - ताल का अफसोस क्यों करें
थामे हाथों में हाथ रुकना क्या
तुम रुको तो मैं चलूँगी
मैं रुकूँ तो तुम चलना
सफ़र तो सफ़र ही है
सफ़र मंज़िल की नहीं सोचता
सफ़र तो बस देखता है राही
चलो हमराही बन चलते जायें
मंज़िल जब आनी है
आ ही जायेगी
क्षितिज पहला कदम किसका क्यों सोचें !
                     .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 1 जून 2020

लघुकथा : अवसर


लघुकथा : अवसर

खिड़की से झाँकती थकी सी आँखें कितनी विवशता से भरी ,दिल की नमी से पलकों को सींच रहीं थीं । सब तरफ से बन्द उम्मीदों के दरवाज़े ,और मासूम निगाहों की झलकती भूख ... वह समझ ही नहीं पा रही थी कि कैसे इन की क्षुधा शांत करे ।

नन्हे परिंदों को देखते - देखते ही ,खिड़की की दरारों से झाँकती नन्ही कोंपल पर उसकी निगाहें अटकी रह गईं । जैसे एक नई ऊर्जा मिल गयी हो ।

हाँ ! वह किसी के सम्मुख हथेली तो नहीं पसार सकती पर उनकी मुट्ठी जरूर बाँध लेगी । वह घर मे रखे कपड़ों को धोने लगी मास्क बनाने के लिये ।

सच आपदा अवसर है अपनी सामर्थ्य को जानने का ,न कि विवश हो कर बिसूरते रहने का ।
          .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 24 मई 2020

मन कहता है ...



मन कहता है तू मुझको लिख 
सब खुद ही बन जायेगा !   

बिखर गया घर था वो प्यारा
पवन उड़ाती सब आये !
चाक चले जब गीली मिट्टी 
लेती ज्यूँ आकार प्रिये !     
मन का आवाँ तपता जाये 
हर अक्षर गहन गायेगा !       
मन कहता है तू मुझको लिख 
सब खुद ही बन जायेगा !   

बिछड़ गए थे जो शब्द कहीं
रच रहे नवल गान प्रिये !     
उर की बाती अभी जलेगी   
जीवन का आधार लिये !       
उमड़ - घुमड़ कर जब घन बरसा   
नदिया छलका आयेगा ! 
मन कहता है तू मुझको लिख 
सब खुद ही बन जायेगा !

भोर भयी जब ऊषा जागी   
किरणों  की मनुहार लिये !   
साँझ ढ़ले सब छुप जायेगा   
चाँद हुआ साकार प्रिये !     
कुछ मुझ में तू भी रह जाये   
कुछ तुझ सा बन गायेगा ! 
मन कहता है तू मुझको लिख 
सब खुद ही बन जायेगा !   

    .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 23 मई 2020

भीगा सा नाता



आँसू और पलकों का
ये कैसा भीगा सा नाता है
एक बिखरने को बेताब
तो दूजा समेटने को बेसब्र

ये बेताबी और ये बेसब्री
ये बिखराव और ये सिमटन
दिल की आती जाती साँसों सी
धड़कन को भी सहला जाती

आँसुओं का दिल लरजता
उनकी अजस्र धारा बुझा न दे
पलकों के चमकते दिए
पलकें थमकती है कहीं
राह थम न जाए और
सूख न जाए नयन सरिता

आँसुओं का आना जाना
बयान करते दिलों का अफसाना
मन कभी सूफी बन उठाता इकतारा
कभी जल कर बन जाता परवाना
         .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 21 मई 2020

लघुकथा : झरती रेत

लघुकथा : झरती रेत

माँ के कमरे से परेशानहाल निकले भाई गगन को अकेले बैठे देखकर ,भाभी क्षितिजा को चाय लेकर आने के लिए कहती हुई वसुधा उसके पास आ गयी  ,"भाई कल तो मैं वापस चली ही जाऊँगी ,आओ आज हमलोग साथ में चाय पीते हैं । आज इतने परेशान क्यों हो ? माँ ठीक हैं ,थोड़ी कमजोरी है उनको ।"

वसुधा का हाथ थामते हुए गगन छोटे बच्चे सा अधीर हो उठा ,"वसु ! मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि करूँ तो क्या करूँ ... दिन - ब - दिन माँ और कमजोर ही होती जा रही हैं । "

"भाई ! कितनी भी कोशिश कर लो कुछ दिक्कतें तो रूप बदल - बदल कर ढ़लती उम्र की साथी बन ही जाती हैं । तुम तो पूरा ध्यान रख ही रहे हो और भाभी भी तो माँ को पलकों पर रखती हैं " ,वसुधा समझते हुए जैसे छोटी से बड़ी बहन बन गयी ।

गगन खुद को रोकते - रोकते भी फफक पड़ा ,"जीवन का सत्य जानता भी हूँ और मानता भी हूँ ,परन्तु क्या करूँ मैं ... जानती है वक़्त की मुट्ठी से झरती रेत को अपने ही घर मे झरते हुए नहीं देख पा रहा हूँ ।"
                               ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 14 मई 2020

पतझर ....

पतझर भी प्यारा है
इसने पत्तों को बुहारा है

पत्ते जो न तिनके बनते
घोंसले कैसे बनते होते

रूखेपन की ये भाषा है
अपनों को थामे रखा है

रूखे जो ये तिनके हैं
सब सिमटे सिमटे हैं

तिनके जुल्म सह जाते हैं
टीस दिलों में रख जाते हैं
           .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 13 मई 2020

निरख रहे धरती अरु अम्बर ....

निरख रहे धरती अरु अम्बर
सदा सुखी हों सजनी साजन

सूर्य किरण की डोली आये
नर्तन करती चपला सारी 
चटक धूप पायल बन गाये 
खनकी जायें बारी बारी         
पंछी करते मंगल गायन       
निरख रहे ...

ढ़लता सूरज लाली लाये   
चलो विदा की बेला आयी   
हिना लिये पवन चली आये   
कलियाँ आशिष वर्षा लायीं   
सदा रहे जीवन अति पावन
निरख रहे ...

रजनी स्वागत थाल सजाये   
तारों भरी चुनर ले आये       
आ जा अवनी तुझे बुलाये   
बीता जीवन भी भुलवाये   
गाये मन तेरा मधु सावन     
निरख रहे ....
 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 12 मई 2020

लघुकथा : केंचुल


लघुकथा : केंचुल


  • कार्यक्रम की सफलता को उत्सवित करते बातों में व्यस्त सब का ध्यान अचानक से ही अन्विता की तरफ गया । वरिष्ठ अधिकारी के साथ आरामदेह सोफे पर बैठी ऑफ़िस मिनिट्स के बारे में बात करते - करते ,अचानक ही वहाँ से उठ कर कोने के स्टूल पर बैठने में  लड़खड़ा गयी थी ।

"क्या हुआ ... क्या हुआ ..." ,बोलते सब उसकी तरफ लपके ।

अन्विता धीरे से उठती हुई बोली ,"कुछ खास नहीं बस इंसान में बसे साँप की केंचुल उतरने का अनुभव कर लिया ।"
           .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 11 मई 2020

अम्बर बरसा आज नयन से .....


अम्बर बरसा आज नयन से
चिहुँक दामिनी इतराई !

मन बहका फूली अमराई
नयन बने हिय का दर्पण ।
ललित कलित बदली जब छाई
अयन क्या करूँ मैं अर्पण ।
घुमा केश की गुंथित वेणी
लहर पावनी मुस्काई ।
अम्बर बरसा आज नयन से
चिहुँक दामिनी इतराई !

गहन जलद छा गये चँहुओर
बिखर गयी हो जैसे अलकें ।
पात लजीले यूँ लहराये
बहक गयीं जैसे पलकें ।
सरिता सागर तट जा पहुँची
लहरें उमग जा समाई ।
अम्बर बरसा आज नयन से
चिहुँक दामिनी इतराई !
   ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 10 मई 2020

पैरोडी : कोई होता जिसको अपना ...



कोई होता जिसको अपना ,हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर ही होता ,लेकिन कोई सहायक होता ।

चाय बना कर जब मैं आती ,बर्तन चाय के वो धो जाता
बिखरी हुई हल्दी के दाग ,काश कोई आ कर के छुड़ाता
साफ - सफ़ाई कर के जाता ,महरी सम प्रिय मेरा होता
कोई होता ...

पौधों में पानी वो देता ,पौधे सूख नहीं फिर जाते
फूलों की खुशबू बस जाती ,डलिया ऐसे सजाता
खाद - दवा दे उनमें दे जाता ,कोई माली बन जाता
कोई होता ...

कपड़े भिगो जब मैं आती ,मुगड़ी चला वो धो जाता
धुले हुए कपड़े फैलाने ,बाल्टी लेकर छत पर जाता
धुले हुए कपड़े प्रेस कर जाता ,धोबी सम प्रिय मेरा होता
कोई होता ...
               ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 9 मई 2020

आपाधापी के दौर में ...

आज की इस आपाधापी के दौर में
कुछ यूँ रस्मे उल्फत चलो निभाते हैं

कुछ मैं करती हूँ कुछ तुम समेट लो
चलो कुछ यूँ अपने काम बाँट लेते हैं

नानाविध भोजन हम पका लाते हैं
बर्तनों की निगहबानी तुम कर लो

झाड़ू डस्टिंग तो हम कर ही आएंगे
पोछे की बाल्टी जानम तुम ले आओ

कहो तो सौंफ इलायची हम चख लेंगे
तुम तो बस वो सौंफ़दानी उठा लाओ

किधर चल दिये अब ऑफिस को तुम
जरा रुको लैपटॉप मैं ले कर आती हूँ

वक्त का पहिया चल पड़ा उल्टी चाल
दो से चार हुए अब चार से फिर दो हुए

ई सी जी के रिपोर्ट सी  देखती चेहरा
कभी कुछ शब्द भी तुम  लुटा जाओ

बीतती जा रही अनमोल ये ज़िंदगी
बाद में तुम भी याद कर पछताओगे

कितने लम्हों को थामे ये 'निवी' खड़ी
दो चार लम्हे तुम भी कभी खोज लाओ
       .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 3 मई 2020

कहानी : अनकहा दर्द

अनकहा दर्द

अन्विता जब भी अनिकेत को देखती ,बस देखती ही रह जाती । जैसे एक देवदूत हो ...एकदम मासूम । सुबह की पहली सूर्य-किरण की मीठी गर्माहट भरे ख्याल सा । जैसे तारों भरी रात के ढ़लते हुए पलों में किसी नन्ही सी कोमल कोंपल पर अपने ही विचारों के उद्रेक में थिरकती ओस की बूँद हो वह। खूबसूरती का कोई ऐसा अलग सा प्रतिमान नहीं था ,परन्तु उसका होना ही उस पल की सबसे खूबसूरत बात होती थी । उसकी गहरी नीली आँखें जैसे समंदर की गहराई संजोये हो .... ख़ामोशी में भी बोलती । जिस पर नजर पड़ जाये उसके दिलो दिमाग पर कब्जा कर लेती थीं ।

किसी से भी कुछ खास बात नहीं करता । जैसे बोलना टालता रहता हो । सबसे अलग ,अपने में ही गुमसुम सा रहता है । इतनी खामोशी, या कह लूँ कि शून्य में अपने आप को समाहित करके भी अपनी नामालूम सी उपस्थिति अनुभव करवा ही देता था । पढ़ाई हो या खेल ,संगीत हो या साहित्य हर क्षेत्र में अव्वल रहता है। वाद - विवाद प्रतियोगिता हो अथवा जैम जैसा खेल ,वह इतनी सहजता से हर तरह के विषय पर यूँ धाराप्रवाह बोलता ,वह भी भाषा और उच्चारण की शुद्धता के साथ कि सब मन्त्रमुग्ध से उसको ही सुनते रह जाते । उसकी खामोशी कभी भी घमण्ड का अनुभव नहीं होने देती थी । इसका कारण भी तो था ... किसी की भी जरूरत के समय वो सबके लिये उपलब्ध रहता था ।

अनजाने में ही उसकी सराहना करते - करते अन्विता ने उसको अपने दिल की धड़कन बना लिया । ये बावरा मन न जाने कितने सतरंगी सपने सजाने लगा है । कभी अग्नि के इर्दगिर्द फेरे लेने की कल्पना करता है ,तो कभी उसकी ही बाँहों में अंतिम साँस लेने की । परन्तु अनिकेत को जैसे अन्विता की भावनाओं की परवाह ही नहीं थी । अक्सर देखती कि जब बाकी के सब साथी ,अन्विता के साथ कि कामना में जैसे गणेश - परिक्रमा करते लालायित रहते कि उसकी कुछ सहायता कर के निगाहों में विशिष्ट स्थान पा लें ,अनिकेत एकदम खामोशी से विपरीत दिशा में चला जाता ।

आज जैसे ही अन्विता कक्षा से बाहर आई अनिकेत दिख गया । अपने में ही खोया हुआ सा ,इतना मासूम ... इतना पावन ... जैसे कोई नन्हा सा बादल राह भटक कर आ गया हो । अन्विता ने सोचा कि उससे बात करके इस तरह अनदेखा किये जाने का कारण पता कर ही ले और अनायास ही उसकी तरफ बढ़ चली ।

अनिकेत ने जैसे भाँप लिया हो कि अन्विता के उसकी तरफ बढ़ते हुए कदम कुछ अलग ही दृढ़ता लिये हुए हैं । वह एक झटके से लाइब्रेरी में जाकर बैठ गया । उसने अपने को जैसे एक सुरक्षित दायरे में कैद कर लिया । अब लाइब्रेरी में तो जो भी आएगा, वो बातें तो नहीं ही कर पायेगा । एक किताब खोल कर उसने खुद को उसमें डुबा दिया ।

कुछ ही पल बीते होंगे कि उस को लगा जैसे कोई उसके ठीक सामने ही बैठ गया हो । निगाहें उठा कर देखा तो सामने अन्विता मुस्कुराती बैठी थी । अनिकेत ने झटके से किताब बन्द की और लाइब्रेरी से बाहर निकल गया ,जैसे उसको कुछ जरूरी काम याद आ गया हो ।

अन्विता एक पल को तो हतप्रभ रह गयी । उसने खुद को सम्हाला और दृढनिश्चय के साथ उसके पीछे चल पड़ी । अनिकेत अब परेशान होने लगा कि आज अन्विता उसका इस तरह पीछा क्यों कर रही !

थोड़ी देर तो अटकता - ठिठकता सा चलता रहा, पर जब उसने देखा कि अन्विता भी पीछे - पीछे चली आ रही है । अपेक्षाकृत थोड़ी कम भीड़ वाली जगह पर उसके रुकते ही ,अन्विता एकदम से सामने आ गयी और सिसक सी पड़ी ,"अनिकेत मुझे मेरा कुसूर जानना है कि मैंने ऐसी कौन सी गलती कर दी है कि तुम मुझसे सामान्य सी बात भी नहीं करते हो ! बाकी सब के साथ तो तुम्हारा ऐसा व्यवहार नहीं रहता ... सबकी सहायता भी भरपूर करते हो ...जबकि मेरे साथ से ही जैसे बचते रहते हो ... अब मैं थक गई हूँ तुम्हारा पीछा करते - करते ,आज मुझे कारण जानना है । तुम यहाँ मेरे साथ बैठो और बातें करो मुझसे क्योंकि बिना तुम्हारा उत्तर सुने न तो मैं जाऊँगी और न ही तुमको जाने दूंगी ।"

अनिकेत का चेहरा पीड़ा से भर उठा और टालता सा बोला ,"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । तुमको गलतफहमी हुई होगी ।"

परन्तु आज जैसे अन्विता कुछ और सुनने को तैयार ही नहीं थी । उसने अनिकेत का हाथ पकड़ कर वहीं बेंच पर बैठा लिया और चुपचाप उसको देखती रही ।

कुछ पलों की चुप्पी के बाद जैसे अनिकेत ने कुछ निश्चय किया और अन्विता की तरफ देखता हुआ बोला ,"मैं अपनी जिंदगी के कड़वे सच के साथ ही अपनी अंतिम साँस तक चुप रहना चाहता था । किसी से भी अपना दर्द नहीं बाँटना चाहता । जानती हो क्यों ... क्योंकि मेरी पीड़ा .. मेरी विवशता को कोई नहीं समझेगा । हाँ सबकी निगाहों में उपहास का पात्र जरूर बन जाऊँगा । "

"तुम कहना क्या चाहते हो अनिकेत ",अन्विता उलझन में थी ।

"मेरे बारे में तुम क्या जानती हो ... सिर्फ इतना ही न कि मैं पढ़ने में अच्छा हूँ ... सबके साथ व्यवहार अच्छा करता हूँ ... जितना सम्भव हो सबकी सहायता करना चाहता हूँ ... हाँ ये भी सच है मेरे बारे में ... पर जानती हो सिर्फ यही नहीं है मेरा सच ... जिस पल तुम मेरा पूरा सच जान जाओगी ,जीवन में फिर कभी मुझको देखना भी नहीं चाहोगी ... मुझसे तुम इस तरह बचोगी जैसे मैं कोई छूत की बीमारी हूँ ... !"

लगातार इतना बोलने के बाद जैसे उसकी आवाज में थकान और बेबसी भर गई ,"तुमको क्या लगता है कि मैं तुम्हारी भावनाओं को नहीं समझता ... सब समझता हूँ ... पर कुछ कर नहीं सकता मैंने इतना लाचार खुद को कभी नहीं पाया ... खुद पर गुस्सा भी बहुत आता है मेरी परिस्थितियाँ ऐसी क्यों हैं ... रोज खुद से लड़ता हूँ और बहुत कोशिश करता हूँ तुमको अनदेखा करने का ... पर जानती हो ये करने में मैं खुद कितना टूटता जा रहा हूँ ... इस बिखराव का कारण जानना चाहोगी ... जिस पल मुझे तुम्हारी पहली झलक मिली थी, उसी पल से मैं तुमको बहुत पसन्द करने लगा हूँ ... देखो कितना डरता हूँ मैं अपनी परिस्थितियों से कि अभी भी नहीं कह पा रहा हूँ कि मैं तुमको प्यार करता हूँ ... इसका कारण सिर्फ यही है कि कोई भी मुझे अपनी नजरों से कितना भी गिरा ले ,पर मैं तुम्हारी नजरों में गिरना नहीं चाहता ... "

अन्विता की उलझन बढ़ती ही जा रही थी ," अनिकेत जब तुम मुझको इतना चाहते हो और तुमको तुम्हारे प्रति मेरी भी चाहत पता है ,फिर समस्या क्या है ?"

अनिकेत को जैसे किसी ने तप्त अंगारों पर डाल दिया हो ,वह छटपटा उठा ,"जानना चाहती हो क्यों ... क्योंकि मैं रेप - चाइल्ड हूँ ! "

वह बोलते हुए जैसे किसी अंधकूप में चला गया ," एक दिन कॉलेज से लौटते हुए मेरी माँ का कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया था और जब उसको होश आया ,तब उसके सामने उसका ही साथी छात्र खड़ा था उसकी अस्मत को तार - तार करते हुए । इसका भी कारण जानना चाहोगी ... मेरी माँ ने उस सहपाठी के प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया था , क्योंकि वो खूब पढ़ - लिख कर जिंदगी में कोई उच्च स्थान पाना चाहती थी ... ऐसा स्थान और सामर्थ्य जिससे वो सबका सहारा बन सके .... उस दिन उस नीच ने माँ को विवश कर अपनी मनमानी कर ली और अट्टहास करने लगा था कि अब तो माँ विवशता में उसकी बात मान कर विवाह कर लेगी ... और जानती हो माँ ने तब भी उसका तिरस्कार किया और अपने दिल में अपना गम छुपा अपनी शिक्षा पूरी करने में लग गयी । "

"कुछ दिनों में जब मेरे अस्तित्व में आने का आभास हुआ ,तब भी सब ने माँ को समझाया कि उसी से शादी कर लें क्योंकि वो नीच बार - बार अपने साथ माँ के विवाह का प्रस्ताव भेजता रहता था ... पर तब भी माँ ने सबकी सलाह को ठुकरा दिया और अपने घर से दूर जाकर अपनी शिक्षा पूरी की और मुझे जन्म भी दिया ... जब साथ के लोग मुझको रेप - चाइल्ड कहते और मैं रोता ,तब माँ ने मुझको हॉस्टल में रखा जहाँ से मैंने पढ़ाई की । अब माँ की तबियत खराब रहने लगी है ,इसीलिये मैं जबर्दस्ती माँ के पास ही रह कर यहाँ पढ़ाई कर रहा हूँ ... "

"अब मैं नहीं चाहता कि मेरी माँ पर कोई भी लांछन लगाए ,इसीलिये मैंने अपनेआप को तुमसे दूर रखने की कोशिश की ... मैं भी जानता हूँ कि कोई भी मुझसे कितना भी प्यार करे या मैं अपने जीवन में कितना भी सामर्थ्यवान हो जाऊँ मेरे जन्म का सच कभी नहीं बदलेगा । "

अन्विता स्तब्ध सी उसको देखती चुप बैठी रह गयी । अनिकेत पीड़ा में भी हँस पड़ा ,"देखा सच जानने के बाद तुम्हारा मेरे प्रति नजरिया बदल गया न ... अब तुम जल्दी से जल्दी यहाँ से भाग जाना चाहती हो न ... जाओ ,तुम भी चली जाओ ... परन्तु मेरे रेप - चाइल्ड होने से भी बड़ा सच ये है कि मैं अपनी माँ की तरफ उठती कोई उंगली सहन नहीं कर सकता ,इसीलिये मैं अकेला ही रहूँगा ।"

अन्विता ने अनिकेत का हाथ मजबूती से पकड़ लिया ,"इतना दर्द .. इतनी कड़वाहट अपने अंदर तुम छुपाये बैठे हो ... वो भी उस बात के लिये जिसमें तुम्हारी कोई गलती ही नहीं है ... जिसने हर तरह का विरोध और कष्ट सहा पर अपने निश्चय पर अडिग रहीं और तुमको भी इतने अच्छे संस्कार दिए .. सच ऐसी माँ की तो पूजा करनी ही चाहिए ... मुझे अपनी पसंद पर गर्व है जिसने इतने दृढमना व्यक्ति को चुना ... ।"

अनिकेत को उलझन में पड़ता देख अन्विता उसमें आत्मबल भरती सी बोल पड़ी ,"तुम्हारा रेप - चाइल्ड होना तुम्हारी गलती नहीं है । पर हाँ तुम्हारा इतना अच्छा होना जरूर माँ के दिये संस्कार हैं ... एक बात बताओगे ... क्या ये माँ मुझको मिल सकती है ... तुम्हारी जीवनसंगिनी बनना चाहती हूँ ,क्या मुझको तुम अपनाओगे ... मेरे परिवार में भी किसी को आपत्ति नहीं होगी इसका विश्वास मैं दिलाती हूँ !"

अनिकेत स्वप्नलिखित सा कहीं दूर क्षितिज में आकाश और धरा को एक दूसरे में समाहित होते देख रहा था ..... 
                                                                                                                ..... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'


गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

शीर्षक : मंज़िल मिल जाएगी


शीर्षक : मंज़िल मिल जाएगी

***
कैसे कह दूँ कि मैं परेशान नहीं हूँ ,
बिखरी सी राहों में पशेमान नहीं हूँ ।

उखड़ी सी साँसों से साँस भरती हैं ,
हाथों को नज़रों से थाम कहती हैं ।

जानेजां कर तू परस्तिश हौसलों की ,
इन्हीं राहों में हम फिर मिल चलेंगे ।

ज़िंदगी जिंदादिल वापस मुस्करायेगी ,
अपने होने का यूँ एहसास कराएगी ।

लरज़ते कदमों से ही तू चल तो सही ,
कह रही 'निवी' मंज़िल मिल जाएगी ।।
      .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

ख़्वाहिश और ख़्वाब

ख़्वाहिश और ख़्वाब

ये "ख्वाहिश" रही कि वो "ख़्वाब" ही न रह जाते
हर्फ़ दर हर्फ़ हक़ीकत बन यादे सहरा में बस जाते

मेरे ख़्वाब कभी यूँ  ख़्वाहिश तुम्हारी बन जाते
तुम ख़्वाहिश बन ख़्वाब में मेरे बसेरा बन जाते

ये खलल ये ख़लिश, यही तो इक याद है मेरी
परेशां न  होते तुम तो ये ख्वाब  कहाँ उमगते
                     .... निवेदिताश्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

लघुकथा : सैनिटाइज़

लघुकथा : सैनिटाइज़

वसुधा बहुत बेचैन थी । उसके शरीर पर जगह - जगह छाले उभर गये थे ,जिनसे उठने वाली टीस ,वसुधा के हलक से कराह बन कर सिसक उठती थी । जब वह अपने केशों को देखती ,तब वह बिलख उठती थी । उसके घने केशों को कैसे काट दिया गया था और सजावटी ब्रोच लगा दिए गए थे ,पर वो ब्रोच उसको चोट पहुँचाते खरोंच से भर देते थे । निर्मल नयन भी अपनी निर्मलता खो कर धूमिल हो चले थे ।

जब उससे पीड़ा नहीं सही गयी ,तब वो बिलख कर कातर स्वर में गगन को पुकार उठी ,"ओ मित्र ! मेरी इस पीड़ा को शमित करो न ।"

गगन व्यथित मन से बोल उठा ,"वसुधा ! तुम्हारी सहायता करने कोई और नहीं आएगा । तुम स्वावलम्बी बन अपना उपचार स्वयं करो । कभी करवट ले कर तो कभी गर्मी बढाकर सेंक लें कर । कभी छालों को ठण्डा करने के लिये शीतलहर भी बहाना होगा । देखना सब बेचैन हो कर तुमको कोसेंगे भी ,परन्तु तुम बिलकुल भी विचलित मत होना । "

वसुधा भी विचारमग्न हो कह पड़ी ,"हाँ ! मुझे प्रकृति को भी तो खुद को सैनिटाइज करना चाहिए  ... फिर कुछ तो  बैक्टीरिया छटपटाहट में मेरी भी पीड़ा समझ कर सम्हल जाएंगे ।"
                                            ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

लघुकथा : उम्र

लघुकथा : उम्र

कब से बैठी शून्य में ही टकटकी लगाए बैठी थीं वो । हर पल खिलती खिलखिलाती बातों  की फुहार सी हर कहीं  बरसने वाली बदली धुंध बनती जा रही हो जैसे ।

नन्हा गोलू गेंद खोजता हुआ उधर आ गया और उनको देख बोल पड़ा ,"दादी चलो न रेस लगाते हैं ,वैसे भी मेरी गेंद मिल ही नहीं रही ।"

"नहीं बेटा ,अब मैं रेस नहीं लगा पाऊँगी । दर्द बहुत हो रहा है ।"

"कहाँ दर्द है दादी ? चलो डॉक्टर के पास चलते हैं ।"

"नहीं गोलू ,अब मैं ठीक नहीं हो पाऊँगी । मेरे डॉक्टर को भगवान ने अपने पास बुला लिया है न । अब मैं बूढ़ी हो गयी हूँ ",कहती हुई वह एक हाथ घुटनों पर और दूसरा पीठ पर रख कर उठने का प्रयास करने लगीं ।

"दादी अभी जब हम घर से आये तब तक आप मुझसे रेस लगाती आयी हैं ,अचानक क्या हो गया ?  अरे हाँ आप फ़ोन पर किससे बात कर रही थीं ।"

"बेटा वो मेरे छोटे भाई का फ़ोन था ,वो मेरी माँ ....   " छलक आयी पलकों की नमी को सुखाती बोल पड़ी ,"बेटा  अब तो मैं बड़ी हो गयी हूँ ।"
                               ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

लघुकथा : प्यार

लघुकथा : प्यार

सहमी सी अनुभा घर में घुसते ही विदिशा से लिपट गई ,"माँ ! प्यार करना कोई बुरी बात होती है क्या ? नेहा को उसके घरवालों ने बाहर निकलने से मना कर दिया है कि वो किसी से प्यार करती है ।"

विदिशा ने उसको अपने पास बैठा लिया ,"बेटे ! सबसे पहली बात तो तुम ये समझ लो कि कोई भी बात या मनोभाव गलत नहीं होता ,गलत होती है उसके पीछे की नीयत ।"

"माँ ! मैं समझी नहीं ... "

"देखो हम इंसानों की क्या बात ,जिनको हम पूजते हैं ,वो देव भी प्रेम करते हैं । प्रेम की पराकाष्ठा है सीता का राम से प्रेम जिन्होंने कितने कष्ट सहे पर राम का साथ सदैव दिया ,विशेषकर विपरीत परिस्थितियों में । सहभागिता और साख्यभाव वाला प्रेम राधा कृष्ण का है । अपमान न सहन कर पाने पर जब सती  हवन कुंड में जल गयीं तब भोलेनाथ उनके अपमान पर क्रोधित होकर ताण्डव कर सम्पूर्ण सृष्टि का ही विनाश करने लगे थे ।"

"पर माँ !इसमें तो कुछ गलत है ही नहीं ... फिर नेहा को ..."

"सही कह रही हो बिट्टू ... ये प्रेम का विशुद्ध रूप है । कहीं कोई दुराव छुपाव नहीं है ,यदि है तो सिर्फ एक दूसरे के प्रति सम्मान । नेहा या किसी का भी प्रेम करना गलत नहीं है ,गलत सिर्फ यही है कि उसने छुपाने की कोशिश की । "

"माँ ! इसमें बताने जैसा क्या है ... "

"तुमलोगों ने अभी सिर्फ परिवार का निस्वार्थ प्रेम ही देखा है । दुनिया में धोखेबाजों की भी कमी नहीं ,जिनको तुम लोग सम्भवतः समझ नहीं पाओगे । यदि बड़ों को बता दोगे तो वो तुमको गलत व्यक्ति के झूठे प्रेम से बचा लेंगे ।"

"मैं समझी नहीं माँ ... "

"प्रेम का मूल तत्व समर्पण ,साख्य और सुरक्षा देती भावना है ,जब ये समझ जाओगी तब इससे खूबसूरत कुछ है ही नहीं ... ये समझते ही किसी बन्धन की कभी जरूरत ही नहीं रह जायेगी ।"
                  .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 24 मार्च 2020

लघुकथा : हेल्प


लघुकथा : हेल्प

हाँ ! बताओ क्या करना है ।आज कोई मीटिंग नहीं ,ऑफिस भी नहीं ... क्या हेल्प करूँ ... चाय बनाऊँ इलायची डाल कर ... 🤔😀 ( बन्दा पूरे जोश ओ खरोश में )

हेल्प ... छोड़ो तुम रेस्ट करो ... चाय के साथ क्या लोगे ... ( घर मे दिख जाने का एहसान मानती बन्दी )

नहीं ... आज तुम रेस्ट करो ,मैं बनाता न ... ( बन्दा  एकदम टॉप ऑफ वर्ल्ड टाइप महसूस करते )

ऐसा क्या .... अच्छा ऐसा करो चाय के साथ पनीर के पकौड़े बना लेना और डिनर में एक ही सब्जी कोफ्ते बना लो साथ मे जीरा राइस ... और हाँ रोटी नहीं पूरियाँ बनाना ... डेज़र्ट चलो बाजार से रबड़ी ले आना और हाँ कॉर्नेटो भी लेते आना ... चलो तबतक मैं कुछ रिकॉर्ड कर लेती हूँ इधर बहुत दिनों से अपने चैनल पर कुछ शेयर नहीं किया !
                                       ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 23 मार्च 2020

लघुकथा : नारायण अस्त्र

नारायण अस्त्र : लघुकथा

दादी और उनका पोता विहान दोनों ही बार - बार खिड़की से झाँक कर बाहर देखते ,फिर झुंझला कर वापस बैठ जाते। आखिर वो करें भी क्या इस लॉकडाउन में अनुभा ने उन दोनों को बाहर निकलने से रोक जो रखा है । सच्ची डर भी तो है कि इस महामारी के इंफेक्शन का !

अनुभा भी उन दोनों की उलझन देख रही थी । अचानक ही वह उठ कर रसोई में चली गयी और चटपटे पकौड़ों की प्लेट थामे उनके पास आ गयी ,"क्या हो गया आप लोग बोर हो रहे हो ... अच्छा ऐसा करते हैं दादी माँ नारायण अस्त्र की कहानी सुनाइये हमसब को ।"

छुटकू विहान किलक उठा कहानी के नाम से और दादी माँ भी व्यस्त होने के सुकून में कहानी के साथ बह चलीं ,"पिता द्रोण के धोखे से मारे जाने से क्रोधित  अश्वत्थामा ने पाण्डव सेना पर नारायण अस्त्र से प्रहार कर दिया जिसका कोई प्रतिकार कर ही नहीं पा रहा था । ये देख कृष्ण ने सबको उस का प्रतिकार करने से रोक दिया और उस दैवीय अस्त्र के शान्त होने की प्रतीक्षा शान्त भाव से करने को कहा । विरोध न पा कर अस्त्र भी शान्त हो गया और सब सुरक्षित हो गये ।"

"अरे वाह दादी माँ ! ये तरीका तो बहुत अच्छा है बचाव का ",विहान दादी माँ के गले में झूल गया ।

अनुभा मुस्कुरा पड़ी ,"जानते हो विहान हम सब भी अगर ऐसे ही शान्त भाव से घरों में रहें ,तो इस महामारी के बैक्टीरिया फैल ही नहीं पाएंगे और धीरे - धीरे खतम हो जायेंगे । तब तक हमारे वैज्ञानिक भी इसकी प्रतिरोधक दवाइयां खोज लेंगे ,फिर हम सब सुरक्षित रहेंगे । बस तब तक हम सब को घर में रह कर खुद को ही प्रतिरोधक दवा बनना है । "
                 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 21 मार्च 2020

विनम्र अनुरोध 💐💐

विनम्र अनुरोध भक्त ,कमभक्त और कमबख्त नीयत वालों से 💐💐

कल 22 मार्च 2020 ,रविवार को आप ये देखने भी न निकले कि कितने लोग निकले कितने नही । जो दिनचर्या अभी तक के रविवार (अवकाश के दिनों में ) को अपनाते थे और अपने में ही मस्त रहते थे ,घर पर रहते थे ... बस वही कल भी कीजियेगा ।

शँख ,घण्टी ,ताली ,थाली जिसको जो भी उचित लगे अवश्य बजायें ,बिना किसी की परवाह किये हुए । यदि आपको संकोच लगे तब अपनी दादी - नानी की बातों को याद कर लीजियेगा कि पहले जब शिशु का जन्म होता था तब घर के बुजुर्ग थाली ,परात ,थाल बजाते थे ... और इतना बजाते थे कि कभी कभी वह पात्र टूट जाता या टेढ़ा हो जाता था । घर पर बधाई ( बधावा ) के सामान ले कर बुआ ,मामा या अन्य रिश्तेदार भी ऐसे ही आते थे । बैण्ड वगैरा का प्रचलन तो बहुत बाद में हुआ । हम सब इस समय अपने एकमत होने की खुशी और अनिवार्य सेवाओं के सजग प्रहरियों के सम्मान में सकारात्मक ध्वनि ऊर्जा प्रवाहित करेंगे ।

सतर्क रहिये और विरोध के स्थान पर आत्ममंथन अवश्य कीजिये ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

मंज़िल मिल जाएगी ....

कैसे कह दूँ कि मैं परेशान नहीं हूँ
बिखरी सी राहों में पशेमान नहीं हूँ
उखड़ी सी साँसों से साँस भरती है
हाथों को नज़रों से थाम कहती है
जानेजां कर तू परस्तिश हौसलों की
इन्हीं राहों में हम फिर मिल चलेंगे
ज़िंदगी जिंदादिल वापस मुस्करायेगी
अपने होने का यूँ एहसास कराएगी
लरज़ते कदमों से ही तू चल तो सही
कह रही 'निवी' मंज़िल मिल जाएगी
      .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

जनता कर्फ्यू ....

जनता कर्फ्यू ....

कल से जनता कर्फ्यू के पक्ष - प्रतिपक्ष में बहुत सारी बातें सुन और पढ़ रही हूँ ...

बहुत सी बातों और उनके कहे जाने के तरीके से सर्वथा असहमत होते हुए भी मैं ख़ामोश ही रह गई । परन्तु इस पूरी चर्चा ( ? ) में जनता कर्फ्यू का विरोध भी पढ़ा और कम समय के लिये इसको लगाया जाना भी पढ़ा ,तब लगा कि हर समय की ख़ामोशी भी गलत है ।

जनता कर्फ्यू सिर्फ 7 बजे से 9 बजे तक घोषित है ,परन्तु थोड़ा सा भी विचार कीजियेगा तब आपको खुद ही समझ आ जायेगा कि यह शनिवार की रात लगभग 10 / 11 बजे ( सामान्यतः तब तक सभी अपने अपने घरों में वापस आ जाते हैं ) से ले कर सोमवार की सुबह लगभग 7 बजे तक ( सामान्यतः अधिकतर लोग अपने अपने कार्यक्षेत्र के लिए तभी घरों से निकलते हैं ) तब तक बिना कुछ कहे ही प्रभावी हो जाएगा । यदि इसीको बोलकर किया जाए तो दहशत के माहौल में और भी वृध्दि हो जाएगी ।

राजनीति से परे हो कर भी सोचें तो कल का प्रधानमंत्री मोदी जी का उदबोधन परिवार के मुखिया जैसा ही था ,जिसमें बिना किसी को दहशत में लाये समस्या से सभी परिवारी जनों को सुरक्षित रखना ही है ।

अभी सिर्फ विरोध के लिये विरोध करने की मानसिकता से ऊपर उठने और सब का साथ देने का समय है ।

सबका साथ दें ,सुरक्षित रहें और रखें .... क्योंकि विरोध करने के लिये दोनों का होना आवश्यक है आप का भी और जिसका आप विरोध करते हों उसका भी ।
                                   .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 14 मार्च 2020

गीत : सवेरे - सवेरे .…

सफ़र लम्बा सही चल पड़ो सवेरे - सवेरे
मिल ही जाएगा मुक़ाम सवेरे - सवेरे

मन व्यथित हुआ तन शमित भी हुआ
किसी ने नश्तर चुभोये सवेरे - सवेरे

पाँव के आबलों ने रोक रखी जो राह
क़दम भी लड़खड़ा गये सवेरे - सवेरे

प्रसून यूँ प्रमुदित हुए पात भी झर चले
दरख़्त ये भी ढ़ह जायेगा सवेरे - सवेरे

हँस के मिला करो मिल के हँसाया करो
उड़ जायेगा पंछी इक रोज सवेरे - सवेरे

डगर मुश्किल सही सफ़र तन्हा सही
निवी मुक़ाम पर है खड़ी सवेरे - सवेरे
            ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 8 मार्च 2020

होली गीत : ए सखी आयो कन्हाई री ...


होली गीत

ए सखी आयो कन्हाई री ...

उड़त अबीर गुलाल
रंग भयो रतनार
पकड़ लयी कलाई री
ए सखी आयो कन्हाई री ....

बाजे झाल मृदंग
थिरक थिरक जाए अंग
झूम उठे अमराई री
ए सखी आयो कन्हाई री ...

भूल गए राग द्वेष
मिट चले सारे क्लेश
झूमे चंहु ओर पुरवाई री
ए सखी आयो कन्हाई री ...

चले प्रियतम संग
छलके मन मे रंग
चुनर लहर लहर उड़ जाई री
ए सखी आयो कन्हाई री ...

मन में छाए उमंग है
तन में बसे अनंग है
फागुन करे जबराई री
ए सखी आयो कन्हाई री ...
                ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 1 मार्च 2020

सफ़र ज़िन्दगी का .....



गुनगुनाती रही रात भर मैं गज़ल।
साथ तुम भी कभी गुनगुनाया करो।।

मुस्कराते रहे चश्मे नम शब भर
हो सके कभी सच भी बताया करो

सारे' सपने सच खिल ही जायें'गे
सच कभी बन तुम जगमगाया करो

सच कहो साथ कभी  इतना दुश्वार नहीं
भाव जो मन बसे ना छुपाया करो

सफ़र ज़िन्दगी का है मुश्किल मगर
दो कदम साथ 'निवी'  निभाया करो
         .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

अब चलूँ ....



अब चलूँ ......

थाम लिया था तुझे जब वक्त ने कहा अब चलूँ
छूटती उंगलियों की जुम्बिश से कहा अब चलूँ

बेरुखी दिख ही गयी उन अपनी सी आँखों मे
छलकती आँखों ने बिना बोले कहा अब चलूँ

महफ़िल सजी थी तेरे दर पर चन्द अपनों की
खामोश निगाहों ने भी बरबस कहा अब चलूँ

कहने को दुनियावी सरंजाम सजाए बहुत थे
दिलों के रीते पड़े से पैमाने ने कहा अब चलूँ

सुना था तेरे दिल के सागर में नमी बहुत है
सहरा से आ गयी दूरी ने भी कहा अब चलूँ

यादों की कश्ती तो बड़ी हंगामाखेज बही
जज़्बातों के सुराखों ने भी कहा अब चलूँ

सफ़र तेरे साथ का अभी बहुत रह गया बाकी
बातों में तेरी आ गई ख़लिश ने कहा अब चलूँ

तुमने जतलाया नहीं पर छुपाया भी तो नहीं
खुली पलक सब देख 'निवी' ने कहा अब चलूँ
                      .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

लघुकथा : बुके

लघुकथा : बुके

सखियों की मण्डली खिलखिलाती बातें करती लॉन में जमी थी । बातों का दौर न जाने कहाँ - कहाँ की सैर करता घर की तरफ मुड़ गया और अनायास ही एक - दूसरे की प्रशंसा और टिप्स लेने - देने का दौर चल निकला ।

शान्त सी बैठी निकिता की तरफ सब एकदम से ही घूम पड़ीं ,"सच घर रखने के तौर - तरीके तो तुमसे सीखने चाहिए । हर सामान अपने स्थान पर इतने व्यवस्थित रूप में रहता है कि आँखें बंद कर के और कदमों को गिन कर उठा लो । सच बता न इतनी अच्छी तरह से कैसे मैनेज कर लेती हो ।"

निकिता चुप चुप सी मन्द मुस्कान बिखेरती रही । सबके बार - बार पूछने पर बोल पड़ी ,"बिखेरनेवाले जो साथ नहीं हैं .... कोई बात नहीं अब जब मैं बस बाग नहीं सजा पाती हूँ तो ऐसे ही छोटे - छोटे लम्हों वाली पार्टी के बुके बना लेती हूँ ।"
      .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

उधार बाकी है ...

उधार बाकी है ...

ज़िन्दगी थोड़ी मोहलत मुझे दे दे
इस ज़िन्दगी का कुछ उधार बाकी है

नयन नम हो गए ,स्वप्न भी झर गये
नयनों में सपनों का उधार बाकी है

साँसें भी थक चली ,पग भी थम गये
मंजिल का उधार अभी बाकी है

*तन* तो मिट्टी हुआ भस्म यूँ बन गया
एक पेड़ का उधार अभी बाकी है
 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

लघुकथा : रेत के कण

लघुकथा : रेत के कण

रेत के कण बार - बार उड़ कर आँखों मे पड़ रहे थे और उनसे बहती हुई अश्रुधार एक बहलावा सा दे रही थी कि अकेली बैठी अनघा आँसू नहीं बहा रही है बल्कि वो कण आँखों से पानी निकालने पर विवश कर रहे हैं ।

उधर से गुजरती बच्ची ने अनघा को रुमाल देते हुए कहा ,"आंटी आप आँख पोछ लो । ये रेत समुद्र के पानी से रोज ही भीगती है तब भी पता नहीं क्यों इतनी रूखी होती है कि आँखों में पड़ कर परेशान करती है । आप ऐसा करो न उस तरफ पीठ कर के बैठ जाओ । फिर आपकी आँखों मे रेत भी नहीं पड़ेगी और जिन लहरों में साहस होगा ऊँचा उठने का वो ही आप तक पहुँच पायेंगी  । "

अनघा उसको देखती रह गई । इतनी छोटी सी बच्ची उस की समस्या का समाधान कर गयी । भरे - पूरे परिवार को वो अपने स्नेह जल से सिंचित ही करती रही परन्तु उसके हिस्से में सबकी चुभती हुई ,रूखी बातों की चुभन ही आयी । शायद निरन्तर सबका ध्यान रखते - रखते अपना ध्यान रखवाना वो भूल ही गयी थी । अब जरूरत उधर से चेहरा फेरने की ही थी । जिसको उसकी जरूरत होगी वो उसके पास आयेगा ही ।

तभी फोन पर ट्रैवल एजेंट का नम्बर चमकने लगा । उसने फोन रिसीव किया ,"क्या निश्चय किया आपने ... महिलाओं वाले ट्रिप में अब सिर्फ एक ही सीट बची है । बाद में कुछ नहीं कर पाऊँगा ।"

अनघा एक सुकून की साँस लेती बोल पड़ी ," हाँ ! मैं चल रही हूँ । "
       ... निवेदिता श्रीवास्तव "निवी"

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

लघुकथा : शिरोरेखा


लघुकथा : शिरोरेखा

माँ शिरोरेखा अपने अक्षर बच्चों को निहारती प्रमुदित हो रही थी ,अनायास ही उसका ध्यान गया कि कुछ बच्चे खुशी से थिरक रहे हैं ,वहीं उनके जुड़वाँ मन म्लान किये सिमटे हैं ।

"क्या हुआ बच्चों तुम इतने उदास क्यों हो रहे हो ... अपने बाकी के भाई बहनों के साथ खेलो न ... "

किसी भी उदास अक्षर से कोई भी प्रतिक्रिया न पाकर ,उसने फिर से उन अक्षरों को अपने आँचल में समेटना चाहा ,तब एक अक्षर सिसक पड़ा ...

"माँ ! हमारे बाकी के साथियों को उनकी गरिमा को समझने और प्यार करने वाली  वाणी का साथ मिला है इसलिये वो कभी भी अपशब्दों की कटुता को नहीं अनुभव कर पाते हैं और मासूम हैं ।"

तभी 'म' अक्षर बोल पड़ा ," देखों न माँ ! मुझसे ही तो कई शब्द बनते हैं ,अब जैसे आप को ही पुकारते हैं ,परन्तु हम जहाँ हैं वो इसके आगे शब्दों विकृत कर माँ के प्रति गाली बोलते हैं । हमारा मन चीत्कार कर उठता है ,परन्तु कर कुछ नहीं पाते ।"

'भ' भी बोल पड़ा ,"हाँ माँ ! देखो न मुझसे भगवान ,भगवती ,भार्या ,भगिनी जैसे विश्वास बाँधते शब्द बनते हैं ,पर जहाँ मैं हुँ उसने मुझे सिर्फ गाली बना रखा है ।"

शिरोरेखा सिसक पड़ी ,"हाँ ! बच्चों भाषा का अनुशासन सब भूल चले हैं ।"

एक पल बाद ही सारे शब्द और शिरोरेखा आत्मविश्वास से भर उठे ,"जो हमारी गरिमा का प्यार से निर्वहन नहीं करेगा ,उसके विचार कभी भी कालजयी नहीं होंगे और समय की लहरों में खो जाएंगे ।"
           .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

लघुकथा : मोच

लघुकथा :  मोच

विदिशा पार्क में बैठी विशाखा को खामोशी से बच्चों को खेलते देख रही थी । कितने दिनों के अथक प्रयास के बाद वह उसको घर की लक्ष्मणरेखा से निकाल कर यहाँ ला पाने में सफल हो पाई थी ।

"चल एक चक्कर लगाते हैं पार्क का ",विशाखा ने हाथ बढ़ाया ।

"नहीं चल पाऊँगी ... देख न कल पैर मुड़ गया था ,मोच आ गई है ।"

विदिशा ने टोटलती नजरों से विशाखा को देखते हुए उसकी दोनों बाँहें पकड़ झकझोर दिया ,"जानती है मोच तेरे पाँव में नहीं बल्कि तेरी सोच में आई है । कब तक इस तरह की बातों के पीछे छुपकर खुद को मरती रहेगी ! "

"काश मेरी विवशता तू समझ पाती ",विशाखा की पलकें भीग गयी ।

उम्मीदों के अनगिनत जुगनुओं की चमक से भर विदिशा ने विशाखा के झुकते चेहरे को उठाया ,"तू कोई विवश नहीं है ,बस सच को स्वीकार ही नहीं कर रही है । कितना भी चाह ले ,परन्तु अपनी आयु पूरी किये बिना तू मर भी नहीं सकती । एक बात और भी याद रख ... अगर इस मनःस्थिति में तू कोई कायराना कदम उठाती है तो यह अन्याय होगा तेरे नन्हे मासूम बच्चों पर । हमसफ़र के साथ के मुस्कराते लम्हों की यादों और इन नन्हे फरिश्तों की खिलखिलाती उम्मीदों से अपनी सोच पर बस गयी मोच को दूर कर ।"
              ... निवेदिता श्रीवास्तव "निवी'

सोमवार, 27 जनवरी 2020

गीतिका : मैं गीत सृजन के गाऊँगी ...


गीतिका

शंकाओं के बादल छाए, पर मैं विश्वास जगाऊँगी। 
मैं गीत सृजन के गाऊंगी, धरती पर स्वर्ग रचाऊंगी।

माना जयचंद छिपे घर मे, बाहर अरिदल ने घेरा है
भुजबल प्रचंड सेना का है, मैं यह संदेश सुनाऊँगी।

जब राजनीति हिन्दू-मुस्लिम, के सम्बन्धों से खेलेगी
गंगा जमुनी तहजीबों का, जग में परचम फहराऊंगी।

जब हरे और केसरिया में, अपने समाज को बांटोगे,
है एक तिरंगा ध्वज अपना, फहराकर  मैं बतलाऊंगी।

माना बाधाएँ बहुत अभी, भारत को ऊंचे उठने में,
फिर भी निश्छल प्रयास की मैं, नदियां निर्बाध बहाऊँगी।

हम शिक्षा ,उन्नति स्वाभिमान, के शिखरों पर भी पहुँचेंगे,
लोगों के मन में स्वाभिमान, विश्वास अटल भर जाऊँगी। 

आगे ले जाना पुरखों की थाती ,दायित्व 'निवी' अपना,
सबको हितकारी भारतीय, संस्कृति की राह दिखाऊँगी
          ..... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 22 जनवरी 2020

जो तुम चाहो ....

जो तुम चाहो

देनेवाला ऊपर बैठा
निहारता वारता
बहुत कुछ
देता ही रहता
तब भी रह ही जाता
बहुत कुछ कसकता
अनपाया सा

आज सोचती हूँ
माँग ही लूँ
उस परम सत्ता से
शायद कहीं
लिखनेवाले ने
लिखा हो
जो तुम चाहो ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

पैग़ाम ...

पैग़ाम

बुनना चाहती हूँ एक स्वेटर लफ्जों का
सुन कर ही शायद ठंड अबोला कर जाए

बुनना चाहती हूँ एक स्वेटर अपनी यादों का
यादें आ आकर गुच्छा बन समेट लें वीराने में

बुनना चाहती हूँ एक स्वेटर एहसासों का
छुवन से ही चमक जाए चटकीली सी धूप

बुनना चाहती हूँ एक स्वेटर अपने साथ का
न रहने पर आगोश में भर सहला दें साथ सा

बुनना चाहती हूँ एक स्वेटर मीठे लम्हों  का
तुम तक पहुँचा दे #पैग़ाम मेरे जज्बातों का
            ...... निवेदिता श्रीवास्तव  'निवी'

बुधवार, 8 जनवरी 2020

ज़िन्दगी ....



ज़िन्दगी ने कल यूँ ही चलते चलते रोकी थी मेरी राह
आँखों में डाल आँखें पूछ  डाली थी मेरी चाह

ठिठके हुए कदमों से मैंने भी दुधारी शमशीर चलाई
क्या तुम्हें सुनाई नहीं देती किसी की बेबस मासूम कराह

ज़िंदगी कुछ ठिठक कर शर्मिंदा सी होकर मुस्कराई
सुनते सुनते सबकी बन गई हूं कठपुतली रहती हूं बेपरवाह

आज मैं भी कुछ अनसुलझे सवाल अपने ले कर हूँ आई
दामन जब खुद का खींचा जाता तभी क्यों निकलती आह

गुनगुनाती कलियों की चहक से भरी रहती थी  अंगनाई
कैसे बदले हालात किसने कर दिया मन को इतना स्याह

हसरतों ने बरबस ही दी एक दुआ और ये आवाज लगाई
बेपरवाह ज़िंदगी सुन इस निवी को तुझसे मुहब्बत है बेपनाह
          .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 1 जनवरी 2020

बस इत्ती सी उम्मीद ~~~

 बस इत्ती सी उम्मीद ~~~

आने वाले लम्हों
जरा इतनी सी दुआ देना
आती - जाती साँसों में
अनगिनत लम्हे हो
मानते या मनवाते
या फिर बस
मन ही मन में रहें
थिरकतें - गुनगुनाते

पर  .....
न सिमटे रहें
किसी डायरी के
पन्नों में दुबके
चाहे हो बिंदु भर ही
पर कर लें बसेरा
कैलेण्डर के आनन पर
             ...... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'