गुरुवार, 23 सितंबर 2021

सृंगार अब मैं क्या करूँ !


अवगुंठन की ओट में ,गोरी खड़ी लजाये

दूर देश प्रीतम गए ,ना जाने कब आये !


हथेली हिना हँसने लगी ,चूड़ी खनक जाये

पाँव महावर खिल गये ,पायल गुनगुन गाये !


ऋतु बसन्त की आ गयी ,मदन चलाये तीर

अँखियों में सपने सजे , भूल गयी सब पीर !


कली मोगरे की खिली ,केशों में जा सँवरी

सम्मुख प्रिय को देखती ,सकुचाई कुँवरी !


साजन को देख सामने ,सोचती नयन झुकाय 

सृंगार अब मैं क्या करूँ ,सज रही पी को पाय ! #निवी

सोमवार, 20 सितंबर 2021

जहाँ तेरा आशियाना है !

 तुझसे मिलने माँ !  

उस पार मुझे अब आना है , 

उस क्षितिज के पार  

जहाँ तेरा आशियाना है !  


अंगुली पकड़ चलना सिखलाया  

साध रखूँ कदमों को बतलाया  

सफर बीच हों कितने भी काँटे  

तेरा आशीष लगे हमसाया   

जीवन यात्रा में   

तेरी वीणा बन जाना है !  


पास नहीं पाती हूँ अब तुमको 

हर पल मैं खोज रही हूँ तुमको

थके - थके रहते नयना व्याकुल  

टेरते सदा रहते बस तुमको    

तेरी छाया बन  

चलते ही मुझको जाना है ! #निवी

   

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

लघुकथा : आवाज़ की सीलन

लघुकथा : आवाज़ की सीलन

क्या हुआ ?
कुछ नहीं ।
फिर ...
हूँ !
तुम्हारी आवाज़ क्यों इतनी भीगी सी है ?
आवाज़ की ख़ामोशी में ,वज़ह की सीलन भी जज़्ब है । #निवी

सोमवार, 13 सितंबर 2021

मन बावरा ...

 मन बावरा है न 

आज चाँद बनने को मचल पड़ा

मानो माँ की उंगली थामे 

उचका था बचपन चाँद पकड़ने को !


चाँद बनना है पर वो नहीं 

आसमान में चमकने वाला नहीं 

न ही पानी से भरे थाल में लहराता !


चाँद बनना है पर वही 

चातक की आँखों में चमकता आस बन 

शिशु की किलकारी में किलकता मामा बन !


 मेरे चाँद से मन को पाने के लिये

मत सजाना प्रयोगशाला 

नहीं खोजना गड्ढ़े मन की गहराई में !


बस जगा लेना सम्वेदनाओं को 

मेरा ये चाँद विहँस बस जायेगा

चमकता ही रहेगा तुम्हारे आनन पर  !  निवी

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

जब टूट गयी चप्पल !

जब टूट गयी चप्पल !


पैर जो हमारा पूरा वजन उठाते हैं ,उन पर अधिकतर को बहुत कम ही ध्यान देते देखा है । जब पैर अनदेखी का शिकार होते हैं तो चप्पलों की ऊपरी चमक दमक पर ही ध्यान रहता है न कि उनके स्वास्थ्य ( मजबूती ) पर । इस लापरवाही का खामियाजा तो भरना ही पड़ता है और मैंने भी भरा । दो घटनाएं बताती हूँ 😄


घर के रिनोवेशन का काम चल रहा था ,तभी एक शादी में जाने का निमंत्रण आया । काम से थका तन ,मन को सहला गया कि आज तो बिना मेहनत के ही अच्छा भोजन मिलेगा । बिखरे सामानों में खोजने पर भी मनचाही चप्पल नहीं मिली तो एक रिजेक्टेड चप्पल पहन ली कि साड़ी के नीचे से चप्पल कौन देखेगा । वेन्यू पर हम बारात के साथ ही पहुँचे । बस दूल्हे को देखने की उत्सुकता में पैर मुड़ा और चप्पल का एक स्ट्रेप हवा में और मैं लड़खड़ा गयी । बिना कुछ जताए ,पास पड़ी हुई कुर्सी पर बैठ गयी । पतिदेव ने खाने के लिए चलने को कहा ,तब बताया कि मैं तो चल नहीं पाऊँगी वो खा लें । बिचारे परेशान से बोले ,"तुम नहीं खा पाओगी तो छोड़ो घर चलते हैं ।" मैं तुरन्त बोल पड़ी ,"सुनो ! आप खाना खा लो ,अब वापस जा कर मैं तो नहीं बनानेवाली ।" पास से गुजरते वेटर से स्नैक्स ले अपना काम चलाया मैंने 😄


दूसरी घटना बच्चों के स्कूल की है । पेरेंट्स मीटिंग में गए थे हम और दोनों बच्चों की खूब सारी तारीफें सुन बड़े खुश हो कर सीढ़ियों से उतर रहे थे कि बेटे की निगाह में मेरी चाल में बदलाव नज़र आ गया । कारण पूछने पर पहले तो मैंने टालने की कोशिश की फिर टूटी चप्पल दिखा दी जिसके अँगूठे में पैर फँसा कर बार - बार दूसरे पैर के सहारे से सीधी हो जाती थी । उस दिन चप्पल भी हील वाली पहन ली थी ,तो पंजों पर चल रही थी कि बहुत विचित्र न दिखूँ । दरअसल छोटे बेटे की क्लास से उसकी खूब सारी तारीफ़ सुन कर निकलते ही चप्पल के टूटने का एहसास हो गया था ,परन्तु बड़े बेटे की भी तारीफ़ सुनने की इच्छा ने मन को बल दिया और चल पड़ी थी मैं सोचती हुई कि यदि एड़ी टूट जाये तब भी पंजों में मनोबल से इतना बल भर लेना चाहिए कि वो शरीर का वजन उठा सकें । #निवी

सोमवार, 6 सितंबर 2021

लघुकथा : चिराग़ का जिन्न

#शीर्षक : चिराग़ का जिन्न

"कितनी आसानी से तू मेरी हर माँग पूरी कर देती है ... सच्ची एकदम चिराग़ की जिन्न है मेरी माँ " , कहती हुई नन्ही सी अंशु माँ के कन्धों पर झूल रही थी कि उसने सहलाते हाथों और दुलराती पलकों से बच्ची को गोद में सहेज लिया ," ना बेटी चिराग का जिन्न बिना दिखे ही हर चाहत पूरी करता है न ... हम सब की जरूरतें पूरी करने के लिए ,भोर से देर रात तक काम करते बिल्कुल तेरे पापा जैसे !" #निवी