शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

शृंगार चिन्ह

 शृंगार चिन्ह

शृंगार चिन्ह के औचित्य पर मनन करने से भी प्रबल प्रश्न मेरे मन में यही उठता है कि शृंगार है क्या ... क्या मात्र तन को नानाविध सज्ज करना ही शृंगार है या मन को सज्ज करना भी ! बहुधा हम मन को भूल ही जाते हैं और विविध सामाजिक और पारिवारिक परम्पराओं की ही टीका करते रह जाते हैं । बस इसीलिये जो बात सामान्यतः बाद के लिये छोड़ देते हैं ,मैं उसको सबसे पहले ले कर आना चाहूँगी । चेतना का बोध होते ही सबसे पहले मन को शृंगारित करना चाहिए । मनन की धारा सन्तुलित कर के आत्मबल को दृढ़ करना चाहिए ,साथ ही वाणी पर संयम भी हो । वाणी पर संयम का अर्थ मात्र इतना ही है शब्दों का चयन और बोलने का तरीका कटु न हो । मन के इस सौंदर्य के साथ हम शृंगार चिन्ह की तार्किकता पर मनन करें तो औरों के लिये भी स्वीकार्य होगा । 

तथाकथित प्रचलित सोलह शृंगार की बात करूँ तो यह एक आदत की तरह सोच में शामिल हो गयी है ,जो विभिन्न अवसरों पर मुखरित हो उठता है और शकुन - अपशकुन के मकड़जाल में फँसाये रखता है । 

सनातन काल से स्त्री घरों के अन्दर ही रहती थी और परिवार की प्रतिष्ठा की द्योतक भी समझी जाती थी । इसी क्रम में पर्दा प्रथा का चलन था । स्त्रियों के साज - शृंगार को भी इसी से जोड़ा जाता था । जितना अधिक सम्पन्न घर ,उतने ही अधिक आभूषणों और शृंगार से सज्जित होगी उस घर की स्त्री । साथी की मृत्यु के बाद ,स्त्री के लिये शृंगार वर्जित करने के पीछे पुरुषवादी सोच का मूल कारण उसको अधिकारहीन अनुभव करवाना ही रहता होगा । मन टूटा रहेगा तो वो अधिकारों के विषय में सोच ही नहीं पायेगी । परिवार की शेष स्त्रियों ने इस सोच को एक आदत और स्वयं को महत्तर समझने की लालसा में अपनाया होगा । 

इन शृंगार चिन्हों को धारण करने के पीछे स्वयं के आकर्षक दिखने से मिलनेवाला आत्मविश्वास भी एक कारण है । इनके पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं । परन्तु सभी कारणों के मूल में पुरूषप्रधान समाज की स्त्री को कमतर और वस्तु मानने की सोच ही अधिक प्रबल है । 

पति के न रहने पर शृंगार न करने देना सर्वथा अमानवीय कृत्य है । वह कैसे रहना चाहती है ,यह निर्णय स्वयं स्त्री का होना चाहिए । बिन्दी लगाना है या नहीं ,लाल लगानी है या काली ,चूड़ी काँच की पहननी है या प्लास्टिक की ,मेहंदी ,आलता ,आभूषण प्रयोग करना है या नहीं यह  निश्चित करने में उस स्त्री के मन की सुननी चाहिए । जो और जैसे करने से उस के मन को शान्ति मिले वही करना चाहिए । 

परम्पराओं को मात्र परम्परा न मान कर जीवित रहने में सहायक की तरह ही अपनाना चाहिए ,न कि किसी के मन को और भी तोड़ने के लिये और तन से ज्यादा मन के शृंगार के प्रति सजग और सन्नद्ध रहना चाहिए .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

ज़िन्दगी ....

 ज़िन्दगी


वो दो हाथ और हँसती ज़िन्दगी

वही दो हाथ और बिखरती ज़िन्दगी


हँसते हुए हाथों में पल्लवित हो

नित नये अर्थ निखारती ज़िन्दगी


सहम और डर से काँपती रेखायें

बेवज़ह के सवाल पूछती ज़िन्दगी


जोड़े हुए हथेलियों को रोकती 

पल - पल ,हर पल रिसती ज़िन्दगी


चन्द रेशों और चन्द ही मन्त्रों संग

कैसे - कैसे रिश्ते जोड़ती ज़िन्दगी


दुआओं के ट्रैफिक में अटकती साँसें

बिखर कर चुप दम तोड़ती है ज़िन्दगी


कामनाओं की शुभकामनाओं का रेला

जीने की चाहत संजोती ये ज़िन्दगी


वेदना दे जाती वो चुभती संवेदनायें

और बस बिखरती जाती ज़िन्दगी !

       .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

संवाद : पोटली और हाथ का


आगे - पीछे झूलता हुआ हाथ आँखों के चंचल इशारे पर रुक कर ,पोटली उठाने को लपका ही था कि पोटली बोल पड़ी 


पोटली : रुको ! 


हाथ : क्यों ?


पोटली : क्या मैं तुम्हारी हूँ 🤔


हाथ : पता नहीं 😏


पोटली : फिर मुझे देखते ही मुझ पर आधिपत्य जमाने की तुममें लालसा क्यों जाग गयी😎


हाथ : अरे ! तुम सड़क पर पड़ी हुई हो ,जिसकी निगाह पड़ेगी ,वही तुमको ले जायेगा ।


पोटली : गलतफ़हमी मत पालो । मुझ पर किसी की नेमप्लेट नहीं लगी होने का मतलब ये नहीं है कि किसी का भी अधिपत्य मुझको स्वीकारना पड़ेगा । 


हाथ : तुम भी इस गुमान में मत रहना कि तुम इस समाज में ... वी भी हमारी प्रधानता वाले समाज में ऐसे अकेली और सुरक्षित रहोगी ।


पोटली : मतलब क्या है तुम्हारा ? क्या मेरी इच्छा और अस्तित्व का कोई अर्थ ही नहीं है ? 


पोटली : अरे ओ पोटली ! तू और तेरी इच्छा है किस चिड़िया का नाम ... तू कितने अच्छे से सँवरी हुई इस आकर्षक कपड़े में लिपटी हुई मुझको भा गयी है और अब तुझ पर मेरा अधिकार है ।


पोटली : तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई ? मुझको इतना कमजोर समझने की भूल मत करना । 


हाथ : अच्छा ! तू कर क्या लेगी मेरा ... तुझको अपने मन की करनी थी तो अपने घर में छुप कर बैठी रहती न । आज तो मैं अपनी सारी चाहतें पूरी करूंगा । सबसे पहले तो आँखों की भूख शान्त करूँगा ,फिर स्वादेन्द्रियों की ... और तब भी मेरी कुछ हसरत बची रह गयी न तो बाजार में ले जाऊँगा तुझे ,वहाँ भी तेरा कोई न कोई चाहनेवाला  मुझको मिल ही जायेगा । अब मुझसे तुझको कौन बचा पायेगा ... 🤣🤣🤣


पोटली : खुशफ़हमी में तू जी रहा होता तब भी कोई बात होती ,परन्तु तू तो निरा ग़लतफ़हमी में ही साँसें ले रहा है । हाथ लगा कर तो देख जरा । 


आँखों में एक वीभत्स सी चमक जाग उठी और उसकी रौशनी में हाथ पोटली उठाने को लपका ही था कि पोटली ने आत्मरक्षार्थ आंतरिक बल की विद्युत तरंगे बिखेर दी और उसको छूते ही हाथ के मुँह से चीखें फूट पड़ीं ।

                                   ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

लघुकथा : अदला - बदली

पराठे सेंकते हुए वसु ने अवि को आते देखा तो वहीं से हँसते हुए बोल उठी ,"सुनो ! ये वाला पराठा थोड़ा करारा हो गया है ,तो मैंने उसको मोड़ दिया है । चुपचाप बिना देखे खा लेना ।" 


अवि पानी लेने रसोई में आ गया था ,"मतलब पराठा जल गया है न ... ऐसे बोलो न ,बिना मतलब के बहाने बना रही हो ," और हँसता हुआ प्लेट ले कर डायनिंग टेबल की तरफ चल गया ,"वैसे जानती हो स्वाद तो इसी पराठे का ज्यादा अच्छा है । "


वसु दूसरा पराठा ले आयी ,"सुनो !देखो न ये वाला कितना अच्छा सिंका है न ... ऐसा करो इस को देखते हुए उस करारे पराठे को खा लो । तुम तो अक्सर यही करते ही हो ... कल्पना से वर्तमान की ख़्याली अदला बदली ... "

    ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

संवाद : पर्स की गहराई और ठिठकी हुई चाहतें

 संवाद : पर्स की गहराई और ठिठकी हुई चाहतें


हटो तुम सब ... जब देखो मुझमें ही झाँकते रहते हो ।


सुन न ! जरा सी ... बस बहुत जरा सी झलक दिखला दे न ।


क्यों भई ... क्यो  देखना है ... आखिर चाहते क्या हो ? तुम सब की नज़रों में इतनी दीवानगी दिखती है कि मुझे डर लगता है ।


नहीं ... नहीं ... तुम बिल्कुल मत डरो । हम तुमको बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचायेंगे । 


फिर ... फिर क्यों बार - बार तुम मेरे पास आ जाते हो ... पहले तो अकेले आते थे ,फिर एक - एक कर के बढ़ते हुए इतने ढ़ेर सारे हो कर इकट्ठा चले आते हों । आज अपना नाम या कुछ पहचान ही बता दो ,तो मेरा भी डर कुछ कम हो ।


ह्म्म्म ... पहचान ... जिस जिस्म ने तुमको अपने हाथों में पकड़े रखा है न हम उसी जिस्म के अंदर मौजूद दिल और दिमाग मे पलती हुई चाहते हैं । 


चाहतें ? 


हाँ ! चाहतें ... पहले तो इक्का - दुक्का ही थीं पर तुम्हारी गहराई ढोल में पोल की तरह ही निकली ... किसी भी चाहत को पूरा नहीं कर सकी ,बस इसीलिये हमारी संख्या बढ़ती ही जा रही है । 


अरे तो मैं क्या करूँ ? 


सच है कि तुम कुछ नहीं कर सकते । परन्तु आज हम तुम्हारे पास सिर्फ इसीलिये आये थे कि देख सकें कि कुछ हो भी सकता है या नहीं ... 


फिर ... फिर क्या करते तुम सब ? 


कुछ नहीं ... किसी सूली पर टँग जाते और कभी कभार इसके दिल - दिमाग मे चिकोटी काटते रहते ... 

                                    ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 4 नवंबर 2020

तुम प्रियवर उससे उज्ज्वल ...

नवगीत


पूजन का ये थाल सजाये

सुख - सुहाग माँगू हर पल !


सरस सलिल सी बहती धारा

घाट - घाट चलती लहराती

संग पथिक दो चलते हर पल

मलयानिल उनको महकाती 

तिरछी चितवन नेह बसाए

बढ़ते जाते बन सम्बल !


चन्द्र किरण मद में बलखाती 

रजनी अंचल बीच छुपाये

इत उत झाँके बन शोख अदा

ललित रूप उर को भरमाये

मन बरबस ही गाता जाये

जीवन नदिया हो निर्मल !


पवन झकोरा आये साथी 

अलबेली यादें ले आया

बदली से झाँके जब चन्दा 

साँसों में मधुमास है छाया 

उदित चन्द्र की पुलकित आभा 

प्रियवर तुम 'निवी' के उज्ज्वल !

     ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'


सोमवार, 2 नवंबर 2020

लम्हों की सौगात ...

 बिखरे लम्हों के हर मोती चुन लायेंगे

लरजती साँसों के धागे से माला बनायेंगे

थकना तो सिर्फ कुछ लम्हों की सौगात है 

ऐ ज़िंदगी तुझको क्या जीना सिखायें हम

यादों के दिये में आशा के दीप जलायेंगे हम

कहती #निवी  बिखरे ज़िंदगी जितना चाहे

प्यार की आस से इसको जी के दिखायेंगे 

                ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'