बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

कितना सफर है बाकी ...

 कितना सफर है बाकी 

कहाँ तक चलना होगा

कहाँ ठिठकनी है साँस

बांया ठिठका रह जायेगा 

या दाहिना चलता जायेगा !


फिर सोचती हूँ

क्यों उलझ के रह जाऊँ

गिनूँ क्यों साँस कितनी आ रही

आनेवाली साँस को नहीं बना सकती

गुनहगार जानेवाली साँस का !


ऐ ठिठकते कदम ! 

गिनती भूल चला चल

पहुँचने के पहले क्यों सोचूँ

अभी बाकी कितनी है मंज़िल !


जब तक चल सकें चलते रहें

सुर - ताल का अफसोस क्यों करें 

थामे हाथों में हाथ रुकना क्या 

तुम रुको तो मैं चलूँगी

मैं रुकूँ तो तुम चलना 

सफ़र तो सफ़र ही है !


सफ़र मंज़िल की नहीं सोचता 

सफ़र तो बस देखता है राही 

चलो हमराही बन चलते जायें

मंज़िल जब आनी है 

आ ही जायेगी

क्षितिज पहला कदम किसका क्यों सोचें ! #निवी

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

संस्मरण : गलियाँ बचपन की


 आज सुबह सुबह बचपन की गलियाँ मन से चलती हुई आँखों पर पसर गयीं हैं, जैसे रातभर का सफर करती आयीं हों ... 


याद आ रही है नानी माँ की बनाई गुड़िया जिसको सहेजे पूरे घर में फुदकती रहती थी ... भाई को पढ़ाने आनेवाले चाचा ( तब घर आनेवाला कोई भी व्यक्ति चाचा / मामा / भइया / दीदी / चाची / बुआ ही होते थे सर या मैम नहीं ) जो भाई को पढ़ाते पढ़ाते आवाज देते " क से ... " और मैं जहाँ भी होती चिल्लाती "कबुत्तर ,उड़ के गया उत्तर " ... थोड़ी ही पल बीतते फिर से उनकी आवाज आती "ख से ...."  और मैं फिर दुगने जोश से "खड़ाऊँ ,पहन जाऊँ खाऊँ .... "  और इस तरह पूरी वर्णमाला बिना स्लेट चॉक को हाथ लगाये रट गयी थी ।


याद आ रही हैं कक्को बर्तन माँजते माँजते उठ कर मम्मी के पास जाती ,"दुलहिन तनी ऊन दिहल जाए ... " फिर झाड़ू की दो मजबूत दिखती सींक निकाल मुझे थमा स्वेटर बुनना सिखातीं और मैं छोटी छोटी उंगलियों से बुनने की कोशिश करती उनकी पीठ से सटी हुई । सींक टूटते ही फिर से नई सिंक मिलती ... 


अरे हाँ .... गामा काका को कहाँ भूल सकती हूँ ... हमारे गाँव के थे घर में सहायक ,दरवाजे पर कौन आया देखने वाले । जब भी वो भर परात ,जी हाँ थाली में नहीं परात में ही ,खाना खाने बैठते तब मैं भी मम्मी से जिद करती मेरा खाना भी वैसे ही भर परात परोसा जाए । मम्मी बहला कर ले जाती ,पर मेरी जिद .... और एक दिन काका ने कहा ,"चाची बहिनी के छोड़ देईं " और अपना खाना उन्होंने मेरी तरफ सरका दिया ,"पहले बहिनी खा लें तब खा लेब ..." मम्मी ने टोका कि खाना जूठा हो जाएगा ... काका का जवाब आज भी याद है ,"नाहीं चाची बहिनी क खाइल त परसाद होइ ... "


जंगली बब्बा ,हमारे यहाँ खेत में काम करते थे ,को भी मम्मी गाँव से लायीं थीं कि इतने बुजुर्ग हैं ,इनको भी आराम करना चाहिये और ये गाँव मे तो बैठेंगे नहीं पर यहाँ हम बच्चों में व्यस्त रहेंगे । कभी वो अमरूद के बीज निकाल कर छोटे छोटे टुकड़े कर खिलाते तो कभी गन्ना छील कर उसको चूसना सिखाते ,जब हम उसको तोड़ न पाते तो उसके भी छोटे टुकड़े कर देते थे । मम्मी के धमकाने की परवाह किये बिना ,उनकी पीठ पर लदी उनसे गाना सुनती थी । सीता जी का विदाई गीत अक्सर गाते और भीगी पलकों से मुझे निहारते कहते ,"बबुनी रउवां जब ससुरे जाइब त हम कइसे रहब .. "


सच बचपन की याद में मम्मी ,पापा ,भाइयों के साथ इन रिश्तों का भी बसेरा है ,जो आज भी बहुत याद आता है .... #निवी

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

गिर के फिर मैं उठ गई !

 सब पूछते रहते

सुनो न !
तुम क्या करती हो ?
अनसुना करने की
एक नामालूम सी कोशिश
और जवाब में
सिर मेरा झुक जाता
नहीं ... कुछ नहीं करती !

एक दिन लड़खड़ा गया पाँव
दिन में दिखते चाँद तारे
बिस्तर में पड़ा शरीर
साथ ही चन्द जुमले
सुनो ! मत उठना तुम
वैसे भी क्या करना ही होगा
स्विगी करती कुछ आवाज़ें
घर मे नित बढ़ती संख्या सहायकों की !

लोग आने लगे कई
पर सुनो न घर ,अब घर सा नहीं लगता
सुनो ! अब उठ जाओ
बेशक कुछ मत करना
पर अब उस कुछ न करने के लिए
बस तुम उठ ही जाओ
गूँज रहे थे बस यही चन्द शब्द
और बस फिर कुछ नहीं हुआ
सच ... खास कुछ नहीं हुआ
सिर्फ़ और सिर्फ
गिर के फिर मैं उठ गई ! #निवी