गुरुवार, 23 सितंबर 2021

सृंगार अब मैं क्या करूँ !


अवगुंठन की ओट में ,गोरी खड़ी लजाये

दूर देश प्रीतम गए ,ना जाने कब आये !


हथेली हिना हँसने लगी ,चूड़ी खनक जाये

पाँव महावर खिल गये ,पायल गुनगुन गाये !


ऋतु बसन्त की आ गयी ,मदन चलाये तीर

अँखियों में सपने सजे , भूल गयी सब पीर !


कली मोगरे की खिली ,केशों में जा सँवरी

सम्मुख प्रिय को देखती ,सकुचाई कुँवरी !


साजन को देख सामने ,सोचती नयन झुकाय 

सृंगार अब मैं क्या करूँ ,सज रही पी को पाय ! #निवी