सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

लघुकथा : आहट नन्हे कदमों की

लघुकथा : आहट नन्हे कदमों की

कल तक जो नन्हे कदम खूब जोर लगा कर बस करवट बदल पाते थे या थोड़ा सा खिसक ही पाते थे ,आज ढोलक की थाप पर नन्ही गौरैया जैसे मनमस्त से खूब थिरक रहे थे और घर में जमा हुई रिश्तेदार महिलाएं उस की खुशी से चमकते चेहरे को देख दिल को कचोटती टीस को सप्रयास दबा कर ,उस की चंचलता पर न्यौछावर हो रही थीं । तभी कपड़ों के ढ़ेर लिये फेरी लगनेवाले काकू सा आँगन में आ विराजे । सभी बहुएं और बेटियाँ उनके खुलते हुए गट्ठर के रंग - बिरंगे खजाने को देखती बेसब्री में घेर कर खड़ी हो गईं थीं ।


छुटके कदम भाग चले थे रसोई में काम करती माँ को खींचने ,"चलो न माँ ... हर समय काम करती रहती हो और यही सफेद सी साड़ी पहनी रहती हो । पता है कपड़े वाले दद्दू बहुत सारी रंग - बिरंगी चुनर लाये हैं । ये जो सबसे सुन्दर थी न , मैं तुम्हारे लिए ले कर भाग आयी हूँ । अब तुम जल्दी से इसको पहनो ।"


नम आँखों से माँ ने उसको रोका ,"लाडो ! इसको वापस कर आ । मैं इसको नहीं पहन सकती ।" 


उसकी आँखों में प्रश्नों के जुगनू झिलमिला रहे थे ,"क्यों माँ ...  ऐसा क्या हुआ है ?"


उधर से गुजरते हुए दद्दू ने अपनी आँखें पोंछते हुए उसको गोद में भर लिया ,"माँ को ऐसे परेशान नहीं करते लाडो ... अभी तुम नहीं समझोगी पर ये समाज के नियम हमें मजबूर करते हैं ऐसा करने को । तेरी माँ की स्थिति तो मैं नहीं सुधार सकता ,पर तुझ पर कोई आँच नहीं आने दूंगा । तेरी राह के काँटे तो मैं अपनी पलकों से भी हटा दूंगा । तेरी राह में तो मेरी हथेली बिछी रहेगी कि तुझको कुछ न चुभे ।" 


चन्द पलों में ही जैसे वो नन्हे कदम बड़े हो गए और वो दद्दू की गोद से उतर गई ,"नहीं दद्दू ! मुझे आपकी हथेलियों की सुरक्षा नहीं चाहिए क्योंकि जब कोई ऐसी सामाजिक मजबूरी आ जायेगी तब आप भी विवश हो कर अपना सुरक्षा घेरा तोड़ देंगे । अब मुझको पढ़ाई कर के इतना सशक्त होना है कि अपने साथ ही अपनी माँ और उन जैसी विवश स्त्रियों के लिए मैं हथेली बन जाऊँ ।" 

                                   ... निवेदिता श्रीवास्तव "निवी'