शनिवार, 2 जुलाई 2022

पत्र कान्हा का बंसरी के नाम ❤️❤️

प्यारी बंसरी !

चौंक गयी होगी तुमको सम्बोधित मेरा पत्र पा कर ... क्या करूँ मेरी प्रवृत्ति ही सबको सुखद अनुभव देना है। तुम भी सोचती होगी कि बाकी सब को तुम याद रहती हो,कोई तुमसे ईर्ष्या करता है तो कोई तुमको चुरा कर छुपाना चाहता है जिससे वो तुम्हारे न होने की रिक्ति को भर सकें , परन्तु मैं बस तुमको थामे हुए घूँट-घूँट भर कर अपनी जीवदायिनी साँसें पीता रहता हूँ। तुम भी जानती हो कि हम एक दूसरे में इतना रच-बस गये हैं कि तुम्हारी प्रतिकृति किसी अन्य के साथ होने पर भी हमारे साथ की ही याद दिलाती प्रतिछवि बनाती है।


सब मुझको छलिया कहते हैं पर मैं तुम्हारी ओट में ही तो अपने उर के भावों को छुपाए मनमोहिनी मुस्कान बिखेरता रहता हूँ और सबको सबका कर्म फल देता हूँ।


चाहें मेरी रानियाँ हों या गोपिकाएं, मैंने किसी से नहीं कहा पर तुमसे कहता हूँ कि तुम हो मेरे होंठों पर, तभी जग में सकारात्मकता और शान्ति बरसती है, नहीं तो सुदर्शन चक्र को भी अपनी तीक्ष्णता दिखाने का अवसर मिल जाता है।


मेरी जीवनदायिनी बाँसुरी ! एक बात मानोगी तुम सदैव मेरे अधरों पर ही सज्ज रहना जिससे मेरे हाथ तुम्हें ही सम्हाले रहें और कभी सुदर्शन चक्र या शारंग (मेरा धनुष) नहीं उठाएं और दुरात्मा भी पापकर्मों को भूल कर धरती को भी शान्ति दें ।

तुम्हारा कान्हा ❤️❤️

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी 

#लखनऊ

शुक्रवार, 13 मई 2022

पीड़ाओं से मुक्त कर !

ईश्वर हे जगदीश्वर

पीड़ाओं से मुक्त कर !


स्वस्ति दे आश्वस्ति दे

सुख का इक स्वर दे !


राह नई है चाह कई हैं

पीड़ा की राह सुरमई है !


जीवन मोहभरी माया है

लालसाओं ने भरमाया है !


बाधाओं की बगिया हो

या तूफ़ानों की रतिया हो !


आस यही विश्वास यही

हर पल की अरदास रही !


अन्तिम साँस पर मिलेगा तू

अपनी छाया में रखेगा तू ! 

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी 

#लखनऊ

बुधवार, 11 मई 2022

बिन्दु बिन्दु कर झरती जाये ...



बिन्दु बिन्दु कर झरती जाये 

यात्रा ये करती जाये


निरी अंधेरी इस गुफ़ा मे

सूर्य किरण सी दिखती है

कंकड़ पत्थर चट्टानों से 

राह नयी तू गढ़ती है

सर्पीली इस पगडण्डी से

प्रपात बनी उमगती है 

बिन्दु बिन्दु ... 


कन्दराओं से बहती निकल 

सूनि वीथि तुझे बुलाये

विकल विहग की आये पुकार

रोक रहे बाँहे फैलाये 

लिटा गोद में सिर सहलाती

थपकी दे लोरी गाये

बिन्दु बिन्दु  ...


गर्भ 'तेरे जब मैं आ पाई

प्यार सदा तुझ से पाया

अपनी सन्तति को जनम दिया

रूप तेरा मैंने पाया 

तुझसे जो मैं बन निकली थी 

गंगा सागर हम आये 

बिन्दु बिन्दु ....

.... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 7 मई 2022

लघुकथा : अधूरा परिवार

 अधूरा परिवार


म्लान मुख ,नत नयन सिसकती वीणा सी शुचि बिखरी हुई अपने कमरे में बैठी थी। आखिर वह भी कब तक परम्परावादी सोच की सड़न को अपनी जिह्वा से उगलते लोगों के सम्मुख चुप्पी साधे खड़ी रहती क्योंकि परम्पराओं को बहुओं का बोलना बहुत खलता है। शुचि के मामले में तो करेला और नीम चढ़ा वाली कहावत चरितार्थ होती थी। तीन-तीन बेटियों की माँ को साँस लेने देना ही बहुत बड़ा एहसान था।

आज तो मायके आयी हुई चचेरी ननद भी ,बेटे की माँ होने के गुमान में ,ताने देते परिजनों की टोली में सम्मिलित हो गई थी,"चाची! कब तक इंतजार करोगी ? तुम्हारी इस बहुरिया से वंश चलनेवाला पोता न मिलने का। मेरी मानो भाई की दूसरी शादी कर ही दो अब।"

शुचि से जब बिल्कुल ही सहन न हुआ तो वो वहाँ से अपने कमरे में भाग कर कटे पेड़ से ढ़ह गयी थी। तभी उसकी बड़ी बेटी सोनालिका माँ के अनवरत बहते हुए आँसुओं को पोछते-पोछते बाहर जा कर दादी के सामने खड़ी हो गयी,"दादी! फूफा जी की भी दूसरी शादी करवा दो। बुआ भी तो परिवार नहीं पूरा कर पा रही हैं, इनके भी तो सिर्फ़ दो बेटे ही हैं,बेटी तो है ही नहीं।"
#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी
#लखनऊ

रविवार, 1 मई 2022

ममता की दस्तक

अनाड़ी दुनियादारी में

उलझ रही थी जिम्मेदारी में

कुछ नए तो कुछ पुराने थे

रिश्तों की महकी क्यारी में !


उन धागों को सम्हाल रही थी

सपने नयनों में पाल रही थी

नन्हे कदमों ने दी जब दस्तक

ममता का झूला डाल रही थी !


बातें लगतीं कितनी अनजानी 

दिल करता अपनी सी मनमानी

हर पल जीवन बदल रहा था

लिख रहा था इक नई कहानी !

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी'

#लखनऊ

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

ज्ञान और बुद्धि

 

जन्म से मृत्यु तक रहते दोनों संग

दोनों की लयबद्ध ताल भरती उमंग

दोनो दो पहलू हैं एक ही विचार के 

ज्ञान और बुद्धि का संतुलन करता दंग!

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बुद्धि और ज्ञान ,दोनों चलते साथ - साथ

बुद्धि थाहे ज्ञान को ,पकड़े उसका हाथ

सही समय दें ज्ञान ,अनुभव कराती बुद्धि

अहंकार के भाव को ,वह चढ़ने न दे माथ !

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सन्त ज्ञानी कहते ,बुद्धि की महिमा अनन्त

रची जब रावण - संहिता ,तब मन से था सन्त

अहंकार ज्ञान पर छा गया ,करता गया दुष्कर्म

महाज्ञानी रावण का ,हो गया तब दारूण अन्त !

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निर्गुण और सगुण का करना क्या विवाद 

दोनों परस्पर एक हैं यही है अनुनाद

मन और आत्मा जैसे हैं ये दोनों ही एक

ज्ञान अकसर बुद्धि से करता यही संवाद ! 

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी

#लखनऊ


बुधवार, 20 अप्रैल 2022

निगाहें न चुराया करो ...

 बातों से जानम न भुलाया करो

ख्वाबों में आ कर न सताया करो।

मिल जाओ कभी दिल के रस्ते पे
देख मुझे निगाहें न चुराया करो।

उलझनें जब सतायें ज़िन्दगी की सनम
रूख़ से परदा जरा तुम हटाया करो।

दरमियाँ हमारे हैं फ़ासले बहुत
तुम कदम इधर तो बढ़ाया करो।

पीर तेरी सताती है इस दिल को बहुत
कभी पीर सा मुझे भी मनाया करो।

दोष मेरे गिनाता है ज़माना बहुत
कभी हाल दिल के तुम भी सुनाया करो।

परस्तिश तुम्हारी की हमने बहुत
जानेजां #निवी को भी दिल मे बसाया करो।
#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी
#लखनऊ

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

लोरी : नयनन में सपन ...

निन्दरिया आ जा रे तू ,

नयनन में सपन सजा जा रे तू !


पलकन की डगरन पर तू

ममता की धड़कन में तू

जीवन की आशा मुस्काये

ममता की परिभाषा है तू

चन्दनिया महका जा रे तू !

नयनन में ...


आँचल की छाया मैं कर दूँ

बाँहों में तुझको मैं भर लूँ

सपनों सी मीठी हो दुनिया

फूलों से तेरी झोली मैं भर दूँ

कोयलिया लोरी सुना जा रे तू !

नयनन में ... 

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी 


बुधवार, 13 अप्रैल 2022

करती हूँ अन्तिम प्रणाम!

 आ गयी जीवन की शाम

करती हूँ अन्तिम प्रणाम!

रवि शशि की बरसातें हैं
अनसुनी बची कई बातें हैं
प्रसून प्रमुदित हो हँसता
भृमर गुंजन कर कहता
किस ने लगाए हैं इल्जाम
करती हूँ अन्तिम प्रणाम!

कुछ हम कहते औ सुनते
बीते पल की थीं सौगाते
प्रणय की नही अब ये रजनी
छुड़ा हाथ चल पड़ी है सजनी
समय के सब ही हैं ग़ुलाम
करती हूँ अन्तिम प्रणाम!

जाती हूँ अब छोड़ धरा को
माटी की दी बाती जरा वो
जर्जर हो गयी है अब काया
मन किस का किस ने भरमाया
तन के पिंजरे का क्या काम
करती हूँ अन्तिम प्रणाम!
... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
लखनऊ

रविवार, 10 अप्रैल 2022

अलबेला सपना !

सजा रही अलबेला सपना

मन आशा से दमक रहा

*
राह बहुत हमने थी देखी
आन विराजो रघुनन्दन
फूल चमेली बेला भाये
लाये अगरु धूप चन्दन
मंगल बेला अब है आई
खुश हो घर गमक रहा है !
*
रात अमावस की काली थी
निशि शशि ने आस सजाई
राह प्रकाशित करनी चाही
चूनर तारों भर लाई
सुमन मेघ बरसाने आये
बन साक्षी अब फलक रहा !
*
कन्धे पर हैं धनुष सजाये
ओढ़ रखा है पीताम्बर
सुन्दर छवि है जग भरमाये
नाच रहे धरती अम्बर
आज महोत्सव अवध मनाये
दीवाली सा चमक रहा !
... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 25 मार्च 2022

अथ नाम कथा

#अथ_नाम_कथा

अपने नाम ,या कह लूँ कि व्यक्तिगत रूप से सिर्फ़ अपने लिये कभी सोचा ही नहीं।जीवन जब जिस राह ले गया सहज भाव से बहती चली गयी। 

अब जीवन के इस संध्याकाल में जब मिसिज़ श्रीवास्तव के स्थान पर स्वयं के लिए #निवी या #निवेदिता का सम्बोधन पाती हूँ तो सच में मन को एक अलग सा ही सुकून मिलता है और इन्हीं में से किसी लम्हे ने दस्तक दी थी कि यह नाम मुझे मिला कैसे!


चार भाइयों के बाद मेरा जन्म हुआ था।सबकी बेहद लाडली थी और जितने सदस्य उतने नाम पड़ते चले गये,परन्तु उन सब के दिये गए नामों पर भारी पड़ गया ,घर में काम करनेवाली सहायिका ,हम सब की कक्को का दिया नाम। उन्होंने बड़े अधिकार से सबको हड़का लिया था,"हमार बहिनी क ई का नाम रखत हईं आप सब। हमार परी अइसन बिटियारानी के सब लोग बेबी कह।" इस प्रकार पहला नाम 'बेबी' रखा गया 😄 


इस बेबी नाम के साथ हम दुनिया के मैदान में तो आ नहीं सकते थे, तो फिर से एक नाम की तलाश शुरू हुई।सभी अपनी पसन्द के नामों के साथ फिर से आमने-सामने थे। 


अबकी बार सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सभी लोग चिट पर अपनी पसन्द के नाम लिख कर मेरे सामने रख दें और मैं जो भी चिट उठा लूंगी वही नाम रखा जायेगा।


दीन-दुनिया से बेखबर ,सात-आठ महीने की बच्ची के सामने बहुत सारी चिट आ गयी, सभी अपनी तरफ से होशियारी दिखा रहे थे कि उनकी चिट ऊपर रहे और उठा ली जाये ... पर इस बच्ची का क्या करते उसने करवट बदली और ढ़ेरी के नीचे से 'निवेदिता' नाम की चिट निकाल ली। पूरे होश ओ हवास में, इस बिन्दु पर मैं ज़िम्मेदारी लेती हूँ कि अपना निवेदिता नाम मैंने खुद रखा 😊 


स्कूल/ कॉलेज में भी निवी, दिवी,नीतू,तिन्नी जैसे कई नामों से पुकारा सबने।जन्म के परिवेश ने सरनेम 'वर्मा' दिया जिसको विवाह ने बदल कर 'श्रीवास्तव' कर दिया।


नाम बदलने का सिलसिला यहीं नहीं थमा।लेखन तो बहुत पहले से ही करती थी परन्तु जब मंचो की तरफ़ रुख किया, तब उपनाम रखने की जरूरत अनुभव हुई। मेरी मेंटोर, जिन्होंने मुझको मंच का रास्ता दिखाया, उनका भी नाम 'निवेदिता श्रीवास्तव' ही था। एक साथ रहने पर हम तो मजे लेते पर एक से नाम सबको कन्फ्यूज भी खूब करते थे। इस उलझन से बचने के लिये मेरी वरिष्ठ ने अपने नाम के साथ 'श्री' जोड़ा और मैंने 'निवी' ।


जब थोड़ी समझ आयी,तब इस नाम की महान विभूतियों के बारे में भी जाना और एक अनकही सी ज़िम्मेदारी आ गयी कि बेशक मैं उनके जैसी कुछ विशिष्ट न बन पाऊँ पर जितना सम्भव होगा उतना सभो में सकारात्मक भाव भरूँगी और कभी भी किसी को धोखा नहीं दूँगी।

           #निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी 

            #लखनऊ

गुरुवार, 24 मार्च 2022

मेरी अनलिखी सी कविता!


लेखनी ने कहा
आज तुम लिखो
एक कविता
कुछ यादों भरी
कुछ भावों भरी!

पन्ने सारे कोरे रह गए
कहीं सूख चली थी
लेखनी की स्याही
तरलता की चाहत में!

भटकती गयी कल्पना
कुछ नमी सी बह चली है
पलकों की कोरों से
कपोलों तक की यात्रा में!

अब लेखनी से पूछ रही हूँ
कहीं वही तो नहीं
मेरी अनलिखी सी कविता
जिसने संजो रखे हैं
बिम्ब मेरे हृदय के!
निवेदिता श्रीवास्तव #निवी
#लखनऊ

शनिवार, 19 मार्च 2022

क्यों पूछ्ते हैं ...

 #जय_माँ_शारदे 🙏


#मुक्तपटल_उन्मुक्तमन 


क्यों पूछ्ते हैं बारहा ख्याल मेरा 

इन आँखों में आशनाई रहती है।


वो हँसी रक्स करती है अब भी 

यहीं कहीं यादों में अरुणाई रहती है।


कभी थामा था जिन नज़रों ने मुझ को 

उसकी निगाहों तले अमराई रहती है।


मेरी यादों में बसता है समंदर गहरा 

इन बन्धनों में ही #निवी बेवफाई रहती है।

  निवेदिता श्रीवास्तव #निवी

      #लखनऊ

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

क्षणिकाएं

क्षणिका 


नहीं देखना चाहती तुमको

रूह भी तड़पी है 

तेरी बेवफ़ाई पर

माफ़ कर दिया तुमको

हाँ! इश्क़ किया है तुमसे !


***

चाहतें बेपनाह 

यादें बेलग़ाम

इश्क़ लापरवाह !

***

चाहतें सुरसा सी

लपट सी धधक रही 

कफ़न के बाद भी 

चाहत लकड़ी की

या दो गज़ ज़मीं!


***

रिसती साँसों की

सुराखों भरी 

फ़टी जेब सी ज़िन्दगी

वक़्त किसका हुआ!

  ... निवेदिता #निवी 

        #लखनऊ

मंगलवार, 8 मार्च 2022

एक चिंगारी ...

एक चिंगारी ...

निशि दिवस की उजास बन
रवि शशि की किरण वह प्यारी थी,
एक चिंगारी सी लगती वो
शौर्य भरी किरण बेदी न्यारी थी!
*
जून माह इतना इतराता इठलाता
जन्म लिया था तभी इस चिंगारी ने।
अमृतसर की शौर्य भूमि ने अलख जगा
साहस भरा हर आती सजग साँस ने।
महिला सशक्तिकरण का प्रतिमान बनी वो
सत्य और कर्त्तव्य की वो ध्वजाधारी थी!
एक चिंगारी सी लगती वो
शौर्य भरी किरण बेदी न्यारी थी!
*
शिक्षा ले अंग्रेजी साहित्य और राजनीति शास्त्र में
पढ़ा रही थी वह अमृतसर कॉलेज में।
समय ने जब अनायास ही खोली थी पलकें
तब किरण बेदी बनी एक पुलिस अधिकारी।
शौर्य ,राष्ट्रपति ,मैग्सेसे जैसे अनेकानेक
पदकों से सम्मानित जिम्मेदार अधिकारी थी!
एक चिंगारी सी लगती वो
शौर्य भरी किरण बेदी न्यारी थी!
*
गलती किसी की कभी नहीं थी बख्शी
पार्किंग गलत होने पर उठवाई उसने।
तत्कालीन प्रधानमंत्री की भी गाड़ी थी
ट्रैफिक दिल्ली का भी खूब सुधारा उसने।
बन महानिरीक्षक सँवारा तिहाड़ जेल को उसने
अवमानना के सवाल पर खूब चली वो दुधारी थी!
एक चिंगारी सी लगती वो
शौर्य भरी किरण बेदी न्यारी थी!
*
जीवन भर कभी हार नहीं उसने मानी थी
मानवता के शत्रुओं से रार खूब ही ठानी थी।
यदाकदा विवादों के उछले छींटे बहुत सारे थे
लिखी गईं उसपर पुस्तकें ,बनी फिल्में भी कई सारी थीं।
नशामुक्ति और प्रौढ़ शिक्षा की अलख जगा
समाज सुधार का प्रयास कर निभाई जिम्मेदारी थी!
एक चिंगारी सी लगती वो
शौर्य भरी किरण बेदी न्यारी थी!
... निवेदिता 'निवी'
     लखनऊ

शुक्रवार, 4 मार्च 2022

लघुकथा : हौसलों की उड़ान

 हौसलों की उड़ान


अलसायी सी सुबह में आस भरती आवाज़ ने ,मुँदी पलकों से कहा ,"चाय पियोगी ?"


"छोड़ो ... "


"क्यों ... क्या हुआ ?"


"अब कौन चाय पीने के लिए इतने सरंजाम सजाए ",और वह बेबसी से अपने पैरों पर चढ़े प्लास्टर को देखने लगी ।


"हाँ ! ये भी सही कहा तुमने ",नेह की सूर्य किरण मुस्कुरा उठी ,"वैसे भी हम चाय कहाँ पीते हैं ,हम तो एक दूसरे के साथ ज़िन्दगी की यादें पीते हैं । चलो वही पीते हैं ",उसने स्लिपडिस्क के दर्द से कराहती पीठ पर एक हाथ रखते हुए दूसरा हाथ छड़ी की मूठ पर रखा ।


प्लास्टर में बन्द बेबसी को पीछे धकेलती हुई वह भी चन्द्रकिरण सी शीतल हो गई और संकेतिका दिखाती खिलखिला उठी ,"याद रखना कि अब मुझे न तो ब्लैक कॉफी पीनी है और न ही कड़वी - कसैली चाय ... मुझको तो तुम बस अदरख - इलायची सी सौंधी - सौंधी ख़ुशबूदार चाय पिलाना ।"


सिरहाने रखी एलबम से खिलखिलाती तस्वीरों ने उनके हाथों में हौसलों की उड़ान से भर दिया । 

#निवेदिता_निवी 

  लखनऊ

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

स्वेटर ज़िंदगी का ...


ज़िन्दगी से यूँ ही दो - दो हाथ कर
लम्हा - लम्हा बुनती गयी इक स्वेटर
दो फन्दे मीठी - मीठी यादों से सीधे हैं
तीन फन्दे दुख में करते चटर - पटर !

दुखते लम्हों को भी था दुलराया
दुखड़ा अपना उन्होंने था सुनाया
एकाकी से लम्हों को बाँहों में भर
इंद्रधनुषी रंग से था चँदोवा सजाया !

अवसान की बेला ले खड़ी है झोली
करती सखियों सी अल्हण ठिठोली
धवल धूमिल पड़े उन रंगों को साधा
बनाने चल पड़ी मैं उस पार रंगोली ! #निवी'

रविवार, 6 फ़रवरी 2022

कैक्टस की बारात !

 

तुम्हारे दर से आ गईं हूँ
ले चुभते काँटे की सौगात !

टीसते छालों का मुँह खोल रही हूँ
काँटों से उकेर रही हूँ जज़्बात !

रोक लो अपनी इस अदा को
ये नन्हे नन्हे काँटे कर रहे हैं बात !

आओ थाम ले एक दूजे का हाथ
बन न जायें कैक्टस की बारात !  #निवी

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

यादों की रम्बल स्ट्रिप

 आज बसन्त पंचमी है ... लग रहा था कि शायद इस बार नहीं हो परन्तु बावरा मन हर साल की तरह इस बार भी यादों की टीस की चुभन अनुभव कर रहा है । सरस्वती पूजा की ,रम्बल स्ट्रिप जैसी एक रील सी चल रही है ।


स्कूल के दिनों में बसन्त पंचमी विशिष्ट होने का आभास देती थी क्योंकि कार्यक्रम में सरस्वती के रूप में ,वीणा के साथ मुझे ही बैठाया जाता था और मैं ही सबको प्रसाद देती थी । बाद के वर्षों में भी पूजन का सिलसिला चलता रहा । 


कालान्तर में जब बच्चों को सरस्वती पूजा के लिए भेजती थी ,तब उनको समझाना पड़ता था कि इस पूजा में ऐसी क्या विशिष्टता है जो उनको स्कूल जा कर पूजा करनी है । 


समय अपनी चाल चलता ,रंगत बदल जाता है और हम हतप्रभ से बस देखते रह जाते हैं । ऐसा ही एक वर्ष आया था जो बसन्त पंचमी के दिन ही हमारे पापा को चिरनिद्रा में सुला गया था और हम सब इंसान होने की विवशता लिए उनको ... नहीं ... उनके शरीर को जाते देखते रह गए । तब से इस दिन पर किसी भी प्रकार की पूजा करने का दिल ही नहीं करता है । 


कभी - कभी मन को मजबूत करना चाहती हूँ कि सम्भवतः पापा ने अपने महाप्रयाण के लिए बसन्त पंचमी को इसलिए ही चुना कि माँ शारदे अपने स्नेहिल अंचल की छाया में मुझ को ताउम्र रखे रहें ! #निवी

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

यादों का प्याला ...

 यादों का प्याला ...

अवनी ओढ़े धानी चूनर
मुरली मधुर बजाए अम्बर !

सतरंगी किरणों का ले सेहरा
सज्ज हुआ तब रवि का चेहरा !

नन्ही नन्ही बुंदियन की माला
नयनन की छलकी तब हाला !

धीर धरें कैसे साजन सजनी
प्रणय की पायल है बजनी !

कलियाँ कोमल खिलने आईं
मधुर मिलन की ऋतु गहराई !

यादों से भर रहा है प्याला
नैन बने प्रिय की मधुशाला !   निवी

रविवार, 23 जनवरी 2022

सिरहाने धरी हथेली ...

सिरहाने धरी हथेली की 

लकीरों में छुप के बैठे हुए !


पूरनम रेशों की तासीर में

कुछ अल्फ़ाज़ थे गुंथे हुए !


कहीं कुछ दम है घुटता सा

जैसे हो कोई साँसें रोके हुए !


पलकों ने नयन को है यूँ छुआ

चाँदनी खिली चंदोवा सँवारे हुए !


सामने रख दूँ जो खिली हथेली

गुल नजर आएंगे महकते हुए ! #निवी

शनिवार, 22 जनवरी 2022

लॉक डाउन समस्या या समाधान !

 डाउन समस्या या समाधान

आम जन की लापरवाही ने पिछले दोनों कोरोना काल में वायरस की विभीषिका को भयावह बना दिया था । ये ऐसा दौर था जब एक तरह से इंसानियत के ऊपर से विश्वास हट गया था और अधिकतर आत्मकेंद्रित हो कर रह गए थे । किसी की पीड़ा में ,संवेदना से उसके कन्धों पर हाथ रखने के स्थान पर ,अपने घरों में मास्क और सैनीटाइजर के पीछे छुप जाते थे । इसको गलत्त भी नहीं कहूँगी क्योंकि अपनी सुरक्षा भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है ।


अब इस लहर के तीसरे दौर में ,निश्चय ही एक बार पुनः बेहद संजीदगी से यह सोचने की आवश्यकता है कि हर बार कोविड की विभीषिका बढ़ने पर लॉक डाउन लगाना ही इकलौता समाधान है क्या ! 


लॉक डाउन लगने पर जीवित रहने के लिए ,रोज कूआँ खोदनेवाला श्रमजीवी वर्ग ,अपने परिजनों की दैनिक आवश्यकताओं के अपूर्ण रह जाने से हताश और विवश हो नकारात्मकता से भर जाता है । उनकी सहायता के लिए विभिन्न संस्थाएं काम करती हैं ,परन्तु सीमित संसाधनों में व्यवहारिक धरातल पर वो भी कितनी सहायक हो सकतीं हैं ,ये हम सब भी जानते हैं ।


इस वर्ग से इतर ,साधन संपन्न अन्य लोग भी मानसिक शून्यता की स्थिति में पहुँच जाते हैं । उनकी स्थिति उस पालतू पक्षी जैसी हो जाती है जिसके साफ़- सुथरे और चमकदार पिंजरे में खाने - पीने का सामान रहता है ,तब भी वह बेचैनी में चीखता रहता है । समझ लीजिये कि हममें से अधिकतर की यही स्थिति हो गयी थी ।


हम को इसका स्थायी समाधान खोजना होगा । मेरे विचारानुसार तो लॉक डाउन से बेहतर होगा कि हम मास्क और सैनिटाइज़ेशन की सावधानी बरतें । सबसे आवश्यक है कि अनावश्यक रूप से बाहर न जाएं कि कभी कभार ,स्थितियाँ सामान्य होने पर बाहर निकल सकें । पारिवारिक कार्यक्रमों को, मात्र परिवार तक ही सीमित कर लें ,तब भी एक - दूसरे से संक्रमित होने का भय और संकट कम हो जायेगा । 


अतः लोगों के अनावश्यक विचरण और एकत्रित होने पर लॉक डाउन लगाना चाहिए ,न कि व्यवसाय इत्यादि दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए घरों से बाहर निकलने पर । #निवी

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

बड़ा आसां है चाय बनाना !

बड़ा आसां है चाय बनाना

कभी तो चाय बनाओ
कभी तो हमें पिलाओ
बड़ा आसां है चाय बनाना !

पैन चाय का उठा लाओ
चाय की छन्नी भी खनकाओ
पानी लाना भूल न जाना
बड़ा आसां है चाय बनाना !

अदरख इलायची की अदहन
चाय पत्ती औ चीनी के बरतन
पतीला दूध का भी ले आना
बड़ा आसां है चाय बनाना !

भावनाओं को जगाओ
चूल्हा गैस का जलाओ
दो कप पानी खौलाना
बड़ा आसां है चाय बनाना !

रंगत जीवन में भर जाये
लिकर को साथ दूध का भाये
मिठास बातों में बसाना
बड़ा आसां है चाय बनाना !

चाय प्याले में छलकाओ
बदली यादों की बरसाओ
चाय तो बनी है इक बहाना
साथ हमें है जीवन बिताना
बड़ा आसां है चाय बनाना ! #निवी

शनिवार, 1 जनवरी 2022

हाइकु : नववर्ष की दुआ

लम्हे कहते 

यादें समेट लेते

बीतते पल !


आज था कल

कल बना है आज

सच का पल !


दुआ है मेरी 

शुभ हो कल्याण हो 

सभी साथ हों ! #निवी