शनिवार, 7 मई 2022

लघुकथा : अधूरा परिवार

 अधूरा परिवार


म्लान मुख ,नत नयन सिसकती वीणा सी शुचि बिखरी हुई अपने कमरे में बैठी थी। आखिर वह भी कब तक परम्परावादी सोच की सड़न को अपनी जिह्वा से उगलते लोगों के सम्मुख चुप्पी साधे खड़ी रहती क्योंकि परम्पराओं को बहुओं का बोलना बहुत खलता है। शुचि के मामले में तो करेला और नीम चढ़ा वाली कहावत चरितार्थ होती थी। तीन-तीन बेटियों की माँ को साँस लेने देना ही बहुत बड़ा एहसान था।

आज तो मायके आयी हुई चचेरी ननद भी ,बेटे की माँ होने के गुमान में ,ताने देते परिजनों की टोली में सम्मिलित हो गई थी,"चाची! कब तक इंतजार करोगी ? तुम्हारी इस बहुरिया से वंश चलनेवाला पोता न मिलने का। मेरी मानो भाई की दूसरी शादी कर ही दो अब।"

शुचि से जब बिल्कुल ही सहन न हुआ तो वो वहाँ से अपने कमरे में भाग कर कटे पेड़ से ढ़ह गयी थी। तभी उसकी बड़ी बेटी सोनालिका माँ के अनवरत बहते हुए आँसुओं को पोछते-पोछते बाहर जा कर दादी के सामने खड़ी हो गयी,"दादी! फूफा जी की भी दूसरी शादी करवा दो। बुआ भी तो परिवार नहीं पूरा कर पा रही हैं, इनके भी तो सिर्फ़ दो बेटे ही हैं,बेटी तो है ही नहीं।"
#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी
#लखनऊ

1 टिप्पणी:

  1. धीरे धीरे जागरुकता बढ़ रही ।भेद कम हो रहे हैं। सुंदर लघुकथा ।

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