मंगलवार, 6 जुलाई 2021

ईश्वरीय प्रतिमान ...

 ईश्वरीय प्रतिमान ...

  ईश्वरीय तत्वों के एकाधिक मुख और हाथ होने के बारे में हम पढ़ते और सुनते आए हैं ,परन्तु कभी इसका कारण अथवा औचित्य जानने का प्रयास ही नहीं किया । सदैव एक अंधश्रध्दा और संस्कारों के अनुसार मस्तक नवा कर नमन ही किया है । आज अनायास ही इसपर विभिन्न विचार मन में घुमड़ रहे थे और मैं उनकी भूलभुलैया में भटकती अनेक तर्क वितर्क स्वयम से ही कर रही थी । कभी सोचती कि आसुरी तत्वों का विनाश करने के लिये एकाधिक हाथों की आवश्यक्ता है ,अगले ही पल सोचती कि सृजन करने के लिये ऐसी लीला रची होगी ईश्वर ने । 

इन और ऐसे ही अनेक विचारों से जूझ रही थी कि लगा कि ये समस्त तर्क उचित नहीं । ईश्वर का होना किसी समस्या के समाधान से कहीं अधिक है हमारे अंदर समाहित असीमित क्षमताओं का ज्ञान होना । ईश्वर भूख लगने पर सिर्फ भोजन करा के ही तृप्त नहीं करते अपितु भोजन बनाने के साधन से भी परिचित कराते हैं । 

ईश्वरीय प्रतिमान के कई मुख और हाथ हमारे अंदर छिपी हमारी सामर्थ्य के परिचायक हैं । हम सबमें अपार सम्भावनायें छुपी हैं ,जिनको कभी किसी की प्रेरणा से हम जान पाते हैं और कभी सब कुछ अनजाना रह कर ,अपनी धार्मिक मान्यतानुसार चिता की दाहक अग्नि में समा जाता है ।


समय पर अगर अपने अंदर छुपी इस सम्भावना को पहचान लिया जाये तो अपने साथ ही साथ समष्टि के भी हित में होगा । अकेलापन ,उदासी ,अवसाद जैसी तमाम नकारात्मक भावों से मुक्ति पाने के लिये ये सबसे प्रभावशाली अस्त्र प्रमाणित होगा । 


जब भी ऐसे किसी भी ईश्वरीय प्रतिमान की अर्चना करें तो एक बार अपने अंदर की अतल गहराइयों में छुपी हुई ऐसी किसी भी सम्भावना पर पड़ी हुई धूल को भी जरूर बुहार कर स्वच्छ कर लेना चाहिए ! #निवी

शुक्रवार, 25 जून 2021

दोस्त

 बचपन में घर में काका को अक्सर गुनगुनाते सुना था ,"बड़ भाग मानुस तन पायो ,माया में गंवायो " ... कई बार पूछने पर और उनके समझाने पर भी मेरे बालमन को यह मायामोह का गोरखधंधा कुछ समझ नहीं आया था । उसके बाद ज़िन्दगी के मायाजाल ने क्रमशः मुझे भी अपनी माया में उलझा लिया और कब बचपन के खेल खिलौने कॉपी - किताब में ,और फिर ज़िन्दगी के झिलमिलाते हुए अन्य सोपान जैसे इस विचार से ही दूर करते गए । आज इतने लम्बे सफ़र के बाद यही भजन गुनगुनाने लगी हूँ ।


जीवन के अब तक के सफ़र में दोस्त भी मिले ,उम्मीद भरते हुए ख़्वाब भी देखे ... सेहत के प्रति ध्यान भी तभी गया जब उसने कहीं स्पीडब्रेकर तो कभी माइलस्टोन दिखा कर चेताया । एक तरह से सिर्फ एक पहले से पूर्वनिर्धारित ढांचे में ही रंग भरते गए बिना यह सोचे कि हम चाहते क्या हैं या हममें क्या करने की काबिलियत है ! ईश्वर ने अपनी प्रत्येक कृति को कुछ विशेष करने के लिये ही बनाया होता है ,जिसके बारे में कुछ सोचने या जानने का प्रयास किए बिना ही , पहले से तैयार रास्ते पर चलने की जल्दी में जीवन ख़तम कर इस दुनिया से चल देते हैं ।

बहरहाल यह सोचने के स्थान पर कि हम क्या कर सकते थे और क्या नहीं किया ... और यह भी नहीं सोचूंगी कि जीवन कितना बचा है या उसकी उपयोगिता क्या है ... अब बस सिर्फ वही करना चाहूँगी जिसमें मेरे मन को सुकून मिल रहा हो 😊

अब मैं #ऐसे_दोस्त चाहूँगी जो खीर में नमक पड़ जाने पर भी उसके स्वाद में अपनी सकारात्मकता से नया स्वाद भर सकें और यह देख कर कि मैं किसी प्रकार चल पा रही हूँ ,दौड़ नहीं सकती की लाचारी के स्थान पर ,यह कहने का जज़्बा रखते हों कि अपने दम पर चल रही हो ,किसी पर निर्भर नहीं हो । मेरे लिये पहले भी और अब भी दोस्त का मतलब ही होता है एक ऐसी शख़्सियत जिसके पास मेरे लिये #वक़्त हो ,उसके दिल - दिमाग़ में #मुहब्बत हो ... ज़िन्दगी कितने भी उबड़ खाबड़ रास्तों पर चल रही हो ,वह एक #उम्मीद की रौशन किरण हो ... दावत पर आमंत्रित कर के दूसरी सुबह सैर पर ले जाना न भूले कि #सेहत न बिगड़े ।

मैं ऐसे दोस्त को खोजने के लिये परिवार के बाहर जाऊँ यह जरूरी भी नहीं 😅 यह फोन पर भी आवाज़ भाँप लेने वाले अपने बच्चों में भी मिलता है ,तो कभी सुबह की चाय बनाने का अनकहा सा आलस चेहरे पर भाँप लेने वाले हमसफ़र में मिल जाता है । #निवी

रविवार, 6 जून 2021

लघुकथा : मैं चाहता हूँ !

 लघुकथा : मैं चाहता हूँ !

सुबह से ही घर का माहौल तल्ख़ था । वह उठा और अपनी चाय का कप रसोई में रख आया । बाकी के कप मेज पर ही पड़े थे ,बच्चे ने उन पर निग़ाह पड़ते ही वो सब उठाये और रसोई में रख आया । सब अपने - अपने काम का बहाना करते अपने कमरों में सिमट गए और ए. सी. ऑन कर लिया । ज़ाहिर सी बात है ए. सी. ऑन होने पर कमरों के दरवाज़े भी बन्द होने ही थे ।

थोड़ी देर में घण्टी की आवाज़ पर बाहर देखने के साथ ही वो बोल उठा ,"काम करने के लिए बुलाया है, बात कर के रख लो ।"

वह चौंक उठी ,"अचानक क्या जरूरत पड़ गयी जो इस को बुलाना पड़ा ? "

वह पौरुषीय दम्भ में झुंझला पड़ा ,"सब अपने कमरों में काम करेंगे तो नाश्ता - खाना पहुँचाने के लिए इसकी जरूरत पड़ेगी । मैं नहीं चाहता कि अधिक काम से थको और बीमार पड़ो ।"

वह शान्त भाव से पलट कर अंदर जाने लगी ,"उसको रखना है तो खुद बात कर के काम समझा दो । वैसे घर का काम नहीं बढ़ा है ,बस दो काम का रूप बदल जाये तो कोई समस्या ही नहीं ... पहली कि जब कोई चाय का कप हटा रहा हो तो सिर्फ़ अपना कप न हटाये ... और दूसरी यह कि मैं चाहता हूँ को हम चाहते हैं में बदल दिया जाये । " #निवी

सोमवार, 24 मई 2021

लघुकथा : कामवाला नाम

 बेबसी भटक रही थी और जीवन की लिप्सा उसकी आँखों में करवटें ले रही थी । अनजान हाथों ने उसकी भटकन को एक घर का आसरा दिया । पर ये क्या ... हर दिन एक नया पर्दा ... एक नया ही चेहरा ... बेबसी पीड़ा में बदल गयी और जीवन जीने की जिजिविषा किन्ही बेनाम अंधी गलियों में खो गयी ।


एक दिन संवेदना ने पीड़ा ने गिरहें खोलने की कोशिश की ,"सुनो तुम्हारा नाम क्या है ?"

झुकी हुई पलकों ने उठते हुए पूछ ही लिया ,"नाम से क्या करना ,कामवाला नाम बता देती हूँ शायद तुम्हारा काम चल जाये ... "

संवेदना ठिठक गयी ,"क्या मतलब ... ?"

विद्रूप हँस पड़ा ,"हाँ ! मेरा कामवाला नाम वेश्या है ।"

विस्फारित सी आँखें जैसे अपने कोटरों से निकल पड़ी हों ,"ऐसे खुद की मजबूरी और परिस्थितियों की उलझन में अपना ही तिरस्कार क्यों कर रही हो ? अच्छा जो तुम्हारे पास आते हैं उनका भी कोई ऐसा ही नाम होगा न ?"

पीड़ा सच का आईना थामे ठठा पड़ी ,"इस पुरुषवादी समाज में नाम सिर्फ हम औरतों का होता है ... बदनाम और गलत्त सिर्फ़ हम औरतें होती हैं ... पुरूष तो अपनी जरूरत पूरी करने आता है न ,उसका नाम नहीं मनोवृत्ति होती है ... सिर्फ़ मर्द की !"
#निवी

गुरुवार, 20 मई 2021

लघुकथा : वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग


शीर्षक : #वीडियो_कॉन्फ्रेंसिंग


एक जोड़ी लब बेहद ख़ामोशी से ,नम होती और नजरें चुराती पलकों को देख रहे थे । परेशान हो कर उन्होंने दिमाग को वीडियो कॉल कर ही दिया कि एक पंथ दो काम हो जाएंगे पलकों की समस्या का पता भी चल जाएगा और विचारों और वाणी (लबों) की जुगलबंदी भी फिर से सध जाएगी । सच्ची आजकल दिमाग से ज्यादा दिल से उसका बंधन सात जन्मों वाला लगने लगा है और ये मुआ दिल न धड़कन की रफ़्तार कम ज्यादा कर के डराता ही रहता है । 


वीडियो कॉल में स्वस्थ और संतुलित दिमाग को देख लबों ने सुकून की साँस भरी । एक दूसरे की कुशल - क्षेम पूछते ही उसने नमी से बोझिल होती पलकों का ज़िक्र किया और उसको भी कॉल में ऐड कर लिया ।


लब ,दिमाग और पलकों की मूक भाषा वाचाल हो चली थी । नमी का कारण पूछने पर पलकें बोल उठीं ,"हमारे चेहरे की ज़मीन पर दाढ़ी ,मूंछों और भौंहों के बाल इतने बढ़ते जा रहे हैं कि मेरी तरफ़ किसी की निगाहें ही नहीं पड़तीं । पहले सब अच्छा- ख़ासा वैक्सिंग और थ्रेडिंग से अपने दायरों में रहते थे ,अब लॉक डाउन में पार्लर बन्द होने से ,इंसानों के मन की तरह इन सबने भी अपने - अपने जंगल बना लिए हैं । मेरी तो कोई वक़त ही नहीं रही ।"


माहौल में छाए हुए भारीपन को दिमाग की खनकती हुई आवाज़ ने तोड़ा ,"परेशान मत होओ ,वक़त असली की होती है न कि समय - समय पर उगी खर - पतवार की । अब देखो न सभी विचारों ,भावनाओं और रिश्तों में भी पॉजिटिव होना चाहते हैं न परन्तु इस कोरोना पॉजिटिव होने से डरते हैं ... इसको भगाना चाहते हैं । जैसे ही पार्लर खुलेंगे ये बढ़ी हुई दाढ़ी - मूँछें गायब हो जाएंगे और सब गुनगुना उठेंगे ... मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले !"


लब भी खिलखिला उठे ,"सच यार तुमने तो प्रमाणित कर दिया कि दिमाग होता क्या है ! "


पलकों की नमी में भी उम्मीदों और दुआओं की पॉजिटिविटी चमकने लगी ।

     #निवी

रविवार, 16 मई 2021

झरता मन ...

 #झरता_मन ...


बिन्दु बिन्दु कर झरती जाये 

यात्रा ये करती जाये !


निरी अंधेरी इस गुफ़ा मे

सूर्य किरण सी दिखती है

कंकड़ पत्थर चट्टानों से 

राह नयी तू गढ़ती है

सर्पीली इस पगडण्डी से

प्रपात बनी उमगती है 

बिन्दु बिन्दु ... 


कन्दराओं से बहती निकल 

सूनी' वीथि तुझे बुलाये

विकल विहग की आये पुकार

रोक रहे बाँहे फैलाये 

लिटा गोद में सिर सहलाती

थपकी दे लोरी गाये

बिन्दु बिन्दु  ...


गर्भ 'तेरे जब मैं आ पाई

प्यार सदा तुझ से पाया

अपनी सन्तति को जनम दिया

रूप तेरा मैंने पाया 

तुझसे जो मैं बन निकली थी 

गंगा सागर हम आये 

बिन्दु बिन्दु ...  #निवी'

शुक्रवार, 14 मई 2021

गीत : आशा के जुगनू

 आशा के जुगनू बने ये नयन हैं

खोजे कहाँ छुप गए उसके मयन हैं !

विरह में जलाती यही वो अगन है
तारों भरा आँचल ओढ़े गगन है
दमकती है चपला सिहरन सी मन की
बहकती ही जाए सजनी सजन की
बनाये गलीचा वो सहस्त्र नयन है
आशा के जुगनू ...

बिजुरी सा दमकता टीका अनोखा
चाँद सी चमकती नथ ने है रोका
छनकती जाए लजीली ये पायल
मदन बाण ने किया है मुझे घायल
आ जाओ तो कर लूँ बातें अयन की
आशा के जुगनू ...

मन से तन तक यही रंग है छाया
सिमट कर चुनरिया में मन हर्षाया
बहकती बदली ,किरण बन तुम छाओ
महकते रंगो ,इंद्रधनुष खिलाओ
बन जाऊँ शय्या अपने मिलन की
आशा के जुगनू ...

निवेदिता श्रीवास्तव '#निवी'

अयन : साथ चलना
मयन : कामदेव

बुधवार, 12 मई 2021

लघुकथा : सपने

 


गुनगुनाते, मुस्कराते हुए दिवी चाय की ट्रे के साथ बालकनी में आ गयी । उसके चेहरे पर फैली सुरभित लुनाई को नजरों से पीता हुआ ,अवी बोल पड़ा ,"क्या बात है जानम ... आज के जैसी सुरमई सुबह तो इसके पहले कभी हुई ही नहीं ... इसका राज़ हमें भी बताओ न !"
दिवी मन ही मन अपनी खुशियों के मोदक का स्वाद लेती हुई बोली ,"जनाब ! जब अच्छी सी नींद आ जाये और उस हसीं नींद में प्यारा सा सपना आ जाये किसी प्यारे का ... हाँ जी तभी ऐसी सुबह होती है । "
"ऐसा क्या ... ",अवी भी हँस पड़ा ।
दिवी भी इठलाती हुई हँसने लगी ,"आप क्या जानो ये सपने और उनका सुरूर ... "
अवी उसके हाथों में चाय का प्याला थमाते हुए मंद स्मित के साथ बोला ,"सच कहा दिवी सपने में किसी प्रिय का आना स्वर्गिक अनुभूति देता है ... परन्तु किसी के सपनों में आना कोई बड़ी बात नहीं ।उसको वो सपना याद रह जाना और उसको हक़ीकत बनाने की जद्दोजहद के बाद ज़िन्दगी की चाय पीना उससे भी अलौकिक है ।"
दोनों की मिली हुई नज़रों में अनेकों जुगनू खिलखिलाने लगे थे ।
#निवी

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

ज़िन्दगी ....

 ज़िन्दगी ने कल यूँ ही चलते चलते रोकी थी मेरी राह 

आँखों में डाल आँखें पूछ  डाली थी मेरी चाह


ठिठके हुए कदमों से मैंने भी दुधारी शमशीर चलाई

क्या तुम्हें सुनाई नहीं देती किसी की बेबस मासूम कराह


ज़िंदगी कुछ ठिठक कर शर्मिंदा सी होकर मुस्कराई

सुनते सुनते सबकी कठपुतली बन गई हूँ रहती हूँ बेपरवाह


आज मैं भी कुछ अनसुलझे सवाल अपने ले कर हूँ आई 

दामन जब खुद का खींचा जाता तभी क्यों निकलती आह


गुनगुनाती कलियों की चहक से भरी रहती थी  अंगनाई

कैसे बदले हालात किसने कर दिया मन को इतना स्याह


हसरतों ने बरबस ही दी एक दुआ और ये आवाज लगाई

बेपरवाह ज़िंदगी इस 'निवी' को तुझसे मुहब्बत है बेपनाह।

                .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

मर्जी है आपकी ....

 #मर्जी_है_आपकी_समझ_न_भी_पाओ_तब_भी_सोच_जरूर_लेना


बिना मास्क लगाए घूमते लोगों से वायरस कहता है ... हम बने तुम बने मैग्नेट से ... 


उसके बाद 🤔

उसके बाद कुछ खास नहीं आकर्षण तो होना ही था ...


बस फिज़ां में गाने के बोल गूँजते हैं ...

चलो चलें मितवा ,इन सूनी गलियों में 

रोकता हूँ तेरी मैं साँसें 

कुछ न बोल ,आ पास आ ले

मिलने को हैं साथी ,रोकते हैं राहें

लपक के थाम ले ,उनकी भी बाहें ...


फिर कहता है ... "जिल्लेइलाही ! आपको हम कोई सजा होने ही नहीं देंगे ... न अपने छू पाएंगे ,न ही घर ले जाएंगे ... बस आपको पूरा ढ़क देंगे ... उसके बाद बस उस जहाँ की सैर पर चलेंगे हम ! " 


मर्जी है आपकी कि आप कहाँ रहना चाहते हैं 🙏 ... #निवी

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

ईरघाट ते बीरघाट

 सच अजीब है ये मानव मन कुछ भी कहो समझता ही नहीं ... पता नहीं क्या हो गया है ... इतनी तेज लू चल रही है कि सब तरफ़ पानी ही पानी दिख रहा है । सच्ची इतनी भयंकर लू में ग़ज़ब की बाढ़ आयी है भई 😏


जानते हैं जब इतनी परेशानियाँ घेरती हैं न तब मेरी आँखों में तीखी धूप की चमक भर जाती है ... उसी में वो क्या कहते हैं कि कोढ़ में खाज होना जैसे ,न जाने कौन दिलजला घण्टी की लाइट जला गया । बताओ भला जो भी देखेगा यही कहेगा न कि दिन - दुपहरी में लाइट जलाए बैठे हैं । घर के अंदर से इतनी जोर - जोर से फूंक रही थी पर लाइट बन्द ही नहीं हुई । सोचा कि चलो पंखा ही चला दूँ ,वो भी पूरी रफ़्तार से ... इधर सोचना था कि पैरों ने उठने देने का इंतजार भी नहीं किया और चल दिये हड़बड़ी में ... फिर ? फिर क्या 😏 वही हुआ जो नहीं होना था और एक पैर की चप्पल चल दी ईरघाट तो उसकी जोड़ीदार दूसरे पैर की पुलिसिया अंदाज़ में चली गयी बीरघाट ... अब क्या - क्या बताऊँ मैं बिचारी ... इस भगदड़ में मेरे पैरों की कुहनी जा टकराई ओस की बूंद से ... अब आप ये मत पूछिए कि इस तपती दुपहरी में ओस की बूंद कहाँ से आ गयी ! आप सिर्फ़ एक बात का जवाब दीजिये कि आप उस से पूछ कर कुछ करते या कहीं आते - जाते हैं ? नहीं न ... तो फिर वो क्यों आपको जवाब दे या बात माने !

हाँ ! तो ओस की बूंद से टकरा कर पैरों की कुहनी की कटोरी अपने बाकी के साथियों ,प्लेट चम्मच वगैरा के पास जाने की तैयारी में कमर कसने लगी ... पर हम भी हम ही ठहरे पकड़ लाये उस को और उसमें करेले की बेल लगा ही दी ... पूछिये ... पूछिये न कि बेल लगाई क्यों ? उससे भी बड़ी बात कि बेल लगाने की ज़ुर्रत कर भी ली तो करेला ही क्यों याद आया ? लौकी की क्यों नहीं लगाई ? जानती हूँ पूछे बिना आप रह ही नहीं सकते हैं ,क्योंकि बिना पूछे तो किडनी के सारे पत्थर दिमाग मे चले जाएंगे और आपकी आँखों को हिचकी लग जायेगी और पलकों की धड़कन रुकने का सब पाप हमारे मत्थे डाल दीजिएगा ... न भाई न ,अपने पाप आप अपने ही पास रखो ,हम तो स्वावलंबी होना सीख गए हैं और जितनी जरूरत होगी न उतने पाप हम खुद ही कमा लेंगे ।

चलिए हम बता ही देते हैं कि हमने ऐसा क्यों किया 🤔 अरे करेले की कड़वाहट उसमें भर जाएगी न तो हाथों के घुटने उस को मुँह नहीं लगाएंगे 😅😅 वैसे भी बड़ा मुश्किल होता है अपने ही हाथों के घुटने को अपने ही मुँह लगा पाना । सच्ची कर के देखो आप ... और अगर कर सको तो मुझे जरूर बताना ,मैं टिकट लगा कर सबको दिखाऊंगी ... और हाँ ! जो पैसे आएंगे अपन आधा - आधा बाँट लेंगे आखिर आइडिया मेरा और मेहनत आपकी जो है ।
    ... निवेेदिता श्रीवास्तव #निवी

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

लघुकथा : चढ़ता पारा

 "क्या हो गया ? लेटी क्यों हो ? अरे यार !सुबह का समय है ,ऑफिस जाना है मुझे ,अब जल्दी से बता भी दो ... ये क्या सुबह - सुबह मनहूसियत फैला रखी है ... जल्दी से चाय बना लाओ ", फ़ोन ,लैपटॉप ,पेपर सब को सामने रखते हुए अवी झुंझला रहा था ।


बिस्तर से उतरती हुई दिवी के लड़खड़ाने पर उसकी निग़ाह पड़ गयी ,"क्या हुआ ? अरे तुम्हारा तो बदन गर्म लग रहा है । बुखार देखा कितना है ? जाओ जल्दी से थरमामीटर ले आओ ,तुम्हारा टेम्परेचर देखूँ ... और सुनो थरमामीटर धो कर लाना ।"

"अच्छा ले आयी ... चलो अब ज़ुबान के नीचे रख लो ,मैं देखता हूँ ... हाँ ! हाँ ! इधर घूम के बैठो तभी तो देख पाऊंगा ,अब उतनी देर खड़ा रह कर क्या कर लूँगा । अरे देख तो रहा हूँ ,तुम बिल्कुल परेशान न होओ । देखो बढ़ रहा है ... 90 ... 91 ... 92 ... 93 ... 94 ... लाओ दो मुझको और क्या देखना 94.8 हो तो सामान्य होता है न ... क्या फ़ालतू में थरमामीटर को मुँह में रखे टेम्परेचर बढ़ने का इंतजार करना ... एकदम ठीक हो तुम । बस अब जल्दी से चाय दे कर टिफ़िन भी पैक कर दो । दिन में सो जाना ,नहीं तो कहोगी तुम्हारा ध्यान नहीं रखता मैं !"

दिवी ने हँसी रोकते हुए उसके हाथ से थरमामीटर वापस लेते हुए कहा ,"अभी पारा चढ़ रहा है ।"
#निवी

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

उदासी की दस्तक ....

 आज उदासी ने दी थी दस्तक

छू कर मेरी उंगलियाँ
बस इतना ही कहा
आओ तुमको दिखाती हूँ
अपना हर एक ठिकाना !

मेरी बेबस सी उदासी ने झाँका
उसकी उदास आँखों में
तुमको खोजने और कहीं क्यों जाऊँ
तुम तो बसी हो मेरे अंतर्मन में
सुनो ! पहले मुझको तो मुक्त करो
फिर चल दूँ साथ तुम्हारे !

उदासी ने बरसाई एक उदास मुस्कान
और देखा मुझको पलट कर
सुनो ! आओ मेरे साथ चलो
बेबसी के कुछ बोल सुनाती हूँ
आज तुमको अपने असली ठिकाने दिखाती हूँ !


तुमको अपनी ही उदासी दिखाई देती है
जानना चाहती हो क्यों !
तुमने न अपनी आँखों पर
ये जो ऐनक है चढ़ाई
इसमें सिर्फ और सिर्फ दिखाई देती है
तुमको अपनी ही उदासी और तन्हाई !

और सुनो न ऐ मेरी उदासी !
जबसे मैंने बदली है अपनी ऐनक
दूसरों की पीड़ा और उदासी ने भी
मेरे दिल को घेरा है और मैंने
उस ऊपरवाले को याद किया
अपनी छटपटाहट को भूल गयी
उदासी को बेघर करने की अहद उठाई
कहीं आम्र पल्लव में कोयल है कूकी !
#निवी

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

मानवावतार


मानवावतार

सामान्यतया किसी भी धारणा की विवेचना करते समय हम आध्यात्मिक ,सामाजिक अथवा प्राकृतिक में से ही किसी भी अवधारणा का प्रश्रय ले कर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते हैं । इन समस्त धारणाओं के मूल में मनोवैज्ञानिक चिंतन स्वतः ही विद्यमान रहता है । मनोविज्ञान व्यक्ति का ,समाज का या प्रकृति का होता है ।

मानवावतावार को यदि प्राकृतिक अवधारणा के अनुसार मनन करें तो हम यही पाते हैं कि सृष्टि के क्रमिक विकास में ... जल से थल होते हुए आकाशीय विकास के परिवर्तनशील चक्र के सहायक के जैसे ही परमसत्ता ने अपने विभिन्न रूपों में क्रमिक अवतार लिया और अपने समय को एक व्यवस्था दी ।

सामाजिक अवधारणा के अनुसार भी जब परिस्थितियाँ सामान्य मानव के विवेक एवं नियंत्रण से परे हो जाती हैं ,तब परमसत्ता मानव के रूप में ही अवतरित होकर व्यवस्था के विचलन को नियंत्रित करती है ।

अध्यात्म भी यही कहता है कि जब दुष्प्रवृत्तियों के अत्याचार और अनाचार असह्य हो जाते हैं परम शक्ति पृथ्वी पर मानव रूप में आकर उन दुष्प्रवृत्तियों का दमन कर सृष्टि को सुरक्षित और संरक्षित करती है ।

इन सभी धारणाओं के मूल में मनोवैज्ञानिक आधार साथ ही चलता रहता है । ईश्वर को हम सर्वशक्तिमान मानते हैं । इसीलिए जब हम स्वयं को दुष्कर परिस्थितियों का सामना करने में असमर्थ पाते हैं तब हारे को हरिनाम जैसे सहायक व्यक्ति को परमसत्ता का मानवावतावार की संज्ञा दे देते हैं ।

सहायक प्रवृत्ति के इस रुप को भी हम मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं । हममें ही कुछ व्यक्ति ऐसी संत प्रवृत्ति के होते हैं जो प्रत्येक परिस्थिति में समभाव से रहते हैं ,जैसे कितनी भी विपरीत परिस्थिति हो वह उनके लिये अनुकूल ही प्रतीत होती है । यह आदर्शवादिता के चरम की स्थिति होती है । दूसरी प्रकार की प्रवृत्ति में हमारा आदर्श जिनको हम मानवावतावार मानते हैं उन दुष्कर परिस्थितियों का सामना करते हुए सुधार करते हैं ,स्वयं की परिस्थितियों का भी और समष्टि का भी । तीसरे प्रकार वह आदर्शवादी आते हैं जो स्वयं का न सोच कर सिर्फ समाज के लिए ही प्रयासरत रहते हैं । इस को स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा भी कह सकते हैं ।

मानवावतावार की अवधारणा के मूल में यही तत्व रचा - बसा रहता है कि जब आम जन विवश हो जाते हैं तब उनकी आत्मचेतना एवं प्रेरणा बन कर एक युग - पुरूष अवतरित होता है जो उनमें आत्मबल भरने के साथ ही समस्या समाधान भी कर देता है ।

मानवावतावार को यदि एक पंक्ति में परिभाषित करना हो तो कह सकते हैं कि एक सुनिश्चित प्रकृति के अनिश्चित अन्त के मध्य आयी उथल - पुथल को नियंत्रित करनेवाली परम - शक्ति और सबके मनोबल में नवजीवन भरनेवाली परम शक्ति को ही मानवावतावार माना गया है ,जिनका नाम कलचक्रानुसार भिन्न - भिन्न है ।
..... निवेदिता श्रीवास्तव '#निवी'

बुधवार, 31 मार्च 2021

टेढ़ा अंगना ....

 प्रिय - प्रियतमा बैठ रहे बतियाय

कारण - निवारण समझ न पाय

ग्यारह नम्बर से थे फिटम फैट
कब - कैसे बन गए एट्टी एट

घर में भरा सब सरंजाम
भूल गए हम तो व्यायाम

स्विगी जोमैटो खूब मंगाया
दावत में भी माल उड़ाया

चेहरे की तो बढ़ी लुनाई
कटि सम हो गयी कलाई

कैसे सजूँ बता ओ सजना
मन मेरा हुआ अनमना

गोरी बैठी बोले टेढ़ा अंगना
करधनी बन गयी कंगना !
#निवी'

रविवार, 28 मार्च 2021

क्षणिका में क्षण भर की होली

 



चौक पूरें होली का
दहन करे राग अरु द्वेष
आशाओं के रंग घुलें
बच सके न कोई क्लेश !

***
पालन परम्पराओं का करें
देख समय की मांग
दो ग़ज़ की दूरी जरूरी
सोच में न घोलो भांग !

***
काम आएं सभी के
भूल कर भी भूले नहीं
सैनिटाइजर संग मास्क ,
थोड़ी दूरी है जरूरी
महामारी से सबको
सुरक्षित रखना है टास्क !
#निवी

बुधवार, 24 मार्च 2021

लघुकथा : एक दिन छुट्टी वाला


हाँ ! बताओ क्या करना है ।आज कोई मीटिंग नहीं ,ऑफिस भी नहीं ... क्या हेल्प करूँ ... लंच तो तुम बना ही चुकी हो ... चाय बनाऊँ इलायची डाल कर ... 🤔😀 ( बन्दा पूरे जोश ओ खरोश में )

हेल्प ... छोड़ो तुम रेस्ट करो ... चाय के साथ क्या लोगे ... ( घर मे दिख जाने का एहसान मानती बन्दी )

नहीं ... आज तो तुम रेस्ट करो ,मैं बनाता हूँ न ... ( बन्दा  एकदम टॉप ऑफ वर्ल्ड टाइप महसूस करते )

ऐसा क्या .... अच्छा ऐसा करो चाय के साथ पनीर के पकौड़े बना लेना और डिनर में एक ही सब्जी कोफ्ते बना लो साथ मे जीरा राइस ... और हाँ रोटी नहीं पूरियाँ बनाना ... डेज़र्ट चलो बाजार से रबड़ी ले आना और हाँ कॉर्नेटो भी लेते आना ... चलो तबतक मैं थोड़ा सो लेती हूँ 😅
#निवी

मंगलवार, 23 मार्च 2021

माँ ! कह तू एक कहानी ...

 🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿

🌿🌸 #माँ_शारदे_के_चरणों_में_वन्दन 🌸🌿

🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸


माँ ! कह तू एक कहानी

जिसमें राजा हो न रानी हो !


खेल खेलती नेह बरसाती

नानाविध खाना खिलाती

प्यार लुटाती इक मइया हो 

सपनों सजी इक नइया हो

द्वार बंधी सपनों की कहानी हो 

पर जिसमें राजा हो न रानी हो !

माँ ... 


साथ तेरा कभी न छूटे 

अपना कोई कभी न रूठे

साथ मेरा हमसाया हो

तेरे आँचल का साया हो

संग बादल के चाहे न तारे हों

अंग खिले खुशियों की रवानी हो

माँ ...


बातें करनी सूखे पेड़ों की 

उलझ चुकी उन मेड़ों की

बचपन जिनमें बसता था 

कितनी बातों पर हँसता था

यादों भरी इक अंगनाई हो

सिर सहला हँसती पुरवाई हो !

माँ ....       #निवी

मंगलवार, 16 मार्च 2021

रस्साकशी ज़िन्दगी के पलड़ों की

 दो पलड़े लड़खड़ाते ... डगमगाते से मानो एक दूसरे के साथ रस्साकशी कर रहे हों । एक पल को लगता है बस अनवरत वर्षा सी वो बस बरसती जाए शब्दों से भी और नयनों से भी ... पर अगला ही पल एक आदत सा ,आ कर जैसे पसरता हुआ सा ,शब्दों का अकाल ला कर बंध्या बदली सा उन लम्हों को बिन बरसे ही काल की गोद में मुँह छुपाने की विवशता याद दिला जाता ... और वह रेगिस्तानी लम्हा तुला की कील सा स्वयं को साधता हुआ ,दोनों पलड़ों का संतुलन साधने की कोशिश में ,दूज के चाँद सी धूमिल मुस्कान दे जाता ,और ... और फिर कुछ ख़ास नहीं बस समाज और सामाजिकता के फेफड़ों में कहीं अटकी हुई साँस की धौंकनी खिलखिलाती झूम कर आती दिखाई दे जाती है । जीवन ... पता नहीं जीवन फिर आगे चलने लगता या फिर शुतुरमुर्ग बन जाता !


ख़ुश्की और नमी पता नहीं लम्हों की होती है या एक आदत की ... परन्तु होती जरूर है ... कभी परावलम्बी लगती है तो कभी धुर विरोधी ... हों या न हो परन्तु अपनी अनुपस्थिति में भी जैसे चीख - चीख कर अपनी उपस्थिति जतला देते हैं । नयनों की रूखी सी ख़ुश्की अनुभूति दे जाती है कि अभी कुछ नम शब्दों का काफ़िला यहीं दिल की भूलभुलैया सी गलियों से बहा है । नयनों में समाई बाढ़ में सारे अहसास कहीं बह जाते हैं और शब्द का कारवाँ भी ख़ामोशी से उस धारा में से सूखा ही निकल आता है ...

सच ! अजीब सी ही है यह भूलभुलैया जीवन की जो चलती हुई साँसों को अटका जाती है तो कभी रुकी हुई साँसों को जैसे साँस भरने की उम्रकैद दे जाती है । समझ ही नहीं आता है कि रुकी हुई जीवन्त साँसों को मृत कैसे मान लें और चलती हुई मुर्दा साँसों को जीवित क्यों मानें !

समाज और सामाजिकता न होती तो ये ख़ुश्की और नमी के सजीव और निर्जीव ,दोनों ही पलड़े असन्तुलित हो जीवन की कड़वाहट और उत्कट वीभत्सता की बेबाक बयानी कर जाते ... अनवरत चलती रस्साकशी साँसों के चलते रहने का बहाना बनती जाती है ... #निवी

मंगलवार, 9 मार्च 2021

हमसाया


पहेली सा जीवन 

#सुख_दुःख की धूप छाँव

चलता चरखा कर्मों का

बुनता बाना #लाभ_हानि का

#अंधेरा_उजाला हमसाया बन 

फसल बीजते जय पराजय की

कभी कभी बरसती बेबस यादें

ज्यों धुनिया धुनता #रात_दिन

अल्हड़पन का साथी था बचपन

उलझता गया क्यों #निवी का मन !

       ... निवेदिता श्रीवास्तव #निवी

सोमवार, 8 मार्च 2021

लघुकथा : #शंखनाद_कतरन_का



फ़ोन रख कर विधी सफ़ाई के छूटे हुए काम को ,फिर से पूरा करने में लग गयी थी ,परन्तु काकी के डाँटते हुए बोल अभी भी कानों में गूँज रहे थे ,"क्या बहू ! इतनी समय लगाती हो फ़ोन उठाने में ... कर क्या रही थी ... जानती तो हो कि इसी समय मैं इतनी फ़ुरसत पाती हूँ कि इत्मीनान से तुमसे बात कर सकूँ ,तब भी ... "


काम निपटा भी नहीं था कि फिर से फ़ोन की घण्टी ने बजते हुए अपने होने का अनुभव कराया । उधर से देवर जी बोल रहे थे , "भाभी कभी तो फ़ोन तुरन्त उठा लिया करो ... करती क्या रहती हो ?" आवाज़ की तुर्शी को अनदेखा करते हुए उसने बात की और फिर से शेष बचे कामों के गठ्ठर को खिसकाने का प्रयास करने में लगी ही थी कि दरवाज़े की घण्टी ,प्रशांत के आने की आहट देती बजने लगी ।


खुलते हुए दरवाज़े के सामने प्रशांत झल्लाया सा खड़ा था ,"क्या यार ! मैं रोज इसी समय तो आता हूँ ,फिर भी दरवाज़ा खोलने में इतना समय लगाती हो । अपना काम पहले खतम नहीं कर सकती हो क्या !"


थोड़ी देर में ही सब व्यवस्थित हो कर चाय नाश्ते का आनन्द ले रहे थे कि बेटा बोल पड़ा ,"वाह माँ ! आपने कतरनों से कितनी अच्छी डोर मैट बना दी है । सच आप तो बहुत बड़ी कलाकार हो ।"


सब समेट कर ,विधि पर्स ले बाहर निकलने को हुई तो सबकी प्रश्नभरी नज़रें उसकी तरफ ही टँगी हुई थीं । उसने स्मित बिखेरते हुए कहा ,"तुम लोग परेशान मत होओ ... मैं तो नया कपड़ा लेने जा रही हूँ ... अब कतरनों से मैं कुछ भी नहीं बनाऊँगी ... न तो कपड़े की और न ही समय की ।"

       ... निवेदिता श्रीवास्तव #निवी

गुरुवार, 4 मार्च 2021

बाल गीत : रेल शब्दों की



मुन्नू मुनिया करें मनमानी
सेब को बनायें जहाजरानी
चींटी आंटी को तीर पर बिठाया
बालक ने केले का बैट बनाया
शुरू देखो हो गया मैच
ब्लू बॉल बिल्ली ने की कैच
कप को कैंडल से सजाया
कार्पेट बिछा डॉल्फिन आयी
दरवाजे से डक औ डॉगी आये
ड्रम को डाइस सा लुढ़काया
अरे ... अरे ... आठों ईगल क्या छुपाएं
धत्त तेरे की लिफाफे में कान थे उनके
हाथी ने मेंढ़क को दिखलाया
मछली लगती कितनी प्यारी
फूल झण्डे सा लहराये
पाँच बकरियाँ चिल्लाईं
हरी घास हम न खायें
हमको तो अंगूर है भाये
लड़की गिटार संग गाए
गीत दिलों में बसता जाए
सोचो बच्चों घर बर्फ का बन जाये
आइसक्रीम कभी पिघल न पाए
उड़ी बाबा ... कीड़ों से भरा है जंगल
जीप भर के जोकर पतंगें रंग बिरंगी लाये
खुशियोंवाली चाभी राजा लाये
दिया ज्ञान का उजास भर जाये
माँ मग में दूध है लायीं
मन तो आम का पहाड़ मांगे भाई
नोट कहीं ये कर लो
तेल का न समुद्र बहाना
खाना सदा पौष्टिक ही खाना
तालाब में मोर प्यानो बजाए
क्यू बनाये कोयल कूक सुनाए
सद्प्रयास का इक रेनबो बनाएं
आसमान से समुद्र तक
जाले की सीढ़ी मकड़ी बनाये
सुबह करना दाँतों की सफाई
टीचर ने भी बात यही बताई
यूनिफॉर्म पहन तुम आओ
छाता जरूर संग ले जाना
वेजिटेबल सैण्डविच टिफिन में दूंगी
अरेरे वॉटर बॉटल की न वीणा बजाओ
छड़ी लिये परी खिड़की से आई
क्रिसमस ट्री जरा ज़ूम कर देखो
तोहफों में जाइलोफोन छुपा है
चलो अब ए से ज़ेड तक तुम सुनाओ
देखूँ क्या समझे इन शब्दों से भाई !
.... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

बुधवार, 3 मार्च 2021

लघुकथा ( शैली : संवाद ) : आभासी मिलन



एक - दूसरे को झाँक कर देखने का प्रयास करते और विफल होने पर बातें करते एक जोड़ी कान ...


सुनो !


हाँ ! बोलो न ... 


सुना है कि हम दोनों एक से ही हैं ...


हाँ ! यही तो मैंने भी सुना है 


ये बताओ तुमको कैसे लगा कि हम एक जैसे ही हैं ...


ये फ़ोन न जब मेरे पास आता है तब भी वो गालों को उतना ही छूता हुआ दिखाई देता है ,जितना तुम्हारे पास जाने पर 😅😅


 हा हा हा ... कह तो सही रहे हो 


अरे ! इतनी अच्छी बातें करते - करते उदास हो कर चुप क्यों हो गए हो 🤔


हमारे गुनाहों की सजा आँखों को मिलती है न ... सुनते हम हैं पर भीगती तो ये आँखें हैं ... 


हाँ ! यह बात भी सही है ... बहरहाल ये छोड़ो एक बात बताऊँ ... 


हम्म्म्म ... 


खुशी में दुलार करने के लिये ही हमको एक साथ पकड़ते हैं ,गुस्सा तो एक को ही पकड़ कर उतारते हैं 😏 😅😅


अच्छा ये बताओ हम क्या कभी एक - दूसरे को देख या छू पाएंगे ?


बिल्कुल ... पर आभासी रूप से 😅😅


आभासी 🤔


अरे जब चश्मे की दोनों कमानी की वरमाला हमारे गले झूलेगी और जो आँखें हमारी वजह से नम होती हैं न उनके सामने लेंस आ जायेगा न , बस उसी में आभासी रूप से हम मिल लेंगे 😊  .... निवेदिता 'निवी'

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

रहूँ तेरे साथ !!!



💐💐💐💐
बावरा मन पूछे कान्हा से
किस रूप रहूँ तेरे साथ !

मोर पंख बना ले कृष्णा
मुकुट संग सजूँ तेरे माथ ,
वैजयंती में सुगन्धि बन बसूँ
हॄद तेरे रच जाऊँ मेरे नाथ !

आलता बन पड़ जाऊँ पाँव
कंटक सारे चुन लूँ दीनानाथ ,
पीताम्बर बन अंग सज जाऊँ
रखना संग मुझे मेरे जगन्नाथ !

चल मुरली बना ले मनमोहना
सज्ज रहूँ तेरी कटि में या हाथ ,
बोली तीखी बोले न कभी मुझे
अधरों पर अपने सजा श्रीनाथ !

सुदर्शन चक्र बन कभी न पाऊँ
कैसे करूँगी किसी को अनाथ ,
बता न छलिया क्या बनाएगा
अन्तस ने कर लिया प्रमाथ !

बावरा मन बोले कान्हा से
रहना मुझको तेरे ही साथ ,
जिस विध चाहे रख मुझको
सदा रखना तू 'निवी' को साथ !
.... निवेदिता श्रीवास्तव '#निवी'

प्रमाथ : मन्थन

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

एक ख़त चाय के नाम 😊


#एक_ख़त_चाय_के_नाम 😊


ऐ मेरी चाय !☕

कैसी हो ? मुझको याद कर रही हो न ! मैं भी तुमको बहुत मिस कर रही हूँ । आज भी याद करती हूँ वो सारे लम्हे जिनमें तुम रूप बदल - बदल कर मुझ तक आती थी । कभी काँच के लुभावने छोटे कप - सॉसर में ,तो कभी स्टील के मग में ... किसी में कोई कार्टून बना होता तो किसी में फूल पत्तियाँ रहतीं । मुझे तो आज भी वो कप बहुत याद आता है जिसमें जैसे - जैसे गर्मागर्म सी तुम भरती जाती तो उस की सतह पर मेरा नाम और अक्स बनता जाता था ।


स्वाद ... उफ़्फ़ ... ज़िन्दगी के कितने अलग - अलग स्वाद से भरी मिलती तुम मुझसे ... कभी अदरख तो कभी लौंग - इलायची में रची - बसी ,तो कभी ग्रीन टी के अवगुंठन में स्ट्रॉबेरी, रसबेरी ,नींबू वगैरा ... और हाँ ! कभी गुस्से में भरी ब्लैक टी भी 😅 सच कितने रंग ,कितने रूप हैं तुम्हारे ।


आज भी जब ब्लैक कॉफी पीती हूँ न ,तो पहला घूँट तुमको याद कर के ही लेती हूँ और उसकी कड़वाहट को कण्ठ में उतार लेती हूँ ❣️


सुनो तो ... जरा अपना कान इधर लाना ... ये जो मुझ में बढ़ी हुई मिठास ( शुगर ) है न ,जरा कम हो जाये दवाओं से तब मिलती हूँ तुमसे ... रोज न भी मिल सकूंगी तो क्या हुआ ,कभी - कभार तो मिल ही जाऊँगी ... तब तक तुम बस यूँ ही मेरी यादों में बसी रहना 😊


पहचान तो गयी ही होगी मुझको ... 

तुम्हारी #मैं  ... #निवी

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

अवकाश प्राप्ति ( रिटायरमेंट )



जीवन की प्रथम श्वांस से ही हमारे सामने आनेवाले समय के लिये एक उद्देश्य मिल जाता है और हम यथासामर्थ्य उसको प्राप्त करने का प्रयास करते हैं । उंगलियों में कलम / पेंसिल पकड़ते ही अच्छी शिक्षा और उसमें भी अव्वल रहने का लक्ष्य साधने की बात दिमाग में भर दी जाती है । शिक्षा में पकड़ बनाते ही नया लक्ष्य सम्मुख आ जाता कि कोई अच्छी सी नौकरी / व्यवसाय हासिल करना है ... उसके बाद क्रमशः विवाह ,बच्चे ,उन बच्चों को व्यवस्थित करना इत्यादि ।

इतना सब करते हुए समय आ जाता है अवकाश प्राप्ति ( रिटायरमेंट ) का ... अब सबसे बड़ा प्रश्न कि कोई प्रश्न / लक्ष्य बचा और बना ही नहीं ... अब क्या करें ? पहले के संयुक्त परिवार में तो सबके साथ यह समय टीसता नहीं था ,परन्तु अब एकल परिवार का अकेलापन वीरानी ला विवश सा करता है प्रत्येक आती - जाती साँसों को गिनने के लिये ।

अक्सर तब एक ही प्रश्न ज़ेहन में दस्तक देता है कि अवकाश प्राप्ति का अर्थ जीवन की दूसरी जीवन्त पारी का प्रारंभ होता है या प्रतीक्षा जीवन के अंत की !

अवकाश एक ऐसा लम्हा है जिसकी हम बहुत चाहत रखते हैं ,परन्तु अवकाश प्राप्ति के बारे में तो सोचते ही नहीं है ,जबकि हम को सबसे अधिक तैयारी और सकारात्मकता की आवश्यकता इस समय ही चाहिए ।

अमूमन अवकाश प्राप्ति के बाद का समय निष्क्रियता को ही समर्पित मान लिया जाता है ,जिसको रूखे शब्दों में कहूँ तो चलती हुई साँसों के रुक जाने का ,अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा बन जाती है ,जो सर्वथा गलत्त है ।

मुझको तो अवकाश प्राप्ति नये उन्मुक्त जीवन की शुरुआत सी लगती है । इस समय के पहले हम सिर्फ चुनौतियों का सामना करने ,स्वयं को प्रमाणित करने में ही व्यस्त रहते हैं और इन सब के बीच हम अपने शौक पूरे करना ,खुल के जीना भूले रहते हैं ,जो पहले बहुत जरूरी रहता है ।

यह भी सम्भव हो सकता है कि अवकाश प्राप्ति के बाद शायद हम शारीरिक रूप से कुछ परेशानियों से घिर गए हों ,तब भी यदि नाचने की इच्छा कभी कहीं दबी रह गयी हो तो बेशक हम मुक्त पवन सा लहरा न पाएं परन्तु थिरकने का प्रयास जरूर करना चाहिए । हो सकता है कि शास्त्रीय गायन की स्वर लहरियों को हमारी उखड़ती हुई साँसें न सम्हाल पाएं ,तब भी रैप की तरह निकली अपनी आवाज़ को गुनगुनाना मान कर चन्द साँसें सुकून की अपने फेफड़ों को मुस्कुराते हुए देना चाहिए । अपने जीवन की हर पेन्डिंग हो चुकी ख़्वाहिश को पूरा करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए । और हाँ ! यदि आवश्यक न हो तो नौकरी नहीं करनी चाहिए ,बल्कि स्वेच्छा से समाज के प्रति कुछ सेवा जरूर करनी चाहिए ।

मैं अपनी बातों / विचारों को समेटते हुए सिर्फ़ इतना ही कहूंगी कि सबके प्रति जिम्मेदारियों को पूरा करने की थाली सजाने के बाद अब अपनी खुशियों की थाल परोसने में न तो संकोच करें और न ही कंजूसी । ऐसा करने से हमारे न रहने पर हमारा परिचय सिर्फ़ यही होगा कि ... हाँ ! यहाँ रहती थी मुस्कराती सकारात्मकता 😊 #निवी

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

गीतिका : गीत गाते हुए ...

 गीतिका

चांदनी खिल गयी मुस्कुराते हुए

बादलों ने     कहा गीत गाते हुए।।


इस ज़माने ने देखा मुझे आज फिर

इक नई सी नज़र से बुलाते हुए।


दो कदम आसरा बन चले जा रहे

और मंज़िल मिली सर झुकाते हुए।


जब सपन रंग आंखों में भरने लगे

फिर नज़र मिल गयी दिल लुभाते हुए।


अब हृदय में मेरे तुम जो आ जाओ तो

ये #निवी जी उठे सर उठाते हुए।

   ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

लघुकथा ( संवाद शैली ) : कृष्ण मन

 सुनो तुम हर कदम पर मुझको परीक्षक की दृष्टि से ही क्यों देखते रहते हो ?


नहीं ... ऐसा तो नहीं है ।

अच्छा ! उन तमाम लम्हों की याद दिलाऊँ क्या ?

नहीं ... नहीं ... जाने भी दो न ... उन लम्हों को याद कर ,इस उजली चाँदनी पर अमावस की बदली क्यों ओढ़ना ... मान जाओ न ।

चलो छोड़ो क्योंकि अब उन लम्हों की मिठास को तो स्वयं ईश्वर भी नहीं ला पाएंगे ... परन्तु सिर्फ़ एक बार कारण तो बता ही दो न ,जिससे मेरा मन कुछ तो शान्त हो जाये।

इसका कारण हमारा यह सामाजिक ढाँचा है ,इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं ।

ये क्या बात हुई ... यह तो अपने ही किये गए कार्यों की जिम्मेदारी से पलायन हुआ न ।

मेरा विश्वास करो ,यही सच है । मैं पुरूष हूँ न ,बस इसीलिये तुम्हारे किये गए प्रत्येक कार्य को मैंने कभी अपनी तो कभी दूसरों की निगाहों से ही देखा ।

और मेरी निगाहें या मेरा नज़रिया ...

वो तो कभी सोचा ही नहीं । तुम या तुम्हारा अलग व्यक्तित्व है ही कहाँ ? तुम तो मुझमें ही समाहित हो और मुझे तो आदर्शों के प्रतिमान रचने है न !

हो सकता है कि तुम अपनी जगह सही हो ,परन्तु गलत मैं भी नहीं । तुम तो मन में भी राम की कठोरता सम्हाले रहे,जबकि मैं तुम्हारे मन में कान्हा को तलाशती रही ।

क्या मतलब है तुम्हारा ... क्या मैंने तुम्हारी अस्मिता का मान नहीं रखा ?

बेशक़ रखा होगा ,परन्तु वह भी अपने ही नज़रिए से । वैसे भी तुम्हारा काम तो मेरी प्रतिमा से भी चल जाएगा ,परन्तु मेरा नहीं ।

क्या कह रही हो ?

मैं उस कृष्ण मन को चाहती हूँ जो एक धागे का मान रखने के लिये ,वस्त्रों का ढ़ेर लगा दे । अपने साथी के मन में मैं राधा और द्रौपदी वाला नेह भरा सम्मान चाहती हूँ ।
                        ... निवेदिता श्रीवास्तव #निवी

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

लघुकथा : प्रेम कनिष्ठावाला ( वैलेंटाइन डे )

 

प्रेम कनिष्ठावाला ( वैलेंटाइन डे )
******
सुनो !

हूँ ...

बहुत सोचा पर एक बात समझ ही नहीं आ रही😞

क्या ?

अधिकतर लोगों को देखा है कि वो तीन उंगलियों में ,यहाँ तक कि अंगूठे में भी अंगूठी पहन लेते हैं ,परन्तु सबसे छोटी उंगली को खाली ही छोड़ देते हैं ।

हा ... हा ... सही कह रहे हो 😅

अरे ! हँसती जा रही हो ,कारण भी तो बताओ ।

हा ... हा ... अरे सबसे छोटी होती है न किसीका ध्यान ही नहीं जायेगा इसीलिये ...

मजाक मत करो ,सच - सच बताओ न ,तुम क्या सोच रही हो ?

अच्छा ये बताओ ,हम कहीं जाते हैं तो तुम मेरी छोटी उंगली ,मतलब कनिष्ठा क्यों पकड़ लेते हो ?

अरे ! वो तो किसी का ध्यान न जाये कि हमने एक दूजे को थाम रखा है ,बस इसीलिये ...

अब समझो कि तर्जनी पकड़ाते ही इसलिये हैं जिससे किसी को सहारे का आभास हो  ...

हद्द हो यार तुम ,मैं बात करूंगा आम तुम बोलोगी इमली ...

सुनो तो ... कनिष्ठा प्रतीक है प्रेम का ...

प्रेम का ?

हाँ ! हम जिसके प्रेम में होते हैं उसकी हर छोटी से छोटी बात भी महत्व रखती है ...

वो तो ठीक है परन्तु कनिष्ठा को आभूषण विहीन क्यों रखना ?

क्योंकि जब दो प्रेमी अपने होने का एहसास करते हैं तब वो कनिष्ठा पकड़ते हैं ।  रस्सी का सबसे छोटा सिरा पकड़ लो तो दूरी खुद नहीं बचती । पकड़ में मजबूती नहीं होती पर विश्वास होता है । अब इस छुवन में आभूषण बैरी का क्या काम ... हा ... हा ...

तुम भी न बस तुम हो 💖💖
                ... निवेदिता श्रीवास्तव #निवी

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

व्यर्थ साँसें क्यों है गंवाए !

 मदिर मन्थर मोहक मलयानिल

नतनयन नवयौवन निरखे
सुमधुर सलोना सज्ज सा सपना
धैर्य धरे धरणी अब कैसे
पीत पात सरस धड़के हिया
गोरा गात नित धूमिल होय
धूम्र रेखा सी जीवन रेखा
पंकज सरस गात नचावे
मान न जाने ,मन मनावे
जीवन ज्योति गलती जाए
#निवी सुध ले तू अपने मन की
व्यर्थ साँसें क्यों है गंवाए !
  ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

लघुकथा : एक टुकड़ा आसमान का


भीनी- भीनी सी बदली का एक छोटा सा टुकड़ा दूर कहीं आसमान में लहराता दिख रहा था ,जैसे अपने झुण्ड से एक मेमना अलग हो भटक रहा हो । कभी वह सूरज की थोड़ी ऊष्ण होती सी किरणों के सामने आ कर आँखों को सुकून दे जाती ,तो कभी तप्त किरणों के आगे से जैसे जल्दी से हट जाती थी । 


बहती हुई नदी की चंचल धारा ने उससे पूछा ,"बहन ! एक बात बताओ कि ,तुम को सूरज की किरणों से कोई शिकायत नहीं है क्या ... आखिर बदन तो तुम्हारा भी जल कर सिकुड़ जाता है !"


बदली का वह नन्हा सा टुकड़ा मानो और भी हँस पड़ा ,"नहीं ... सूरज क्या ,मुझे तो किसी से भी बिलकुल भी शिकायत नहीं है क्योंकि तीखापन उनकी प्रवृत्ति है और शीतलता मेरी । दो विपरीत प्रवृत्तियों से एक जैसा होने की उम्मीद या शिकायत करना तो उन दोनों के ही साथ अत्याचार होगा । वैसे नदी बहना ! जब अपना रास्ता बदलती हो ,तब करती तो तुम भी यही हो 😅"


नदी की भी लहरें मचल उठीं ,मानो उसने अट्टहास किया हो ,"दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए अपना अस्तित्व बनाये और बचाये रखने की सकारात्मकता सब में नहीं होती है ,परन्तु जिस ने भी इस बात को समझ लिया वही अपने हिस्से के आसमान के साथ ,सुकून से रह पाता है ।"

       ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

रविवार, 17 जनवरी 2021

ज़िन्दगी और बाग़वानी

 ज़िन्दगी का हर आता जाता पल और उसके अनुभव बदलते मौसम की बागवानी का एहसास कराते रहते हैं । कभी सब कुछ सही तो मन बसन्त अनुभव करता ,नहीं तो लू के थपेड़े सा झकझोर जाता है । मन खुश तो गुलाब की खुशबू ,नहीं तो काँटे की चुभन । 


बावरा मन ऐसे ही किसी लम्हे में ज़िन्दगी को बानी जैसा समझने लगता है । वैसे सच कहूँ तो जीवन का चक्र व्यक्ति का हो या पौधों का एक सा ही लगता है । वैसे ही गर्भ में जीवन का अंकुरण ,चन्द मुस्कराती पत्तियों की झलक से ठुमकते क़दम और उन डगमगाते कदमों को गिरने से बचाने के लिए बड़ों की सलाह रूपी बाड़ । कभी वो बाड़ काँटे चुभोती तो कभी उस पर अंदर से ममता के लेप जैसी किसी नरम गुच्छेदार लता की परत । माली जैसे कुछ आदतों को तराश कर हटाना ,तो कुछ को उनकी प्राकृतिक प्रकृति से सर्वथा विपरीत किसी अन्य आकार में ढाल देना मानो एक चित्रकार के हाथों में डॉक्टरों वाले उपकरण थमा देना ... क्योंकि माली उस पौधे को उस आकार में ही देखना चाहता है अन्य कुछ हुआ तो सब बेकार !

पौधों की एक बहुत अच्छी विशेषता होती है कि किसी सूखते हुए और फल न देने वाले पौधे के पास यदि किसी फलदार पौधे को रख दिया जाए तो पहले का सूखता हुआ पौधा भी लहलहा उठता है । ज़िन्दगी को बाग़वानी का पर्याय माननेवाले हम ,असली जीवन में यह भूल जाते हैं और कभी नज़र का अंदेशा जता कर तो कभी टोक लगने का डर बता कर परेशानहाल व्यक्ति को और भी उपेक्षित करते रहते हैं ,जो सर्वथा गलत्त है ।

एक चीज़ मुझे और खलती है कि पौधों को समुचित दूरी बना कर रखा जाए या एकदम झुण्ड बना कर ,उनमें आनेवाले फूलों की खुशबू कभी कम नहीं होती ,न ही उनका सौंदर्य । असल ज़िन्दगी में रिश्तों के बीच स्पेस की चाहत इस हद तक बढ़ जाती है कि उनकी पहचान ही विस्मृति के गर्त में डूब जाती है । यहाँ पर भी ज़िन्दगी और बाग़वानी थोड़ा अलग से होते जाते हैं ।

अन्त में मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगी कि सिर्फ जीवन के प्रारम्भिक दिन ही बागवानी से साम्यता रखते हैं ,फिर धीरे - धीरे दोनों की मूल प्रकृति अलग होती जाती है और हम आदर्शवाद की दुनिया मे विचरते 'करना चाहिए' की बात करने के लिये साम्यता देखने और दिखाने लगते हैं । यदि हम ज़िन्दगी और बागवानी को एक कहना और समझना चाहते हैं तो हमको एक - दूसरे को सकारात्मकता देने की दिशा में भी सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये । 

ज़िन्दगी आती हुई साँसें हैं और बाग़वानी जीवन शैली !
                                          ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

गलियाँ यादों की (१)

यादों के गलियारे में दस्तक दे ही रही थी कि एक याद ने अनायास ही दामन थाम लिया । हिन्दी दिवस और हिन्दी भाषा से जुड़ी हुई है यह याद 😊


एक बार हिन्दी - दिवस पर अमित जी के साथ ही उनके पूर्व छात्र सम्मिलन में गयी थी । वहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम में सब की सहभागिता का आनन्द ले रही थी कि अचानक ही मंच से उद्घोषक की आवाज़ आयी ,"अब आप सब के समक्ष मिसेज अमित अपनी एक रचना सुनाएंगी ... स्वागत है आपका ।" सब के साथ मैं भी तालियाँ बजा रही थी उनके स्वागत में । तभी उद्घोषक ने मेरी तरफ़ देख कर हँसते हुए फिर कहा ,"दो अमित हैं तो कन्फ्यूज़न हो रहा है न ! अब मैं अलग तरह से बुलाता हूँ ... आइये मिसेज बमबम ।" दरअसल मेरे पति को उनके मित्र 'बमबम' कहते हैं । बहरहाल इस अचानक आये बाउंसर को झेलते हुए मोबाइल की तलाशी ली और एक रचना सुना दी । और हाँ ! तालियाँ भी बटोर लीं 😅😅


बाद में हम सब बातें कर रहे थे तो एक महिला एकदम चुप बैठी बस सुन रही थीं । एकाध बार उनको भी बातों में शामिल करने का प्रयास किया, पर वो प्यारी सी मुस्कान दे चुप ही रह गईं । थोड़ी देर बाद अकेले मिलते ही बातें करने लगीं और बोलीं ,"असल में मुझे अंग्रेजी नहीं आती है । यहाँ अधिकतर वही बोलते हैं तो मैं चुप ही रहती हूँ । " मैंने उनसे बातें की और मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया कि मैं भी हिन्दी ही बोलती हूँ । 


बातों में ही पता चला कि उनका और मेरा मायका एक ही है ,गोरखपुर ! मैंने छूटते ही कहा ,"का बहिनी अब ले छुपवले रहलू ।" वो एकदम ही संकुचित हो गईं ,"अरे ऐसे न बोलिये ,सब इधर ही देख रहे हैं ।" मैंने उनको समझाया कि अपनी भाषा अपनी ही है ,इसमें कोई शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए । फिर मैं भोजपुरी ही बोलती रही और वो हिन्दी । इस तरह उनकी अंग्रेजी में न बोल पाने की हिचक थोड़ी कम हुई । 


उस शाम और मेरे इस तरह बिंदास भोजपुरी और हिन्दी बोलने से हमारे समूह को उनके रूप में एक और हिन्दी की कवयित्री मिल गयी । 

                  ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

हौसला और विश्वास


हौसला और विश्वास 

मानव मन कह लीजिये या ज़िन्दगी के रंग ,बड़े ही विचित्र होते हैं । जब भी ज़िन्दगी ठोकर के रूप में फुरसत के दो पल देती है ,मन या तो व्यतीत हुए अतीत की जुगाली करता रह जाता है या फिर अनदेखे से भविष्य की चिंता ... वर्तमान की न तो बात करता है ,न ही विचार और ज़िन्दगी एक खाली पड़े जार सी रीती छोड़ चल देता है ,इस जहान से उस अनदेखे जहान की यात्रा पर । 


ऊपर बैठा हमारी जीवन डोर का नियंता ,अनगिनत पलों और भावनाओं की लचीली डोर में उलझा कर ,परन्तु एकदम साफ स्लेट जैसा मन दे कर भेजता है और हम अपने परिवेश के अनुसार उन लम्हों के गुण - अवगुण सोचे बिना ही ,ऊपर ला कर साँसें भरते चल पड़ते हैं एक अनजानी सी रिले रेस में । जब भी कहीं डोर में तनाव ला कर ,ज़िन्दगी हमारे क़दम रोकती है ,हम लड़खड़ा कर एकदम ही निराश हो अंधकूप में गिर कर छटपटाने लगते हैं और समय को कोसने लगते हैं । जबकि कितने भी बुरे दौर से गुज़र रही हो ज़िन्दगी ,चाहे एकदम नन्ही सी ही हो ,परन्तु एक आशा की किरण वो अपने दामन में सदैव संजोये रखती है । उस समय सिर्फ़ हम ही कुसूरवार होते हैं उस को न देख पाने के ।


कभी - कभी शारीरिक परेशानियाँ हमें घेर लेती हैं ,हम स्वयं को एकदम ही बेचारा सा अनुभव करते हैं और सोचते हैं कि हम कभी कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, उठ भी नहीं सकेंगे परन्तु तभी अपने किसी बेहद प्रिय के आने की भनक पाते ही उसके स्वागत की तैयारियों में दिल - ओ - जाँ से जुट जाते हैं । उस समय की यदि कोई हमारी तस्वीर ले कर कुछ समय पहले की निराश दम तोड़ती तस्वीर से मिलाये तो लगेगा ही नहीं कि दोनों तसवीरें एक ही व्यक्ति की हैं । यदि इसमें कहीं कोई जादू है तो वह सिर्फ मनःस्थिति बदलने का ही है ।


इन सारी बातों का सिर्फ एक ही मतलब है कि हमारे जीवन में बहुत सारे रंग भरे हुए हैं ,आवश्यकता बस इतनी ही है कि अपनी ज़िन्दगी के सूरज और चाँद के सामने से ग्रहण भरे पलों के बीत जाने देने की जिजीविषा बनाये रखने का । 


एक बात और भी है यदि रगों में बहता है तो बी पॉजिटिव ( b +) सिर्फ एक ब्लड ग्रुप का नाम है ,परन्तु यदि वही दिल - दिमाग में बसेरा कर लें तो जीवन शैली बन कर ज़िन्दगी को इन्द्रधनुष बना देते हैं !

... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

शनिवार, 2 जनवरी 2021

#बोलो_क्या_क्या_खरीदोगे


बचपन में घर में काका को अक्सर गुनगुनाते सुना था ,"बड़ भाग मानुस तन पायो ,माया में ही गंवायो " ... कई बार पूछने और उनके समझाने पर भी ,मेरे बालमन को यह मायामोह का गोरखधंधा कुछ समझ नहीं आया था । उसके बाद ज़िन्दगी के मायाजाल ने क्रमशः मुझे भी अपनी माया में उलझा लिया और कब बचपन के खेल खिलौने के स्थान पर कॉपी - किताब आ गए ,और फिर ज़िन्दगी के झिलमिलाते हुए अन्य सोपान जैसे इस विचार से ही मन को दूर करते गए । आज इतने लम्बे सफ़र के बाद अनजाने में ही ,मैं भी यही भजन गुनगुनाने लगी हूँ ।


जीवन के अब तक के सफ़र में दोस्त भी मिले ,उम्मीद भरते हुए ख़्वाब भी देखे ... सेहत के प्रति ध्यान भी तभी गया जब उसने कहीं स्पीडब्रेकर तो कभी माइलस्टोन दिखा कर चेताया । एक तरह से सिर्फ एक पहले से पूर्वनिर्धारित ढांचे में ही रंग भरते गए बिना यह सोचे कि हम चाहते क्या हैं या हममें क्या करने की काबिलियत है ! ईश्वर ने अपनी प्रत्येक कृति को कुछ विशेष करने के लिये ही बनाया होता है ,जिसके बारे में कुछ सोचने या जानने का प्रयास किए बिना ही , पहले से तैयार रास्ते पर चलने की जल्दी में जीवन ख़तम कर इस दुनिया से चल देते हैं । 


बहरहाल यह सोचने के स्थान पर कि हम क्या कर सकते थे और क्या नहीं किया ... और यह भी नहीं सोचूंगी कि जीवन कितना बचा है या उसकी उपयोगिता क्या है ... अब बस सिर्फ वही करना चाहूँगी जिसमें मेरे मन को सुकून मिल रहा हो 😊


#ऐसे_दोस्त चाहूँगी जो खीर में नमक पड़ जाने पर भी उसके स्वाद में अपनी सकारात्मकता से नया स्वाद भर सकें और यह देख कर कि मैं किसी प्रकार चल पा रही हूँ ,दौड़ नहीं सकती की लाचारी के स्थान पर ,यह कहने का जज़्बा रखते हों कि अपने दम पर चल रही हो ,किसी पर निर्भर नहीं हो । मेरे लिये पहले भी और अब भी दोस्त का मतलब ही होता है एक ऐसी शख़्सियत जिसके पास मेरे लिये #वक़्त हो ,उसके दिल - दिमाग़ में #मुहब्बत हो ... ज़िन्दगी कितने भी उबड़ खाबड़ रास्तों पर चल रही हो ,वह एक #उम्मीद की रौशन किरण हो ... दावत पर आमंत्रित कर के दूसरी सुबह सैर पर ले जाना न भूले कि #सेहत न बिगड़े । लब्बोलुआब यह है कि मेरी कमी / दुर्बलता को अपनी सकारात्मकता से सुधार सके और सँवार भी दे । ( यह पंक्ति भी एक मित्र के इस कथन को न समझ पाने पर लिखी है 😄)


मैं ऐसे दोस्त को खोजने के लिये परिवार के बाहर जाऊँ यह जरूरी भी नहीं 😅 यह फोन पर भी आवाज़ भाँप लेने वाले अपने बच्चों में भी मिलता है ,तो कभी सुबह की चाय बनाने का अनकहा सा आलस चेहरे पर भाँप लेने वाले हमसफ़र में मिल जाता है  ...#शुक्रिया_ज़िन्दगी ...  निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'