सोमवार, 5 अप्रैल 2021

मानवावतार


मानवावतार

सामान्यतया किसी भी धारणा की विवेचना करते समय हम आध्यात्मिक ,सामाजिक अथवा प्राकृतिक में से ही किसी भी अवधारणा का प्रश्रय ले कर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते हैं । इन समस्त धारणाओं के मूल में मनोवैज्ञानिक चिंतन स्वतः ही विद्यमान रहता है । मनोविज्ञान व्यक्ति का ,समाज का या प्रकृति का होता है ।

मानवावतावार को यदि प्राकृतिक अवधारणा के अनुसार मनन करें तो हम यही पाते हैं कि सृष्टि के क्रमिक विकास में ... जल से थल होते हुए आकाशीय विकास के परिवर्तनशील चक्र के सहायक के जैसे ही परमसत्ता ने अपने विभिन्न रूपों में क्रमिक अवतार लिया और अपने समय को एक व्यवस्था दी ।

सामाजिक अवधारणा के अनुसार भी जब परिस्थितियाँ सामान्य मानव के विवेक एवं नियंत्रण से परे हो जाती हैं ,तब परमसत्ता मानव के रूप में ही अवतरित होकर व्यवस्था के विचलन को नियंत्रित करती है ।

अध्यात्म भी यही कहता है कि जब दुष्प्रवृत्तियों के अत्याचार और अनाचार असह्य हो जाते हैं परम शक्ति पृथ्वी पर मानव रूप में आकर उन दुष्प्रवृत्तियों का दमन कर सृष्टि को सुरक्षित और संरक्षित करती है ।

इन सभी धारणाओं के मूल में मनोवैज्ञानिक आधार साथ ही चलता रहता है । ईश्वर को हम सर्वशक्तिमान मानते हैं । इसीलिए जब हम स्वयं को दुष्कर परिस्थितियों का सामना करने में असमर्थ पाते हैं तब हारे को हरिनाम जैसे सहायक व्यक्ति को परमसत्ता का मानवावतावार की संज्ञा दे देते हैं ।

सहायक प्रवृत्ति के इस रुप को भी हम मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं । हममें ही कुछ व्यक्ति ऐसी संत प्रवृत्ति के होते हैं जो प्रत्येक परिस्थिति में समभाव से रहते हैं ,जैसे कितनी भी विपरीत परिस्थिति हो वह उनके लिये अनुकूल ही प्रतीत होती है । यह आदर्शवादिता के चरम की स्थिति होती है । दूसरी प्रकार की प्रवृत्ति में हमारा आदर्श जिनको हम मानवावतावार मानते हैं उन दुष्कर परिस्थितियों का सामना करते हुए सुधार करते हैं ,स्वयं की परिस्थितियों का भी और समष्टि का भी । तीसरे प्रकार वह आदर्शवादी आते हैं जो स्वयं का न सोच कर सिर्फ समाज के लिए ही प्रयासरत रहते हैं । इस को स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा भी कह सकते हैं ।

मानवावतावार की अवधारणा के मूल में यही तत्व रचा - बसा रहता है कि जब आम जन विवश हो जाते हैं तब उनकी आत्मचेतना एवं प्रेरणा बन कर एक युग - पुरूष अवतरित होता है जो उनमें आत्मबल भरने के साथ ही समस्या समाधान भी कर देता है ।

मानवावतावार को यदि एक पंक्ति में परिभाषित करना हो तो कह सकते हैं कि एक सुनिश्चित प्रकृति के अनिश्चित अन्त के मध्य आयी उथल - पुथल को नियंत्रित करनेवाली परम - शक्ति और सबके मनोबल में नवजीवन भरनेवाली परम शक्ति को ही मानवावतावार माना गया है ,जिनका नाम कलचक्रानुसार भिन्न - भिन्न है ।
..... निवेदिता श्रीवास्तव '#निवी'

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