मंगलवार, 16 मार्च 2021

रस्साकशी ज़िन्दगी के पलड़ों की

 दो पलड़े लड़खड़ाते ... डगमगाते से मानो एक दूसरे के साथ रस्साकशी कर रहे हों । एक पल को लगता है बस अनवरत वर्षा सी वो बस बरसती जाए शब्दों से भी और नयनों से भी ... पर अगला ही पल एक आदत सा ,आ कर जैसे पसरता हुआ सा ,शब्दों का अकाल ला कर बंध्या बदली सा उन लम्हों को बिन बरसे ही काल की गोद में मुँह छुपाने की विवशता याद दिला जाता ... और वह रेगिस्तानी लम्हा तुला की कील सा स्वयं को साधता हुआ ,दोनों पलड़ों का संतुलन साधने की कोशिश में ,दूज के चाँद सी धूमिल मुस्कान दे जाता ,और ... और फिर कुछ ख़ास नहीं बस समाज और सामाजिकता के फेफड़ों में कहीं अटकी हुई साँस की धौंकनी खिलखिलाती झूम कर आती दिखाई दे जाती है । जीवन ... पता नहीं जीवन फिर आगे चलने लगता या फिर शुतुरमुर्ग बन जाता !


ख़ुश्की और नमी पता नहीं लम्हों की होती है या एक आदत की ... परन्तु होती जरूर है ... कभी परावलम्बी लगती है तो कभी धुर विरोधी ... हों या न हो परन्तु अपनी अनुपस्थिति में भी जैसे चीख - चीख कर अपनी उपस्थिति जतला देते हैं । नयनों की रूखी सी ख़ुश्की अनुभूति दे जाती है कि अभी कुछ नम शब्दों का काफ़िला यहीं दिल की भूलभुलैया सी गलियों से बहा है । नयनों में समाई बाढ़ में सारे अहसास कहीं बह जाते हैं और शब्द का कारवाँ भी ख़ामोशी से उस धारा में से सूखा ही निकल आता है ...

सच ! अजीब सी ही है यह भूलभुलैया जीवन की जो चलती हुई साँसों को अटका जाती है तो कभी रुकी हुई साँसों को जैसे साँस भरने की उम्रकैद दे जाती है । समझ ही नहीं आता है कि रुकी हुई जीवन्त साँसों को मृत कैसे मान लें और चलती हुई मुर्दा साँसों को जीवित क्यों मानें !

समाज और सामाजिकता न होती तो ये ख़ुश्की और नमी के सजीव और निर्जीव ,दोनों ही पलड़े असन्तुलित हो जीवन की कड़वाहट और उत्कट वीभत्सता की बेबाक बयानी कर जाते ... अनवरत चलती रस्साकशी साँसों के चलते रहने का बहाना बनती जाती है ... #निवी

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (17-03-2021) को    "अपने घर में ताला और दूसरों के घर में ताँक-झाँक"   (चर्चा अंक-4008)    पर भी होगी। 
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    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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  2. जीवन का नाम ही रस्साकशी है। सपाट रास्ते बोझिल होते हैं, वहीँ उबड़-खाबड़ हरे-भरे ऊंचे-नीचे पहाड़ी पगडंडियां सफर को खुशनुमा बनाते हैं।

    बहुत सुन्दर

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  3. जीवन की खुश्की और नमी के बीच खड़ा है ये प्रश्न क‍ि ...समझ ही नहीं आता है कि रुकी हुई जीवन्त साँसों को मृत कैसे मान लें और चलती हुई मुर्दा साँसों को जीवित क्यों मानें !...अद्भुत बेहद दार्शन‍िक अंदाज़ कही गई तल्ख़ हकी़कत

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