सोमवार, 3 अगस्त 2026

शिव स्तुति

 शिव स्तुति

लगा के चन्दन, करूँ मैं वन्दन
कैलाशवासी शिवोहम शिवोहम!

सुमिरूँ तुझको ओ अविनासी
दरस को तेरे अँखियाँ पियासी
पिनाकपाणी जपूँ मैं स्त्रोतम
आओ उमापति मिटाओ उदासी
झुकाए मस्तक करूँ मैं अर्चन!
लगा के चन्दन, करूँ मैं वन्दन
कैलाशवासी शिवोहम शिवोहम!

कामनाओं के बादल घनेरे
मुझको माया हर पल घेरे
वासना के जाल हटाओ
याचना करूँ लगा के फ़ेरे
लगाई आस बनूँ मैं कुन्दन!
लगा के चन्दन, करूँ मैं वन्दन
कैलाशवासी शिवोहम शिवोहम!

नन्दि सवारी सर्प हैं गहने
तेरी महिमा के क्या कहने
छवि अलौकिक नेह बरसे
त्रुटि बिसारो जो हुई अनजाने
कृपा करो हे सिंधुनन्दन!
लगा के चन्दन, करूँ मैं वन्दन
कैलाशवासी शिवोहम शिवोहम!
✍️निवेदिता श्रीवास्तव निवी
     लखनऊ 

बुधवार, 10 जून 2026

कैसे कह दूँ ...

 कैसे कह दूँ कि मैं परेशान नहीं हूँ

बिखरी सी राहों में पशेमान नहीं हूँ।

उखड़ी सी साँसों से साँस भरती हूँ 

हाथों को नज़रों से थाम कहती हूँ।

जानेजां कर तू परस्तिश हौसलों की

इन्हीं राहों में हम फिर मिल चलेंगे।

ज़िंदगी जिंदादिल वापस मुस्करायेगी 

अपने होने का यूँ एहसास कराएगी।

लरज़ते कदमों से ही तू चल तो सही 

कह रही #निवी  मंज़िल मिल जाएगी।

 #निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी

#लखनऊ

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

पञ्च तत्व से तन बना : निवी


पञ्च तत्व से तन बना , रखे इसे संभाल ।

पंछी इक दिन उड़ चला , छोड़ सभी जंजाल।।


साँस साँस की बात है, साँस लगे अनमोल।

राम नाम की साँस ले, साँसें करें कमाल।।


सत्य शील अरु नेह को, कौन सका है तौल।

लोभ लालसा मोह का, छाया मायाजाल।।


 शब्दों के ही जाल ले, छलते मीठे बोल

 पछताना बेकार अब, खड़ा सामने काल।।


कर्मों से ही सब सधे, कर्मों से हों दूर।

भेड़चाल में चल पड़े, कैसे हों खुशहाल।।


गुरुघंटालों से बचें , ज्ञान दृगों के खोल।

बने सहारा डाल जो , मत काटो वो डाल।।


सागर की लहरों सदृश , जीवन बड़ा अबूझ।

प्रभु की माया समझ ले, भ्रम को 'निवी' निकाल।।

निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

लखनऊ 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

निष्कंटक अविरल बहिये!

 धवल नवल बहती धारा सी 

निष्कंटक अविरल बहिये!


हँस रही तू पलकें मींचे, सिसक रहा क्यों तेरा मन।

खिलती मुस्कानों के नीचे, पीड़ा नाचे ओढ़ वसन।

हृदय पीर से शब्द पिघलते 

वर्ण वर्ण आकार लिये!


तपता सूरज दूर गगन में, जलता रहता मन ही मन।

सरिता सबको शीतल करती, भँवर छुपाये अंतरमन।

सब का देखा ऐसा बाना

अश्रु छुपा कर के हँसिये!


जाती साँस सच दिखलाती,आती साँस आस लाये।

पग-पग रखता चलता मानव, सबको बस करता जाये।

कहाँ-कहाँ तू घूमें हरदम

विनत नयन हो कर चलिये!

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी 

#लखनऊ