गुरुवार, 30 सितंबर 2021

बरसता है मन !

 उमगती है आँधी ,उजड़ता है उपवन

जब रिसती हैं आँखें, बरसता है मन !


डगर रीत की , याद मीत की

टेसू उजाड़ गये ,हार जीत की 

बंसरी मूक हुई ,साँवरे छुप गए

सिसकती है राधा ,सोच प्रीत की !


कसकती हैं यादें ,छलकता है जतन

जब रिसती हैं आँखें, बरसता है मन !


माटी है मिलती ,माटी है गलती

काया की माया ,हर पल है छलती

चक्र चलता गया ,जीव छलता गया

नहीं कोई गलती ,तब भी है गलती !


बरसती हैं साँसें ,सहमता है तन

जब रिसती हैं आँखें, बरसता है मन !


कच्चा है तन ,साया है बाँस का

पल पल है छीजे ,छाजन आस का 

बोझ है भारी ,सम्हाले है गठरी ,

राह देखे है #निवी उस खास का


बिलखती चंदनिया ,बिछुड़ता सजन 

जब रिसती हैं आँखें, बरसता है मन !

#निवी


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-10-2021) को चर्चा मंच         "जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा"    (चर्चा अंक-4204)     पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  2. भावनाओं से ओतप्रोत हृदयस्पर्शी रचना
    हमारे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है!

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