मंगलवार, 10 नवंबर 2020

लघुकथा : अदला - बदली

पराठे सेंकते हुए वसु ने अवि को आते देखा तो वहीं से हँसते हुए बोल उठी ,"सुनो ! ये वाला पराठा थोड़ा करारा हो गया है ,तो मैंने उसको मोड़ दिया है । चुपचाप बिना देखे खा लेना ।" 


अवि पानी लेने रसोई में आ गया था ,"मतलब पराठा जल गया है न ... ऐसे बोलो न ,बिना मतलब के बहाने बना रही हो ," और हँसता हुआ प्लेट ले कर डायनिंग टेबल की तरफ चल गया ,"वैसे जानती हो स्वाद तो इसी पराठे का ज्यादा अच्छा है । "


वसु दूसरा पराठा ले आयी ,"सुनो !देखो न ये वाला कितना अच्छा सिंका है न ... ऐसा करो इस को देखते हुए उस करारे पराठे को खा लो । तुम तो अक्सर यही करते ही हो ... कल्पना से वर्तमान की ख़्याली अदला बदली ... "

    ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (11-11-2020) को   "आवाज़ मन की"  (चर्चा अंक- 3882)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 11
    नवंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12.11.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं