मंगलवार, 29 सितंबर 2020

लघुकथा : कर्मफल

 लघुकथा : कर्मफल


अस्पताल के अपने बेड पर वह पीड़ा से छटपटाते हुए कराह रहा था ,परन्तु उसके आसपास से सब अपने ही दर्द और अपनों की तकलीफों से त्रस्त उसको अनदेखा सा करते हड़बड़ी में गुजरते ही जा रहे थे । तभी एक युवती ने उसके पास आ संवेदना से उसका माथा सहलाया और उसकी पीड़ा उसके नेत्रों और वाणी से बह चली ,"पता नहीं किस पाप का फल भुगत रहा हूँ ! मेरे साथ तुम भी तो ... अब तो मुझे मुक्ति मिल जाती ।  "


युवती ने उसको शांत करने का प्रयास किया ,"बाबा ! ऐसा क्यों कह रहे हो । सब ठीक हो जायेगा ।"


वह फफक पड़ा ,"बेटे के न रहने पर तुम पर शक करना और साथ न देने के पाप का ही दण्ड भुगत रहा हूँ मैं ,पर बेटा तुमको किस कर्म का यह फल मिल रहा है जो मुझ से बंधी हुई इस नारकीय माहौल में आना पड़ता है ।" 


"बाबा ! मैंने अपनी कमजोरी या परिस्थितियों से वशीभूत हो कर आपकी गलत्त बातों का विरोध नहीं किया और चुप रह कर साथ दिया ,उसका ही कर्मफल है यह । गलत्त करने से भी कहीं बड़ा गुनाह गलत्त का साथ देना होता है ," उसके चेहरे की उलझनों पर वीरान शांति छा गई थी । 

                      ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-09-2020) को   "गुलो-बुलबुल का हसीं बाग  उजड़ता क्यूं है"  (चर्चा अंक-3840)    पर भी होगी। 
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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