गुरुवार, 3 सितंबर 2020

रस्मे उल्फ़त

 आज की इस आपाधापी के दौर में 

कुछ यूँ रस्मे उल्फत चलो निभाते हैं


कुछ मैं करती हूँ कुछ तुम समेट लो

चलो कुछ यूँ अपने काम बाँट लेते हैं


नानाविध भोजन हम पका लाते हैं 

बर्तनों की निगहबानी तुम कर लो


झाड़ू डस्टिंग तो हम कर ही आएंगे 

पोछे की बाल्टी जानम तुम ले आओ


कहो तो सौंफ इलायची हम चख लेंगे 

तुम तो बस वो सौंफ़दानी उठा लाओ 


किधर चल दिये अब ऑफिस को तुम

जरा रुको लैपटॉप मैं ले कर आती हूँ


वक्त का पहिया चल पड़ा उल्टी चाल

दो से चार हुए अब चार से फिर दो हुए


ई सी जी के रिपोर्ट सी  देखती चेहरा

कभी कुछ शब्द भी तुम  लुटा जाओ 


बीतती जा रही अनमोल ये ज़िंदगी

बाद में तुम भी याद कर पछताओगे


कितने लम्हों को थामे ये 'निवी' खड़ी

दो चार लम्हे तुम भी कभी खोज लाओ 

       .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (05-09-2020) को   "शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ"   (चर्चा अंक-3815)   पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
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  2. वाह क्या बात कही आपने दीदी जी।गाड़ी के दो पहियों की तरह ये जिंदगानी है।साथ चले तो आसान हो जाती है।बधाई दीदी जी।

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