रविवार, 3 मई 2020

कहानी : अनकहा दर्द

अनकहा दर्द

अन्विता जब भी अनिकेत को देखती ,बस देखती ही रह जाती । जैसे एक देवदूत हो ...एकदम मासूम । सुबह की पहली सूर्य-किरण की मीठी गर्माहट भरे ख्याल सा । जैसे तारों भरी रात के ढ़लते हुए पलों में किसी नन्ही सी कोमल कोंपल पर अपने ही विचारों के उद्रेक में थिरकती ओस की बूँद हो वह। खूबसूरती का कोई ऐसा अलग सा प्रतिमान नहीं था ,परन्तु उसका होना ही उस पल की सबसे खूबसूरत बात होती थी । उसकी गहरी नीली आँखें जैसे समंदर की गहराई संजोये हो .... ख़ामोशी में भी बोलती । जिस पर नजर पड़ जाये उसके दिलो दिमाग पर कब्जा कर लेती थीं ।

किसी से भी कुछ खास बात नहीं करता । जैसे बोलना टालता रहता हो । सबसे अलग ,अपने में ही गुमसुम सा रहता है । इतनी खामोशी, या कह लूँ कि शून्य में अपने आप को समाहित करके भी अपनी नामालूम सी उपस्थिति अनुभव करवा ही देता था । पढ़ाई हो या खेल ,संगीत हो या साहित्य हर क्षेत्र में अव्वल रहता है। वाद - विवाद प्रतियोगिता हो अथवा जैम जैसा खेल ,वह इतनी सहजता से हर तरह के विषय पर यूँ धाराप्रवाह बोलता ,वह भी भाषा और उच्चारण की शुद्धता के साथ कि सब मन्त्रमुग्ध से उसको ही सुनते रह जाते । उसकी खामोशी कभी भी घमण्ड का अनुभव नहीं होने देती थी । इसका कारण भी तो था ... किसी की भी जरूरत के समय वो सबके लिये उपलब्ध रहता था ।

अनजाने में ही उसकी सराहना करते - करते अन्विता ने उसको अपने दिल की धड़कन बना लिया । ये बावरा मन न जाने कितने सतरंगी सपने सजाने लगा है । कभी अग्नि के इर्दगिर्द फेरे लेने की कल्पना करता है ,तो कभी उसकी ही बाँहों में अंतिम साँस लेने की । परन्तु अनिकेत को जैसे अन्विता की भावनाओं की परवाह ही नहीं थी । अक्सर देखती कि जब बाकी के सब साथी ,अन्विता के साथ कि कामना में जैसे गणेश - परिक्रमा करते लालायित रहते कि उसकी कुछ सहायता कर के निगाहों में विशिष्ट स्थान पा लें ,अनिकेत एकदम खामोशी से विपरीत दिशा में चला जाता ।

आज जैसे ही अन्विता कक्षा से बाहर आई अनिकेत दिख गया । अपने में ही खोया हुआ सा ,इतना मासूम ... इतना पावन ... जैसे कोई नन्हा सा बादल राह भटक कर आ गया हो । अन्विता ने सोचा कि उससे बात करके इस तरह अनदेखा किये जाने का कारण पता कर ही ले और अनायास ही उसकी तरफ बढ़ चली ।

अनिकेत ने जैसे भाँप लिया हो कि अन्विता के उसकी तरफ बढ़ते हुए कदम कुछ अलग ही दृढ़ता लिये हुए हैं । वह एक झटके से लाइब्रेरी में जाकर बैठ गया । उसने अपने को जैसे एक सुरक्षित दायरे में कैद कर लिया । अब लाइब्रेरी में तो जो भी आएगा, वो बातें तो नहीं ही कर पायेगा । एक किताब खोल कर उसने खुद को उसमें डुबा दिया ।

कुछ ही पल बीते होंगे कि उस को लगा जैसे कोई उसके ठीक सामने ही बैठ गया हो । निगाहें उठा कर देखा तो सामने अन्विता मुस्कुराती बैठी थी । अनिकेत ने झटके से किताब बन्द की और लाइब्रेरी से बाहर निकल गया ,जैसे उसको कुछ जरूरी काम याद आ गया हो ।

अन्विता एक पल को तो हतप्रभ रह गयी । उसने खुद को सम्हाला और दृढनिश्चय के साथ उसके पीछे चल पड़ी । अनिकेत अब परेशान होने लगा कि आज अन्विता उसका इस तरह पीछा क्यों कर रही !

थोड़ी देर तो अटकता - ठिठकता सा चलता रहा, पर जब उसने देखा कि अन्विता भी पीछे - पीछे चली आ रही है । अपेक्षाकृत थोड़ी कम भीड़ वाली जगह पर उसके रुकते ही ,अन्विता एकदम से सामने आ गयी और सिसक सी पड़ी ,"अनिकेत मुझे मेरा कुसूर जानना है कि मैंने ऐसी कौन सी गलती कर दी है कि तुम मुझसे सामान्य सी बात भी नहीं करते हो ! बाकी सब के साथ तो तुम्हारा ऐसा व्यवहार नहीं रहता ... सबकी सहायता भी भरपूर करते हो ...जबकि मेरे साथ से ही जैसे बचते रहते हो ... अब मैं थक गई हूँ तुम्हारा पीछा करते - करते ,आज मुझे कारण जानना है । तुम यहाँ मेरे साथ बैठो और बातें करो मुझसे क्योंकि बिना तुम्हारा उत्तर सुने न तो मैं जाऊँगी और न ही तुमको जाने दूंगी ।"

अनिकेत का चेहरा पीड़ा से भर उठा और टालता सा बोला ,"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । तुमको गलतफहमी हुई होगी ।"

परन्तु आज जैसे अन्विता कुछ और सुनने को तैयार ही नहीं थी । उसने अनिकेत का हाथ पकड़ कर वहीं बेंच पर बैठा लिया और चुपचाप उसको देखती रही ।

कुछ पलों की चुप्पी के बाद जैसे अनिकेत ने कुछ निश्चय किया और अन्विता की तरफ देखता हुआ बोला ,"मैं अपनी जिंदगी के कड़वे सच के साथ ही अपनी अंतिम साँस तक चुप रहना चाहता था । किसी से भी अपना दर्द नहीं बाँटना चाहता । जानती हो क्यों ... क्योंकि मेरी पीड़ा .. मेरी विवशता को कोई नहीं समझेगा । हाँ सबकी निगाहों में उपहास का पात्र जरूर बन जाऊँगा । "

"तुम कहना क्या चाहते हो अनिकेत ",अन्विता उलझन में थी ।

"मेरे बारे में तुम क्या जानती हो ... सिर्फ इतना ही न कि मैं पढ़ने में अच्छा हूँ ... सबके साथ व्यवहार अच्छा करता हूँ ... जितना सम्भव हो सबकी सहायता करना चाहता हूँ ... हाँ ये भी सच है मेरे बारे में ... पर जानती हो सिर्फ यही नहीं है मेरा सच ... जिस पल तुम मेरा पूरा सच जान जाओगी ,जीवन में फिर कभी मुझको देखना भी नहीं चाहोगी ... मुझसे तुम इस तरह बचोगी जैसे मैं कोई छूत की बीमारी हूँ ... !"

लगातार इतना बोलने के बाद जैसे उसकी आवाज में थकान और बेबसी भर गई ,"तुमको क्या लगता है कि मैं तुम्हारी भावनाओं को नहीं समझता ... सब समझता हूँ ... पर कुछ कर नहीं सकता मैंने इतना लाचार खुद को कभी नहीं पाया ... खुद पर गुस्सा भी बहुत आता है मेरी परिस्थितियाँ ऐसी क्यों हैं ... रोज खुद से लड़ता हूँ और बहुत कोशिश करता हूँ तुमको अनदेखा करने का ... पर जानती हो ये करने में मैं खुद कितना टूटता जा रहा हूँ ... इस बिखराव का कारण जानना चाहोगी ... जिस पल मुझे तुम्हारी पहली झलक मिली थी, उसी पल से मैं तुमको बहुत पसन्द करने लगा हूँ ... देखो कितना डरता हूँ मैं अपनी परिस्थितियों से कि अभी भी नहीं कह पा रहा हूँ कि मैं तुमको प्यार करता हूँ ... इसका कारण सिर्फ यही है कि कोई भी मुझे अपनी नजरों से कितना भी गिरा ले ,पर मैं तुम्हारी नजरों में गिरना नहीं चाहता ... "

अन्विता की उलझन बढ़ती ही जा रही थी ," अनिकेत जब तुम मुझको इतना चाहते हो और तुमको तुम्हारे प्रति मेरी भी चाहत पता है ,फिर समस्या क्या है ?"

अनिकेत को जैसे किसी ने तप्त अंगारों पर डाल दिया हो ,वह छटपटा उठा ,"जानना चाहती हो क्यों ... क्योंकि मैं रेप - चाइल्ड हूँ ! "

वह बोलते हुए जैसे किसी अंधकूप में चला गया ," एक दिन कॉलेज से लौटते हुए मेरी माँ का कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया था और जब उसको होश आया ,तब उसके सामने उसका ही साथी छात्र खड़ा था उसकी अस्मत को तार - तार करते हुए । इसका भी कारण जानना चाहोगी ... मेरी माँ ने उस सहपाठी के प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया था , क्योंकि वो खूब पढ़ - लिख कर जिंदगी में कोई उच्च स्थान पाना चाहती थी ... ऐसा स्थान और सामर्थ्य जिससे वो सबका सहारा बन सके .... उस दिन उस नीच ने माँ को विवश कर अपनी मनमानी कर ली और अट्टहास करने लगा था कि अब तो माँ विवशता में उसकी बात मान कर विवाह कर लेगी ... और जानती हो माँ ने तब भी उसका तिरस्कार किया और अपने दिल में अपना गम छुपा अपनी शिक्षा पूरी करने में लग गयी । "

"कुछ दिनों में जब मेरे अस्तित्व में आने का आभास हुआ ,तब भी सब ने माँ को समझाया कि उसी से शादी कर लें क्योंकि वो नीच बार - बार अपने साथ माँ के विवाह का प्रस्ताव भेजता रहता था ... पर तब भी माँ ने सबकी सलाह को ठुकरा दिया और अपने घर से दूर जाकर अपनी शिक्षा पूरी की और मुझे जन्म भी दिया ... जब साथ के लोग मुझको रेप - चाइल्ड कहते और मैं रोता ,तब माँ ने मुझको हॉस्टल में रखा जहाँ से मैंने पढ़ाई की । अब माँ की तबियत खराब रहने लगी है ,इसीलिये मैं जबर्दस्ती माँ के पास ही रह कर यहाँ पढ़ाई कर रहा हूँ ... "

"अब मैं नहीं चाहता कि मेरी माँ पर कोई भी लांछन लगाए ,इसीलिये मैंने अपनेआप को तुमसे दूर रखने की कोशिश की ... मैं भी जानता हूँ कि कोई भी मुझसे कितना भी प्यार करे या मैं अपने जीवन में कितना भी सामर्थ्यवान हो जाऊँ मेरे जन्म का सच कभी नहीं बदलेगा । "

अन्विता स्तब्ध सी उसको देखती चुप बैठी रह गयी । अनिकेत पीड़ा में भी हँस पड़ा ,"देखा सच जानने के बाद तुम्हारा मेरे प्रति नजरिया बदल गया न ... अब तुम जल्दी से जल्दी यहाँ से भाग जाना चाहती हो न ... जाओ ,तुम भी चली जाओ ... परन्तु मेरे रेप - चाइल्ड होने से भी बड़ा सच ये है कि मैं अपनी माँ की तरफ उठती कोई उंगली सहन नहीं कर सकता ,इसीलिये मैं अकेला ही रहूँगा ।"

अन्विता ने अनिकेत का हाथ मजबूती से पकड़ लिया ,"इतना दर्द .. इतनी कड़वाहट अपने अंदर तुम छुपाये बैठे हो ... वो भी उस बात के लिये जिसमें तुम्हारी कोई गलती ही नहीं है ... जिसने हर तरह का विरोध और कष्ट सहा पर अपने निश्चय पर अडिग रहीं और तुमको भी इतने अच्छे संस्कार दिए .. सच ऐसी माँ की तो पूजा करनी ही चाहिए ... मुझे अपनी पसंद पर गर्व है जिसने इतने दृढमना व्यक्ति को चुना ... ।"

अनिकेत को उलझन में पड़ता देख अन्विता उसमें आत्मबल भरती सी बोल पड़ी ,"तुम्हारा रेप - चाइल्ड होना तुम्हारी गलती नहीं है । पर हाँ तुम्हारा इतना अच्छा होना जरूर माँ के दिये संस्कार हैं ... एक बात बताओगे ... क्या ये माँ मुझको मिल सकती है ... तुम्हारी जीवनसंगिनी बनना चाहती हूँ ,क्या मुझको तुम अपनाओगे ... मेरे परिवार में भी किसी को आपत्ति नहीं होगी इसका विश्वास मैं दिलाती हूँ !"

अनिकेत स्वप्नलिखित सा कहीं दूर क्षितिज में आकाश और धरा को एक दूसरे में समाहित होते देख रहा था ..... 
                                                                                                                ..... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'


4 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीया/आदरणीय आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर( 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३ हेतु नामित की गयी है। )

    'बुधवार' ०६ मई २०२० को साप्ताहिक 'बुधवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य"

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    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

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  2. सार्थक संदेश और भावपूर्ण कहानी

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  3. सुंदर भावपूर्ण कहानी ....

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