शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

मुक्ति .....


हरि हमेशा खुला ईश का द्वार है
मुक्ति के बिन सकल विश्व निस्सार है

चाहती हूँ मिले मेंहदी की महक
हर कदम पर बिछा तप्त अंगार है

वासना से भरी है मचलती लालसा
मुश्किलों से मिला अब यहाँ प्यार है

जाल में फँसा तड़पाता ये मानव 
चाँदनी को निगलता निशा का प्यार है

बिन जपे विष्णु को चैन मिलना नहीं
मुक्ति की कल्पना भी निराधार है 
     ... निवेदिता श्रीवास्तव "निवी"

3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,


    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (07-10-2019) को " सनकी मंत्री " (चर्चा अंक- 3481) पर भी होगी।


    ---

    रवीन्द्र सिंह यादव

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  2. वासना से भरी है मचलती लालसा
    मुश्किलों से मिला अब यहाँ प्यार है

    जाल में फँसा तड़पाता ये मानव
    चाँदनी को निगलता निशा का प्यार है....बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीया
    सादर

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  3. सुंदर शाश्र्वत सा चिंतन देता सृजन ।

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