सोमवार, 17 जून 2019

#लघुकथा : डेज़र्ट

#लघुकथा : डेज़र्ट

सामने अविका को देख खुशी से झूम ही गई मैं ,"कैसी है अवि ... आज उतने दिनों बाद दिखी ,न तो फोन रिसीव कर रही थी और न ही कॉलबैक ... कहाँ गुम हो गई थी ... और ... और ये क्या डेजर्ट लेकर बैठी है ... तुझे तो ये कॉम्बिनेशन एकदम नापसंद था ,फिर ... "
अविका शांत भाव से मुस्कुरा उठी ,"अंकु सब्र कर न ... इतने सारे सवाल एक ही बार में ... चल तेरे सारे सवालों का जवाब मेरा ये डेजर्ट कॉम्बिनेशन ही है "
मैं कुछ भी न समझ उसको देखती ही रह गयी ,"डेज़र्ट ... "
अविका और भी शांत हो रहस्यमयी सा मुस्कुरा दी ," जानती है अंकु ये हमारी जिंदगी इस डेज़र्ट की तरह है ... ठण्डी आइसक्रीम ,गर्म गाजर का हलवा और सबसे गर्म चाशनी से भरा गुलाबजामुन । ये खौलती चाशनी में डूबा गुलाबजामुन हमारी जिंदगी के मुश्किल पल हैं ... पिघलती आइसक्रीम उन मुश्किल पलों में साथ छोड़ते दिखावटी सम्बंध हैं ... और ये नीम गर्म गुनगुनाते एहसास जैसा गाजर का हलवा हमारी सन्तुलित मनःस्थिति है जो इन मेवों ,खोये और मिठास को एक ऐसी एकरूपता देता है जिसमें सबका स्वाद (पहचान) अलग अलग भी पता चल रहा है और एक दूसरे को सम्मान देता सा बाँध कर नई पहचान भी दे रहा है । पिघलती आइसक्रीम और गुलाबजामुन की चाशनी जैसे लम्हों को जिंदगी से निकाल कर ही सहजता से जी सकते हैं ,नहीं तो पछतावे में ही घुटते रह जाना होगा .... "
..... निवेदिता

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (19-06-2019) को "सहेगी और कब तक" (चर्चा अंक- 3371) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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