सोमवार, 23 मार्च 2020

लघुकथा : नारायण अस्त्र

नारायण अस्त्र : लघुकथा

दादी और उनका पोता विहान दोनों ही बार - बार खिड़की से झाँक कर बाहर देखते ,फिर झुंझला कर वापस बैठ जाते। आखिर वो करें भी क्या इस लॉकडाउन में अनुभा ने उन दोनों को बाहर निकलने से रोक जो रखा है । सच्ची डर भी तो है कि इस महामारी के इंफेक्शन का !

अनुभा भी उन दोनों की उलझन देख रही थी । अचानक ही वह उठ कर रसोई में चली गयी और चटपटे पकौड़ों की प्लेट थामे उनके पास आ गयी ,"क्या हो गया आप लोग बोर हो रहे हो ... अच्छा ऐसा करते हैं दादी माँ नारायण अस्त्र की कहानी सुनाइये हमसब को ।"

छुटकू विहान किलक उठा कहानी के नाम से और दादी माँ भी व्यस्त होने के सुकून में कहानी के साथ बह चलीं ,"पिता द्रोण के धोखे से मारे जाने से क्रोधित  अश्वत्थामा ने पाण्डव सेना पर नारायण अस्त्र से प्रहार कर दिया जिसका कोई प्रतिकार कर ही नहीं पा रहा था । ये देख कृष्ण ने सबको उस का प्रतिकार करने से रोक दिया और उस दैवीय अस्त्र के शान्त होने की प्रतीक्षा शान्त भाव से करने को कहा । विरोध न पा कर अस्त्र भी शान्त हो गया और सब सुरक्षित हो गये ।"

"अरे वाह दादी माँ ! ये तरीका तो बहुत अच्छा है बचाव का ",विहान दादी माँ के गले में झूल गया ।

अनुभा मुस्कुरा पड़ी ,"जानते हो विहान हम सब भी अगर ऐसे ही शान्त भाव से घरों में रहें ,तो इस महामारी के बैक्टीरिया फैल ही नहीं पाएंगे और धीरे - धीरे खतम हो जायेंगे । तब तक हमारे वैज्ञानिक भी इसकी प्रतिरोधक दवाइयां खोज लेंगे ,फिर हम सब सुरक्षित रहेंगे । बस तब तक हम सब को घर में रह कर खुद को ही प्रतिरोधक दवा बनना है । "
                 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आज और अभी के अभी इस कहानी को पढ़ कर इतनी बड़ी बात बड़ी आसानी से समझी जा सकती है | बहुत शानदार लघुकथा और उससे भी महत्वपूर्ण सन्देश | सार्थक पोस्ट भाभी माँ

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-03-2020) को    "नव संवत्सर-2077 की बधाई हो"   (चर्चा अंक -3651)     पर भी होगी। 
     -- 
    मित्रों!
    आजकल ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत दस वर्षों से अपने चर्चा धर्म को निभा रहा है।
    आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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