शीर्षक : मंज़िल मिल जाएगी
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कैसे कह दूँ कि मैं परेशान नहीं हूँ ,
बिखरी सी राहों में पशेमान नहीं हूँ ।
उखड़ी सी साँसों से साँस भरती हैं ,
हाथों को नज़रों से थाम कहती हैं ।
जानेजां कर तू परस्तिश हौसलों की ,
इन्हीं राहों में हम फिर मिल चलेंगे ।
ज़िंदगी जिंदादिल वापस मुस्करायेगी ,
अपने होने का यूँ एहसास कराएगी ।
लरज़ते कदमों से ही तू चल तो सही ,
कह रही 'निवी' मंज़िल मिल जाएगी ।।
.... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
