सिसकी धरा
अनवरत बरसा
कुंठित मन
ध्वज थामे थे
उन्नत हो मस्तक
वीरों नमन
लहू बरसा
साँसे थम गयीं थी
हम तो चले
गर्वित मन
अनगिनत मेडल
विक्षत तन
हरी वसुधा
शोणित है लाल
शर्मिंदा हम ..... निवेदिता
अनवरत बरसा
कुंठित मन
ध्वज थामे थे
उन्नत हो मस्तक
वीरों नमन
लहू बरसा
साँसे थम गयीं थी
हम तो चले
गर्वित मन
अनगिनत मेडल
विक्षत तन
हरी वसुधा
शोणित है लाल
शर्मिंदा हम ..... निवेदिता
