गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

मैंने कहा न बस यूँ ही ....


धुंध 
आजकल कुछ ज्यादा ही ,
राह रोक रही है निगाहों की 

अकसर 
बहुत सी चीजें होती हैं पर 
अनजानी अनदेखी ही रह जाती हैं 

मैं हूँ वहीं 
पर तुम देख नहीं पा रहे हो 
शायद चाहत ही नहीं देख पाने की 

धूप
जब प्रखर होती कसूरवार बन जाती 
आँखे पलको की अंकवार से बाहर आती नहीं 

न रहूँगी मैं 
तुम्हारी आँखों की चमक बढ़ जायेगी 
अँधेरे की रौशनी कुछ अधिक ही तीखी होती है ....... निवेदिता