मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

ख़्वाब .....






ख़्वाब ....
कभी मुंदी
और कभी खुली
पलकों से भी
सांस - सांस जिए जाते हैं

ख़्वाब .....
कभी साँसों में
और कभी
दिलों में भी
सहज ही पलते पनपते हैं

ख़्वाब .....
फ़क़त यूँ ही
देखते ही नहीं
धडकनों में भी
सुने और सहेजे जाते हैं

ख़्वाब .....
हरदम सिर्फ
ख़्वाब ही नहीं होते
ज़िन्दगी की
रेशा - रेशा हक़ीकत भी होते हैं
                           - निवेदिता