ये ऐसी विशिष्ट आँखें हैं जिनको एक व्यक्तित्व नहीं सिर्फ उसका स्त्री शरीर ही दिखाई देता है ....
आँखें
कितनी बड़ी दुआ हैं !
किसी अंधेरी राह के
राही ने हसरत छलकाई
सच ऐसा है क्या ...
सोते - जागते हर पल
स्वप्नदर्शी बना
कितनी चुभन दे
दिखा कर राह
रौशन अँधेरे की
गहराइयाँ
या
श्वांस - प्रश्वांस की
राह छलती
दम तोड़ते बोलों से
अबोला करती
देखे - अनदेखे सपनों पर
अश्रुधार बरसा
विप्लव का तांडव बन
कसक बन जाती ....
कैसी है ये दुआ
सिर्फ निगाहें डाल
कर जाती अवांछनीय
और हाँ !
घट भी जाता है अघटनीय
-निवेदिता

