मंगलवार, 1 सितंबर 2020

गीत : प्रणय की बेला

 देख रही मैं सपन अनोखे ,

आ पहुँची प्रिय प्रणय की बेला !


निशा भोर की गैल चली है

तारों ने तब घूँघट खोला ,

मन्द समीर उड़ाये अंचल

रश्मि किरण का मन है डोला ,

पागल मन हो जाता विह्वल

रोज सजाता जीवन मेला !


माया में मन भटक रहा है

पल - पल करता जीवन बीता ,

अनसुलझी लट खोल रहा है

जीवन का हर घट है रीता ,

अंत समय जब लेने आया

मन फिर से हो गया अकेला !


बन्द नयन वह खोल रहा है

सच जीवन का वह बतलाता ,

तेरा - मेरा झूठा नाता

रह रह कर वह है समझाता ,

विहग तो उड़ जाये अकेला

लोभ सजाये मन का तबेला !

   .... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'