देख रही मैं सपन अनोखे ,
आ पहुँची प्रिय प्रणय की बेला !
निशा भोर की गैल चली है
तारों ने तब घूँघट खोला ,
मन्द समीर उड़ाये अंचल
रश्मि किरण का मन है डोला ,
पागल मन हो जाता विह्वल
रोज सजाता जीवन मेला !
माया में मन भटक रहा है
पल - पल करता जीवन बीता ,
अनसुलझी लट खोल रहा है
जीवन का हर घट है रीता ,
अंत समय जब लेने आया
मन फिर से हो गया अकेला !
बन्द नयन वह खोल रहा है
सच जीवन का वह बतलाता ,
तेरा - मेरा झूठा नाता
रह रह कर वह है समझाता ,
विहग तो उड़ जाये अकेला
लोभ सजाये मन का तबेला !
.... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
