ये अपना रिश्ता भी न
सच बड़ा ही अलग सा है ,
अपने बारे में जब भी सोचा
तो तुम बस तुम दिख जाते हो ,
तुम को जब भी जानना चाहा
तो आईना बन मैं ही दिख जाती हूँ ,
सूरज की तीखी चमक हो
या चाँद की स्निग्ध शीतलता ,
परछाँई सा रच - बस कर
एक दूजे की धड़कन बन जाते हैं ,
अपने हर सवाल का
अपनी हर उलझन का
हर हल एक दूजे में ही पा जाते हैं
इस रिश्ते को क्या कहूँ
आईना और परछाँई का
परछाँई के आईने का या
आईने की परछाँई का रिश्ता …… निवेदिता

