ये मौसम ,
बड़े ही अजीब होते
उन कदमों से
इन आँखों तक
रोज ही
अपनी राह बदलते हैं
कभी नम
कभी खुश्क साँसें भर
बसंत को पतझर
बना निर्जीव कर जाते हैं
सफर
फूलों का
बस इतना सा ही है
उस शाख से
पूजा की डोली तक
और कभी
दुल्हन की डोली से
कदम बढ़ा
उस की अंतिम शय्या तक
निष्कंटक
बनी शाख की
अनछुई छुवन
अधखिले फूलों सी
तीली के लब पर
कंपकंपाती थिरकन
ख़यालों के
हर निशान समेटती
वो तपन
मासूम से शोलों की ....... निवेदिता

