मंगलवार, 1 मई 2012

गति-अवरोधक



           हम जब भी यात्रा कर रहे होते हैं ,आस-पास से आती-जाती बहुत सारी बातों पर ध्यान जाता है ,परन्तु जो सुखद और सुरक्षित यात्रा में सबसे अधिक सहायक होता है उस को हम साधारणतया अनदेखा ही कर जाते हैं .... उस पर हमारा ध्यान तभी जाता है जब कहीं ठोकर लगती है अथवा वाहन झटका खा जाता है .... जी हाँ ! मैं गति-अवरोधक की ही चर्चा कर रही हूँ । कभी प्रकृति अपना सौन्दर्य बिखेर हमको मुग्ध कर लेती है ,तो कभी मानवीय निर्माण सडक की गुणवत्ता को हम सराह देते हैं । मार्ग में आने वाले गति-अवरोधक के प्रति अगर अतिरिक्त रूप से सजग रहें तो दुर्घटना की आशंका बहुत कम हो जायेगी ,क्योंकि तब गति हमारे नियन्त्रण में रहेगी हम गति के नियन्त्रण में नही होगे !
          
          आध्यात्म हमारे जीवन को भी एक अनंत यात्रा की ही संज्ञा देता है । हम भी अपने जीवन में अनेक छोटे-बड़े लम्हों में होनी वाली घटनाओं से प्रभावित हो सम्भावित बाधाओं की अनदेखी करते रहते हैं और बाद में अचानक आ जाने वाले गति-अवरोधक पर उछल जाने वाले वाहन की तरह असंतुलित हो जाते हैं । आने वाले सुखद लम्हे के स्वागत में अपनी अतिरिक्त ऊर्जा लगा देते हैं ।उस लम्हे के गुजर जाने के बाद नवीन ऊर्जा संचित करने के लिए कुछ पलों की शान्ति आवश्यक हो जाती है । उन पलों में ,जब हमारा अवचेतन मन ऊर्जा संचित करता है ,एक अजीब से खालीपन का अनुभव होता है ।ये रिक्तता कभी पलायन को भी प्रेरित करती है ,तब एक कामना जागती है कि काश जीवन में भी दूर से ही गति-अवरोधक का चिन्ह दिखाई दे जाए और हम सजग हो जाएँ ..........