शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

" शून्य "


        " शून्य " कितना छोटा सा शब्द ,पर इसका विस्तार इतना ज्यादा है कि सब कुछ इसमें समा जाता है और पता नहीं कहाँ खो जाता है | शून्य एक तरह से खालीपन की ,रिक्तता की स्थिति है | जब मन रिक्त रहता है तब सब कुछ हो कर भी नहीं हुआ सा प्रतीत होता है | इसके विपरीत मन पूर्णता अनुभव कर रहा हो ,तो कुछ न होते हुए भी अंत में भी अनंत सा हो जाता है | 
             खालीपन मन का हो या घर का ,विचित्र होता है | कभी इस रिक्तता से ही आत्म इतना सार्थक और परिपक्व हो कर सामने निकल  कर आता है कि कुछ अनोखा सृजन हो जाता है ................ अन्यथा इसका दूसरा पहलू इतना भयावह होता है कि सब ध्वस्त हो जाता है | शायद कमजोर करते ख़याल ऐसे शून्य में पहुंच चुकी मन:स्थिति में ही प्रभावी हो पाते हैं | 
              अकेला " शून्य " व्यर्थ होता है ,निष्क्रिय कर देता है | भिन्न परिस्थिति में किसी अन्य के साथ प्रभावी मित्र  बन उसमे गुणात्मक वृद्धि कर जाता है | इस " शून्य " को वस्तुत: शून्य मानने वाले अपनी महत्ता कम कर जाते हैं | 
           ये इकलौता " शून्य " हर पल ये एहसास दिलाता है कि हम किसी अन्य का सम्मान अथवा अपमान नहीं करते हैं ,अपितु अपना मान बनाये रखने का प्रयास ही करते हैं ,क्योंकि हमारे साथ से ही हमारा भी आकलन किया जाता है | अगर हमारे परिवेश में कहीं गरिमा अनुभव की जाती है इसका तात्पर्य सिर्फ इतना है कि हम ने अपनी ज़िन्दगी में अपने " शून्य " को उसका उचित स्थान दिया है !