अपनी धुन में रिश्ते यूँ ही निभाते रहे
पिछली रिसती साँसे अनदिखी रहीं
सलामत रहे रिश्ते टीस सा चुभते रहे
सोचा दरारों में कुछ फूल पनप जाएँ
टूटन से बहते पलों को यादें थाम लेंगी
सुरभित पुष्प न सही कहीं से कभी तो
थोड़ी सेवार बहते लम्हों की बाँह गहेगी
नाकाम सी उम्मीद लिए रीतते लम्हों को
नई पहचान देते झूठा सुकून तलाशते रहे
शून्य सी पहचान लिए दायरे का अनदिखा
सिरा तलाशते रह गये ..................
टूटे बरतन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा .......
-निवेदिता




