मेरी उनींदी सपनीली आँखे खोली ,
देखा तो सामने एक लडकी खड़ी थी ,
काम की तलाश में पुकारती ,मैंने पूछा
क्या काम कर पाओगी तुम तो हो इतनी छोटी ,
उसने कहा जो भी आप कहें कर लूंगी ,
घर की सफाई ,या फिर बर्तनों की धुलाई ,
रोटी ही बनवा लें ,या कपडे संवरवा लें !
उसकी अवस्था देखती मैं कुछ कह पाती
तभी कुछ शोर सा सुन वो बाहर को भागी ,
मैं भी थी उसके पीछे-पीछे ,देखा दो-तीन बच्चे
खाने को छीनाझपटी सी कर रहे थे ,
मैं अवाक उन्हें देखती ही रह गयी,
उसने उनका झगडा सुलझाया ,मेरी प्रश्न भरी
निगाहों से नज़रें चुराती किसी तरह बोल गयी ,
"हाँ ! मेरे ही बच्चे हैं ये......."
मैं अवाक उसको देखती ही रह गयी ,
खिलौनों से खेलने की नन्ही सी उम्र में ,
अपने ही बच्चों की उंगलियाँ थामे उनके
बचपन को बचाने की चिंता में ,
कम उम्र में ही प्रौढ़ होती गयी ,
कम उम्र में ही प्रौढ़ होती गयी ,
मैं नि:स्तब्ध इसका कुछ भी समाधान निकाल पाने में
असफल हो रही थी .................
अनायास ही मैंने कहा चलो कहीं तुम्हारे लिए काम
खोजती हूँ ,पर एक शर्त है ,काम सिर्फ
तुम करोगी और बच्चों को स्कूल भेजोगी ....
अपने जैसा उनको न बनाओगी ,और
उनका विवाह इस बचपन में भूल के भी न करोगी
अपने माँ बाप जैसा पाप तुम न करोगी ........
अब उस की निगाहें थी प्रश्न भरी ,
शायद मुझ को वो समझ ही नहीं पायी ,
या कहूं मैं ही उसको समझा नहीं पायी !!!
-निवेदिता
अब उस की निगाहें थी प्रश्न भरी ,
शायद मुझ को वो समझ ही नहीं पायी ,
या कहूं मैं ही उसको समझा नहीं पायी !!!
-निवेदिता

