रविवार, 1 मई 2011

किन्नर-मन



                'किन्नर' ये सुनते ही सब की भाव-भंगिमा बदल जाती है  | एक विद्रूप भरी स्मित से चेहरा भर जाता है | कभी हम में से कोई भी मानवीय हो कर इनके बारे में क्यों नहीं सोच पाता ? जिस नाम से संबोधित करते हैं  , अगर हम सिर्फ़ उस शब्द को ही ध्यान दें तो हमारे मनोभाव पता चल जायेंगे !
'किन्नर'देखा क्या कहा -किन को नर कहा | हमने उन्हें नर (इस पुरुषवादी समाज की अवधारणा के अनुसार) अर्थात इंसान मानने से ही इनकार कर दिया | जबकि अगर देखा जायेतो इन किन्नर नामधारी ने इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है | हमारी याददाश्त इतनी भी खराब भी नहीं हैं कि 'महाभारत' के'शिखंडी'को भूला जायें जिसका सहारा ले कर अर्जुन ने अमर माने जाने वाले युग पुरुष 'भीष्म' को धराशायी कर दिया था |अगर भीष्म जीवित रहते तब क्या कोई भी पांडवों की विजय की कल्पना भी कर सकता था !संभवत:तथाकथित कलियुग भी समय से पूर्व आने को मजबूर हो जाता ......| अज्ञातवास के समय जब पांडव छुपने का प्रयास कर रहे थे तब सर्वमान्य वीर धनुर्धर अर्जुन को 'वृहन्नला' बनना पड़ा था ! ये तो अवसरवादिता ही हुई कि अपने स्वार्थ के लिए हम इस वर्ग को मान दें अन्यथा उपहास करें और स्वयं को श्रेष्ठ माने | मैं भी इस सच्चाई से खुद को अलग नहीं कर पाती हूँ कि अब इस वर्ग का बहुत ही विकृत रूप सामने है | कहीं सड़क पर इन की टोली दिख जाती है तो मैं भी रास्ता बदलना चाहती हूँ परन्तु साथ ही बेहद विचलित भी हो जाती हूँ जब देखती हूँ वो तलाश रहें हैं दूसरों की खुशियाँ जिससे उन को भी जीवनयापन के लिए अर्थार्जन हो जाये |
                     मुझे भी कष्ट होता है जिस तरह ये वसूली करते हैं दबंगई से | किसी भी विवाह-स्थल पर इनलोगों के आने की भनक भर लग जाये माहौल में एक तरह की दहशत सी तैर जाती है | मैं खुद भी प्रत्यक्षदर्शी हूँ , इस पीड़ा का | एक शादी में शामिल हुए थे हम और जिसे तारों की छाँव कहेंगे उस समय ये सब आ गए और अपना तमाशा शुरू कर दिया  .........मेज़बान ने कहा की अगर पहले पता होता तो इस दहेज़ का भी इंतज़ाम कर लेते क्योंकि मांग पूरे इक्कीस हज़ार की थी !खैर वो मामला तो मोलभाव कर के निपट गया | जाते-जाते उन सब ने कहा कि कभी समय हो तो हमारे इस व्यवहार का कारण सोचियेगा  | मैं उस वर्ग की तरफ़दारी नहीं कर रही पर इसके मूल में कहीं न कहीं एक कारण उनकी उपेक्षा भी है | हम सबकी शगुन मनाने वाले इस वर्ग की तकलीफों को अगर सहिष्णु हो कर ,समझ कर दूर करने का प्रयास किया जाये और मन से इनको भी इंसान समझे तब शायद इनको देख कर रास्ता बदलने को मन नहीं आतुर होगा और इनका आक्रोश इस तरह नहीं बिखरेगा क्यों कि ये भी प्रकॄति के सताये हुए ही हैं...................