धवल नवल बहती धारा सी
निष्कंटक अविरल बहिये!
हँस रही तू पलकें मींचे, सिसक रहा क्यों तेरा मन।
खिलती मुस्कानों के नीचे, पीड़ा नाचे ओढ़ वसन।
हृदय पीर से शब्द पिघलते
वर्ण वर्ण आकार लिये!
तपता सूरज दूर गगन में, जलता रहता मन ही मन।
सरिता सबको शीतल करती, भँवर छुपाये अंतरमन।
सब का देखा ऐसा बाना
अश्रु छुपा कर के हँसिये!
जाती साँस सच दिखलाती,आती साँस आस लाये।
पग-पग रखता चलता मानव, सबको बस करता जाये।
कहाँ-कहाँ तू घूमें हरदम
विनत नयन हो कर चलिये!
#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी
#लखनऊ
