मंगलवार, 25 जून 2013

बस बेजुबान हो जाना !


आज खामोशी को ,
बेजुबान कर दिया 
इसलिए नहीं कि ,
कहने को कुछ नहीं 
सुनने को भी बहुत है
और सुनाने को भी !
बस इस पल शायद 
सुनने और समझने  
की तुम्हे चाह नहीं 
जानती हूँ ऐसा क्यों 
सुनना भी तो होगा 
एक तरह का स्वीकार !
कुछ कदमों का जुड़ना 
जैसे तटस्थ श्वांसों का 
निर्लिप्त सा आते जाना 
श्वांस बंध टूटने पर 
नि:श्वांस भर 
बस बेजुबान हो जाना !
                   -निवेदिता 

4 टिप्‍पणियां:

  1. शब्द रहे न स्थिर उस पल, अपनी बोल गये,
    साधा जिनको यत्नपूर्ण, अवसर पा डोल गये,
    तटबन्धों से आस यही, लहरों को समझायें,
    बन्ध बहे निर्बन्ध और अन्तरतम खोल गये।

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  2. कभी कभी बेजुबान होना पढता है ... हर किसी बात की अहमियत होती है ...

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  3. gahan peeda man shant ho kar hii sahta hai ....!!
    sundar abhivyakti ...

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  4. बहुत ही सुंदर एवं सार्थक गहन भाव अभिव्यक्ति...

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