गुरुवार, 16 अगस्त 2012

डोली और अर्थी


डोली और अर्थी 

एक सी होती हैं 
दोनों को उठाने के लिए 
कंधे चार ही चाहिए 
दोनों पर खिलते फूलों की 
अनवरत बरसात चाहिए 
दोनों के पीछे चलती हैं 
जानी अनजानी शक्लें ,
दोनों को ही भिगोती 
कईयों की अश्रुधार है !

पर हाँ ! 
एक कदम चलते ही 
अलग -अलग होती 
दोनों की किस्मत है 
डोली पर बरसे फूलों में 
छिपी - छिपी सी दिखती
नवजीवन की आस है 
डोली के आँसुओं में 
फिर मिलने की आस है !
अर्थी पर बिछे फूल जतलाते
जीवन की क्षणभंगुरता 
अनजाने अनिवार्य सफर की 
यही तो अनचाही शुरुआत है !

दोनों को ही मंजिल 
मिलनी है अनदेखी 
एक में सृष्टि की आस है 
दूजी हर तरफ से निराश है ........
                                -निवेदिता 

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर निवेदिता जी...

    सस्नेह
    अनु

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  2. अब तो शादी के बाद छोरा-छोरी दोनो उड़ते पंछी हो गये हैं। न डोली उठाने वालों के रहे न डोली के स्वागत करने वालों के।

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  3. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 18/08/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  4. निवेदिता जी,

    आपकी ये रचना पढ़ कर मुझे एक गीत याद आया ये बहुत ही पोपुलर है और मर्मस्पर्शी भी डोली और अर्थी पर ही है. अगर संभव हुआ तो फिर उसको डालती हूँ. वाकई दोनों की बहुत सी चीजें समान है बस कुछ पल छोड़ कर. बहुत अच्छा लिखा आपने. आभार !

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    उत्तर
    1. रेखा जी ,शुक्रिया आपका ....गीत के बोल बताइए मैं भी खोजने का प्रयास करूंगी .....-:)

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  5. बस भाव अलग अलग होते हैं .... डोली की सजीवता में सपने होते हैं , अर्थी में कोई स्पंदन नहीं

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  6. बहुत ही सुन्दर और गहन.....पर अब डोली के ज़माने तो ख़त्म हो गए हैं ।

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  7. भाव और कल्पना में गज़ब की शक्ति है ... देखने और समझने का फर्क रहता है बस ... जीवन और मौत ... कितना बारीक फर्क है दोनों में ...

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  8. गहन भाव लिए सशक्‍त प्रस्‍तुति ...आभार

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  9. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..

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  10. जीवन के जुदा अवसरों को आपने शब्दों का ऐसा जामा पहनाया है कि मन भावुक हो उठा।

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  11. दोनों में समानता के साथ भाव अलग अलग है,,,भावुक करती रचना,,,,

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,,
    RECENT POST...: शहीदों की याद में,,

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  12. बहुत काशमसाहट भरी कविता। दो अवसरों के दोनों भावों मे बंधी संतुलित रचना

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  13. बहुत ही सुन्दर गहन और मर्मस्पर्शी कविता

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  14. औरों पर निर्भरता सदा ही घातक होती है..

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