रविवार, 28 अक्तूबर 2018

अनकहे दो द्वार .....



क्यों ..... सुनो .......
ये दो शब्द नहीं
ये सात जन्मों के साथ के
अनकहे दो द्वार हैं
मेरी क्यों कोई सवाल नही 
तुम्हारी सुनो कोई जवाब नही
रूठने मनाने जैसा साथ हो
बताओ न क्या यही साथ है .....

चौथ का चाँद पूजती हूँ
पूर्णमासी का चाँद नही
जानते हो क्यों .....
ये अधूरापन भी तो
सज जाता है चांदनी के श्रृंगार से
मेरी क्यों भी तो पूरित होती है
तुम्हारे सुनो की पुकार से ....

जानती हूँ .... ये सफर जीवन का
इतना सहज भी नही .....
इसीलिए तो साथ हमारा प्यार है
कहीं किसी राह में लगी ठोकर
लड़खड़ाते कदम भी संभल जाएंगे
थामे एक दूजे के हाथ
शून्य से क्षितिज पर आ ही जाएंगे .... निवेदिता

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (29-10-2018) को "मन में हजारों चाह हैं" (चर्चा अंक-3139) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 28/10/2018 की बुलेटिन, " रुके रुके से कदम ... रुक के बार बार चले “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं
  3. दीपोत्सव की अनंत मंगलकामनाएं !!

    जवाब देंहटाएं