बुधवार, 14 सितंबर 2011

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सन्नाटा या वीरानापन
सब हैं कितने अकेले ,
फिर भी समानार्थी बड़े ....
अकेलापन शब्द ही दृषद्वत है  
धरा का हर अणु हर पल 
कितना एकाकी है .......
तन्हाई का साथी अश्रु 
ये भी बहता अकेला है 
कितना बदनसीब है 
सहारा खोजता - खोजता 
भिगोता अपना ही दामन है ............
जब-जब मन व्यथित हुआ ,
तन की पीड़ा भी अलसाई ,
पल-पल कण प्रस्तर हुआ
सराहा तो मन अंधकूप हुआ ..
अकेलापन तो शायद नियति है
सृष्टि का निर्माण भी एकाकी था
अंत भी अकेला है ........ .
                            -निवेदिता 

30 टिप्‍पणियां:

  1. सृष्टि का निर्माण भी एकाकी था अंत भी अकेला है ........ . सही कहा आपने बहुत सुंदर बधाई........

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  2. सन्नाटा या वीरानापन
    सब हैं कितने अकेले ,
    फिर भी समानार्थी बड़े ....
    अकेलापन शब्द ही दृषद्वत है .....सही कहा आपने बहुत सुंदर बधाई........

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  3. जन्म अकेला, मृत्यु अकेली,
    भीड़ बढ़ी, पर रही पहेली।

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  4. सन्नाटा या वीरानापन
    सब हैं कितने अकेले ,
    फिर भी समानार्थी बड़े ....
    अकेलापन शब्द ही दृषद्वत है ....
    बहुत ही बढि़या ।

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  5. सृष्टि का निर्माण भी एकाकी था
    अंत भी अकेला है ........ .
    यही शाश्वत सत्य है।

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  6. अकेलापन तो शायद नियति है
    सृष्टि का निर्माण भी एकाकी था
    अंत भी अकेला है ........ .बहुत उच्च शब्दों का चयन.. बहुत ही प्रभावशाली रचना....

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  7. जब हम अकेले होते हैं तो हमारा साक्षी ईश्वर होता है।

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  8. bahut sunder shabdo se sajaya hai rachna ko..............

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  9. पल-पल कण प्रस्तर हुआ
    सराहा तो मन अंधकूप हुआ ..

    सच... सही कहा आपने..!!

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  10. आप तो वैरागी बना देंगी . सुँदर अभिव्यक्ति .

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  11. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है कृपया पधारें
    चर्चामंच-638, चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  12. सक्स्ह है इंसान अकेले ही आता है और अकेले ही जाता है ... पर यह सोच कर अकेले रहना भी तो आसान नहीं ... सोचने को विवश करती है रचना ..

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  13. सच है- तन्हाई एक अभीशाप है और इस कविता में उसकी पूरी व्यथा झलकती है।

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  14. कभी तन्हाई तडपाती है तो कभी यही एकाकीपन मन को और विचारों को विस्तार भी देता है।

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  15. बहुत गहराई से बाँधा है...बहुत बेहतरीन!!!

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  16. सन्नाटा या वीरानापन
    सब हैं कितने अकेले ,
    फिर भी समानार्थी बड़े ....
    अकेलापन शब्द ही दृषद्वत है .

    sahi kaha aapane

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  17. गुरुदेव रवीन्द्र का एकला चलो का उद्घोष ऐसे ही भावों से उपजा होगा

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  18. बहुत ही प्रभावशाली बहुत ही बढि़या ।

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  19. सत्य से रूबरू कराती कविता।
    ..हाँ, सभी हैं अपने फिर भी हम अकेले हैं।

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  20. अकेलापन सदैव घटक नहीं होता शायद ...कभी कभी बहुत से ऐसे भाव फ्फोत पड़ते हैं इस अवस्था में जो इतिहास रच देते हैं....बहुत संवेदनसील और रोचक प्रस्तुति दी है आपने
    ..बधाई

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  21. अकेलापन मन के अहसास का परिणाम है.
    बहुत लोगों के बीच मन अकेला भी महसूस
    कर सकता है यदि मन की चाहत अनुसार
    साथ न हो.आपकी प्रस्तुति सुन्दर और भावपूर्ण है,
    अंत में दार्शनिकता का बोध कराती है.जो
    परम सत्य है.

    अकेलापन तो शायद नियति है
    सृष्टि का निर्माण भी एकाकी था
    अंत भी अकेला है ........ .

    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर भी आईयेगा,निवेदिता जी.

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  22. सुन्दर अभिव्यक्ति,सारगर्भित

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  23. अकेलापन तो किसी को भी व्यथित कर देता है। ऐसे में कोई कंधा मिल जाय तो....

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  24. सुंदर ..अभिव्यक्ति...शब्द और भाव दोनो बेहतरीन...बधाई

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  25. सभी अकेले हैं.. रात की स्याही मे..दिन की चकाचौंध में.. दिखता है कोई.. कोई खो झता है.
    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  26. सभी अकेले हैं.. रात की स्याही मे..दिन की चकाचौंध में.. दिखता है कोई.. कोई खो जाता है.
    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  27. सुन्दर अभिव्यक्ति,भावपूर्ण.

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