सोमवार, 27 जून 2011

"एक मुलाकात खुद से"


           बच्चों की छुट्टियां चल रही हैं |छोटा बेटा कल ही हॉस्टल से वापस घर आया है ,अपना प्रोजेक्ट पूरा कर के | दोनों बेटों को एक साथ देख पाने का अवसर बहुत समय बाद मिला है | इसको ऐसे भी कह सकतें हैं कि लम्बे अन्तराल के बाद पूरा परिवार इकठ्ठा हुआ है |बच्चों के पिताश्री भी अपना वनवास पूरा कर के वापस लखनऊ स्थानांतरित हो कर आ गए हैं | आजकल समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता ......
            ये देख कर अच्छा लगता है कि बी.टेक. के दूसरे और तीसरे वर्ष में पहुँच गए बच्चों में अभी भी बचपना बचा हुआ है ,चश्मे-बद्दूर !वही बचपन सी धमाचौकड़ी ,शरारतें  और खिलखिलाती आवाजें मकान को घर की गरिमा दे रहीं हैं | पर अब उनके वापस जाने के दिन जैसे-जैसे पास आ रहें हैं आने वाले अकेलेपन के बारे में सोच कर मन घबराता भी है | फिर खुद से खुद को ही तसल्ली भी देती हूँ कि ये इकठ्ठा होना अलग होने के लिए ही था और अब अलग होना भी फिर अगली छुट्टियों में इकठ्ठा होने के लिए है | 
             आज पौधों को देख रही थी तब यही लग रहा था कि अपना जीवन भी उन के जैसा ही है |हम दोनों ने मिल कर जैसे जीवन में एक पौधा लगाया था ,अपना परिवार शुरू कर के |जब तक बच्चे छोटे थे , एक कली की जैसे देख-भाल की जाती है संजोये रखा ,कि कहीं मौसम का कुछ गलत असर न हो जाए |जैसे-जैसे अपनी  उम्र के साथ स्कूल में सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते बड़ी कक्षाओं में पहुँचें लगा कि फूल  खिलने लगा है | सुगंध खुद न महसूस कर  पाए तो औरों ने कहना शुरू कर दिया |पर तब लगता था कि ये शायद तथाकथित सामाजिकता के नाते कह रहें हैं ,क्यों कि उनके दोस्त भी वैसा ही अच्छा कर रहें थे | आज भी अच्छा लगता है जब उनके और दोस्तों को भी अच्छे संस्थान में पढ़ते देखती हूँ | तब तो मुझे और भी अच्छा लगता है जब वो छुट्टियों में घर आने पर आंटी को याद कर चले आते हैं | अब जब  बच्चे अर्धकुसुमित पुष्प से हैं तब यही सोचतीं हूँ कि इन अनमोल पलों को सहेज लूँ , क्योंकि अब शायद उनके एक अलग गुलदान में प्रफुल्लित होने के दिन बहुत पास आ गए  हैं .......
              शायद यही जीवन की रीत है | शायद हम भी अपनी परिधि पूरी करने वाले हैं | कल हमने अपना जीवन शुरू किया था ,आज अब बच्चों की बारी है | पर ये मन इतना पगला है कि सब जानते समझते हुए भी इन पलों को रोक कर रखना चाहता है ...........
                                                      निवेदिता 

31 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्‍कुल सही कहा है आपने ...अपने ही घर में यह मेहमान हो जाते हैं ...आये और गये .. ।

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  2. जिन्दगी का अंतिम सोपान अकेलापन ही है और अपने प्यारों का इंतज़ार,त्यौहार ज़ल्दी-ज़ल्दी आने की चाहत इसी लिए तो होती है की सब इकट्ठे होंगे .. कभी-कभी मजबूरियों में स्वप्न बिखर जाते है और रह जाते है गमले , घास और दोनों.

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  3. jab aana hota hai tab yahi waqt dheere dheere chalta hai , aur aate hi furrrrrrr,
    aisa hi lagta hai

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  4. निवेदिता....जीवन सी नदिया का पानी आगे ही बहता है...बस अपने लिए छोटी छोटी खुशियों की लहरें बनानी हैं...बच्चों के साथ जो पल मिले जी भर के जी लो... यही जाना समझा है...

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  5. कुश्वंश जी की बात से सहमत भावनाएं लाजवाब रूप से प्रस्तुत की है आपने

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  6. छोटी छोटी खुशियाँ -जीवन मे अधिक महत्व रखती हैं भरपूर जीओ। शुभकामनायें।

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  7. आपका परिवार आनन्द में नित नहाये।

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  8. nivedita ji
    bahut hi sahi chitran kiya hai .
    sach me aisa hi hota hai aur sabhi ke saath hota hai
    samay kab pankh laga kar ud jata hai pata hi nahi chalta.
    do log milkar ek parivaar banate hain .fir kab sab kuchh vyvasthit hone ke baad fir do hi prani bach jaate hain ghar me bachchon ke aane ki raah dekhne ke liye .
    bahut hi sundarta ke sath aapne apne is dard ki vyakhya ki hai
    bahut bahut badhai
    poonam

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  9. मन के भावों का बहुत सुन्दर चित्रण..

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  10. man ki gati bahut hi vichitra hai .jab sab hote hai to unke jane ki bajah se ghabrata hai ....

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  11. ये पढ़ कर न जाने क्यूँ कुछ अच्छा नहीं लगा...
    जिस तरह आप उस पार खड़ी हैं और मैं इस पार.... और यकीन मानिए ये जगह बिलकुल भी अच्छी नहीं है...

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  12. वाकई यह पल सहेज कर रखें ! ! शुभकामनायें आपको !

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  13. य़े पल जतन से रखिये यादों की मंजूषा में । जल्द ही इन खिलते पुष्पों का नये गुलदान में सजने का समय आने वाला है ।

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  14. कल 29/06/2011को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है-
    आपके विचारों का स्वागत है .
    धन्यवाद
    नयी-पुरानी हलचल

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  15. बहुत अच्छा चित्रण. मन की भावनाओं को बखूबी उकेरा है कलम से.
    मेरी पोस्ट पहली तारीख देखें मेरे ब्लॉग "रचना रविन्द्र" पर

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  16. inhi choti choti khushiyo mei jindagi basi hai
    bahut khub .....lekh accha laga

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  17. ये जीवन चक्र है जो यूयं ही चलता रहता है ... बस ऐसे समय का आनंद लेना चाइये ... सब कुछ भूल कर बच्चा हो जाना चाहिए ...

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  18. apni zindgi ko bharpoor jeena chahiye.. zindgi bahut khoobsurat hai .. :)
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - सम्पूर्ण प्रेम...(Complete Love)

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  19. यही जीवन चक्र है निवेदिता जी. कल हम वहां पर थे आज आप हैं..... शुभकामनायें.

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  20. यही जीवन की रीत है शायद...सही ही कहा आपने...

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  21. जीवन के पड़ाव, कैसे जल्दी जल्दी निकल जाते हैं कि पता ही नहीं चलता, पर उनकी मधुर यादें अवश्य रहती हैं.

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  22. बहुत सही आपने फ़रमाया...
    शायद
    यही तदबीर है मेरी, यही तक्दीर है मेरी।
    मग़र जो कुछ है मेरे वास्ते जाग़ीर है मेरी॥ी।
    मग़र जो कुछ है मेरे वास्ते जाग़ीर है मेरी॥

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  23. सुंदर संस्मरण , मन की भावनाओं का बहुत अच्छा चित्रण किया है आप ने..धन्यवाद...

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  24. चलिए ये दिन तो चहल पहल और बहार के हैं ......और पिया जी भी घर आ गए हैं -शुभकामनाएं और बच्चों को स्नेहाशीष !

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  25. जिंदगी में यही होता है.....
    बहुत अच्छा लिखा है...

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  26. nivedita ji aapne apne anubhav baante bahut acchha laga...me bhi isi paayedan par kadam rakhne wali hun. yahi manosthiti meri bhi hai.

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