सोमवार, 13 जून 2011

दिये की लौ .........


दिये की लौ ,
हवा के थपेड़ों से ,
प्रकम्पित होती ,
कैसी चमकती ,
अंधेरी राहें बस यूं ही ,
रौशन कर जाती .......
पर कभी जा कर ,
देख तो लो बाती को !
दिया तो फिर एक ,
नयी बाती ले कर ,
हर दिन चमकेगा ,
पर जो जल-जल कर ,
दिये को रौशन कर गयी ,
क्या उस बाती को ........
भूले से भी कभी - कहीं ,
यादों में ला पायेगा !
क्या कभी समझ पायेगा ,
रौशनी तो बाती से ही थी ,
दिया तो सिर्फ नाम था ........
                            -निवेदिता 

24 टिप्‍पणियां:

  1. रौशनी तो बाती से ही थी ,
    दिया तो सिर्फ नाम था ...waah! kya likha hai pane..apne ehsaaso ko shabdo me utar diya apne... very nice...

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  2. उत्कृष्ट कविता बधाई और शुभकामनाएं |थोड़ी व्यस्तता है देर से आने के लिये क्षमा कीजियेगा |

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  3. रोशनी बाती की ही होती है, श्रेय दिये को मिलता है।

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  4. "तन का दीया प्राण की बाती , दीपक जलता रहा रात भर " जीवन दर्शन में दीया बिना बाती के निष्प्राण है .

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  5. रौशनी तो बाती से ही थी ... ise samajhna hi to aasaan nahi hota

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  6. रोशनी तो बाती से ही होती है।
    ...बहुत खूब।

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  7. very nice
    u re right
    baato se hi jindagi roshan hoti h aur baatein hi andhera kar deti h

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  8. रोशनी तो बाती से ही होती है।
    ...बहुत खूब।
    बिलकुल नयी सोच

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  9. Intense feelings and message behind this beautifully written poem.
    Nice read !!!!

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  10. आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  11. बाती के मन कि व्यथा को अपने शब्दों में ढालने का खूबसूरत प्रयास ...
    पर दीये और बाती का साथ तो जन्मो का है ...दोनों पूरक है एक दूसरे के
    दीया बाती बिन सुना है ..और बाती दीये के बिना जल भी नहीं सकती
    --

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  12. वह बहुत अच्छी रचना है ! मज्जा आ गया !मेरे ब्लॉग पर अपना सहयोग दे !
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  13. सच है बाति भी नीव की तरह होती है खुद जलती है नाम दिए का करती है ....

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  14. क्या कभी समझ पायेगा ,
    रौशनी तो बाती से ही थी ,
    दिया तो सिर्फ नाम था ......

    गहन अभिव्यक्ति ... बाती की बात कोई नहीं करता ..बाती की तरह ही नारी का जीवन है ..सुन्दर अभिव्यक्ति

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  15. मित्रों आपके स्नेह के लिये आभारी हूँ .....
    @अनु ,बाती तो बिन दिये के भी जल जायेगी चाहे कहीं भी रख दो ,पर दिया बिन बाती के रौशन नहीं होगा ..... धन्यवाद !

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  16. क्या कभी समझ पायेगा ,
    रौशनी तो बाती से ही थी ,
    दिया तो सिर्फ नाम था

    बेहद विचारणीय सोच और गहन अभिव्यक्ति, गंभीर आवरण लिए आपकी रचनाये बेहद संवेदना छिपाए होती है बधाई

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  17. क्या कभी समझ पायेगा ,
    रौशनी तो बाती से ही थी ,
    दिया तो सिर्फ नाम था ......

    बहुत ही सुंदर,

    आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  18. ये सच है....लेकिन अधूरा ही है.......................ये दास्ताँ-ए-मोहब्बत है दिए और बाती की.....जो प्यार में एक दूसरे को जलाते हैं..तड़पाते हैं.....फिर आने वाले वियोग की आग में जलते हैं...धधकते हैं.....और जब ये आग बुझती है.......तो केवल और केवल राख़ बचती है...............हाँ हर बाती जल कर मुक्त हो जाती है......लेकिन दिया तो बेचारा रोज़-ब-रोज़ इस विरह की आग में जलता है....अपनी प्रेयसी को राख़ में तब्दील होते देखता है....और जब यह पीड़ा असहनीय हो जाती है तो टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो जाता है.....

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  19. रौशनी तो बाती से ही थी ,
    दिया तो सिर्फ नाम था ........

    Bemisal Panktiyan....

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  20. स्पष्ट सन्देश देती उम्दा रचना। स्वयं को जलाकर रौशनी देने वाली बाती ही अहम् है।

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  21. दिया तो बाती से ही है---- गहरे भाव लिये सुन्दर रचना।

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  22. क्या कहूं, बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना

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  23. गहन अभिव्यक्ति सन्देश देती उम्दा रचना...

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