गुरुवार, 30 मई 2019

लघुकथा : बबूल

लघुकथा : बबूल

अपनी ही धुन में मग्न बिना कुछ भी देखे वो ख्यालों के सुर ताल पर थिरकती सी आगे बढ़ती जा रही थी । अनायास ही जैसे कँटीले गुंजल में उलझ गयी वो । अपने हाथों और पैरों पर छिटक आयी ,लहू की लालिमा को देख ,अपना रास्ता रोके बबूल की झाड़ियों से शिकायत कर बैठी ,"सब सच ही तुम्हारा तिरस्कार करते हैं । हर जगह काँटे ही काँटे भरे हैं तुममें तो । इससे तो अच्छा था कि किसी फूल या फल वाली पौध लगाई गई होती ।"

इतनी तिरस्कार भरी बातें सुन कर ,एक पल को बबूल का पेड़ भी सहम कर दुखी हो गया । परन्तु अगले ही पल वो आत्ममंथन करता सा अपने बारे में और खुद से दूसरों की शिकायतों के बारे में सोचने लगा  ...

पूरा जीवन बीत गया यही सुनते सुनते कि"बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होये "...

वैसे सच ही तो है कि जो बोओगे वही तो फसल होगी ! पर किसी को भी इस तरह हीनता से सम्बोधित करना सही है क्या ?

मानता हूँ कि मुझ में काँटे बहुतायत में होता हैं ,पर ये भी तो सच है कि मेरी कोई विशेष देखभाल भी नहीं करनी पड़ती । न तो पानी डालते हो तुम सब और न ही खाद ,तब भी मैं जिजीविषा का प्रतिरूप बन पनप जाता हूँ।

तुम सब को मेरे काँटे दिखते हैं पर मेरे औषधीय गुण की चर्चा भी नहीं करते ... पर हाँ जब जरूरत होती है मेरी पत्ती, छाल सब ले जाते हो ... बेशक काँटे मुझमें तब भी रहते हैं ,पर शायद जरूरत उन पर ज्यादा भारी पड़ जाती है । मुँह के छालों में ,घाव भरने में ,रक्त रिसाव रोकने में ,झरते बालों को रोकने में ,आँख की बीमारियों में ,पसीना रोकने में ... कहाँ तक गिनाऊँ अपने औषधीय गुण । सब छोड़िये दातुन करने में नीम से अधिक प्राथमिकता मुझे ही मिलती है । कभी कभी कुछ नुकसान भी हो जाता है पर कारण औषधि बना कर गलत मात्रा में सेवन करने से होता है ।

सब बातें छोड़ भी दें तो घर की ,खेतों की बाड़ बनाते समय तो बड़ी ही बेदर्दी से मेरी ही डालियाँ काट ले जाते हो तुम सब ।

शायद मेरी स्थिति परिवार के उस अभिभावक सी है जिसके परिश्रम और ज्ञान का लाभ तो सब लेना चाहते हैं पर उसकी डाँट मेरे काँटों जैसी चुभती है ।
                                                   .... निवेदिता

मंगलवार, 28 मई 2019

लघुकथा : आत्मबल

लघुकथा : आत्मबल

माँ : "अन्विता रात हो रही है अकेले मत जाओ ... जाना जरूरी हो तो भाई या अपनी किसी सहेली को साथ ले लो ।"

अन्विता : "माँ समस्या चुनाव की नहीं है कि सहेली को साथ लूँ या भाई को । दूषित विचार को वो मेरा भाई नहीं लगेगा और फब्तियाँ सुननी पड़ेगी ... और अगर दोस्त के साथ जाऊँगी तो उनकी जुगुप्सा को एक की जगह दो के मानसिक और शाब्दिक चीरहरण के अवसर मिलेंगे । जब भी अकेली लड़की दिखती है तो सब फब्तियाँ कसते हैं ,पर वही लड़की अगर अकेली किसी दुःशासन के सामने होती है तब वो उनको दिखाई ही नहीं देती ... या कह लूँ कि वो उनके लिये अवसर होती है या फिर अदृश्य ... वैसे भी मैं कराटे क्लास में जा रही हूँ जहाँ जाने के लिये साथ से अधिक जरूरी आत्मबल होता है ।"  .... निवेदिता

मंगलवार, 21 मई 2019

लघुकथा : चाभी

लघुकथा : चाभी

आंटी के पास बैठी मैं उनको देखती ही रह गयी । किसीको दुलराती ,किसीको धमकाती ,किसीको छेड़ती गुदगुदाती तो किसी को डाँटती एकदम मन मस्तमगन झूम रही थीं । आखिर मुझसे नहीं रहा गया तब पूछ ही बैठी ,"आंटी आपकी डाँट का भी कोई बुरा नहीं मान रहा है । आपके पास से सब हँसते हुए ही जा रहे हैं , वो भी तब जबकि ये आपके परिवार से भी नहीं कि लिहाज करना मजबूरी हो । ऐसे कैसे सबको सहेजे हैं आप ... !"

आंटी मुक्तमना हँस पड़ीं ,"अरे ऐसा कुछ नहीं मुझमे ... बस ये सब मुझे अपने मन के ताले की चाभी मानते हैं । जानती हो कभी कभी ताला खोलने के लिये अपनी ही विवेकरूपी चाभी बेकार हो जाती है तब डुप्लीकेट चाभी बनवानी पड़ती है न । उस प्रक्रिया में ताले को कई बार ठोकर भी लगती है ,पर जब चाभी बन जाती है तो ताला भी बेकार होकर फेंका नहीं जाता । उसकी उपयोगिता बनी रहती है । मैं इनसबके लिये यही काम करती हूँ । ये सब निःसंकोच होकर मुझसे हरबात करते हैं । उनकी आधी समस्या तो बताते ही खत्म हो जाती है और बाकी उनका ही शांत हो चुका मन सुलझा देता है । मैं तो उनके लिये एक ऐसा मजबूत चौखट में जड़ा व्हाइटबोर्ड हूँ जिसपर उनका विश्वास है कि उनकी बात मुझ तक ही रहेगी । "
-- निवेदिता

सोमवार, 20 मई 2019

सखी अकेले न तुमको रहने दूंगी .....



सखी अकेली तुम्हें न रहने दूंगी
धूप के ताप में न जलने दूंगी
तुम्हारे अश्रुधार रोक नहीं सकती
अश्रु न जमीं पर गिरने दूंगी
सखी अकेले न तुमको रहने दूंगी

जलधार का बहना रोक नहीं सकती
दिल की नमी पलको धर लूंगी
दर्द की राह रोक नहीं सकती
दर्द न अकेले सहने दूंगी
सखी अकेले न तुमको रहने दूंगी

तूफानी लहरों को रोक नहीं सकती
पदतल की मिट्टी रेत न बनने दूंगी
तानों की बौछार रोक नहीं सकती
मन ही मन न घुटने दूंगी
सखी अकेले न तुमको रहने दूंगी

पतझर आये जब मन के मौसम में
तुमको न यूँ मुरझाने दूंगी
तुम्हारे साथी को तो न रोक सकी
तुमको न यूँ जाने दूंगी
सखी अकेले न तुमको रहने दूंगी

हँसी तुम्हारे अधरों पर ला न सकी
मुस्कान तो मन मे बसा दूंगी
सखी अकेले न तुमको रहने दूंगी
                ... निवेदिता

शनिवार, 18 मई 2019

लघुकथा : अंगदान




आनिकेत : "क्या हुआ अन्विता ... अब क्या सोचने लगी ... ऑपरेशन बिल्कुल ठीक हो गया और तुम घर भी आ गयी हो ... डॉक्टर ने कहा है न कि तनाव बिल्कुल नहीं लेना है .. बताओ न क्या बात है ... "

अन्विता :"बस ये सोच रही हूँ कि जिसने दिल दान किया है मुझे ,वो कैसा होगा ... उसके घरवालों ने कितना साहस और धैर्य संजोया होगा ये सब करने में । और पता अनिकेत अब मेरे दिल मे एक संकल्प भी आ रहा है कि जिसने अपनी धड़कन देकर हमारे परिवार को कुछ और खुशी भरे पल दिये हैं ,उसके परिवार के लिये हमको  भी कुछ करना चाहिए । साथ ही साथ अंग दान के लिये सबको  जागरूक करना चाहिये । "
                            .... निवेदिता

मंगलवार, 14 मई 2019

लघुकथा : जिंदगी की चाय

लघुकथा : जिंदगी की चाय

चाय इतनी बेस्वाद सी क्यों लग रही है ...
कब से बैठी यही सोच रही हूँ कि चाय पत्ती ,चीनी ,दूध ,अदरख सब तो उसी अनुपात में ही डाला था ,फिर क्या हो गया ! इतना बेस्वाद तो न था अपना हाथ कभी । हमेशा यही सुना और पाया कि ये तो अपने अंदाज से ही सादे से पानी को भी स्वादिष्ट पेय बना देती है ।

अजीब उलझन है ये जिंदगी ... कभी सीधी पगडंडी तो कभी एकदम सरल दिखती पर रेत सी रपटीली ।अनायास भटकते मन को सप्रयास समेटने का प्रयास करती सी वो अल्बम के पन्ने पलटने लगी ...

पलटते पन्नों में जैसे समस्या का समाधान मिल गया ... दो कप चाय बनाने और साथ पीने की आदत थी और आज एक कप बनाई थी । चाय का स्वाद नहीं बदला था ,वो तो उस दूसरे कप की कमी को उसका अवचेतन अनुभव कर अनमना हो गया था ।

उसने खुद को जैसे जगा लिया था कि सर्दियों में अदरखवाली चाय पीती थी ,पर मौसम बदलते ही लेमनग्रास या इलायची चाय में जगह बना अदरख को विदा कर देते थे । ये भी तो मन के समय का बदलता मौसम ही है जो चाय का कप अकेला पड़ गया है । बिछड़े सभी बारी - बारी ,पर चाय तो तब भी बनी ही ... यही जीवन है ।

वो नयी ऊर्जा से भर जिंदगी के प्याले में नया स्वाद भरने चल दी ... निवेदिता

गुरुवार, 9 मई 2019

पहाड़ भी मरते हैं ...

*पहाड़ भी मरते हैं*

आप गए तब सोचती रह गयी
एक चट्टान ही तो दरकी रिश्तों की
अब देखती हूँ
वो सिर्फ एक चट्टान नहीं थी
वो तो एक सिलसिला सा बन गया
दरकती ढहती चट्टानों का

आप का होना नहीं था
सिर्फ एक दृढ़ चट्टान का होना
आप तो थे एक मेड़ की तरह
बाँधे रखा था छोटी बड़ी चट्टानों को
नहीं ये भी नहीं ....

आप का होना था
एक बाँध सरीखा
आड़ी तिरछी शांत चंचल फुहारों को
समेट दिशा दे दशा निर्धारित करते
उर्जवित करते निष्प्राण विचारों को

वो एक चट्टान के हटते ही
बिखर गया दुष्कर पहाड़
मैं बस यही कहती रह गयी
मैं सच देखती रह गयी
पहाड़ को भी यूँ टूक टूक मरते ... निवेदिता

मंगलवार, 7 मई 2019

लघुकथा : जिंदगी का ब्रांड एंबेसडर



माँ : "क्या बिट्टू जब देखो मेरा बैग पैक कर के घुमाने ले चलती हो । मेरी जैसी उम्र में तो पूजन भजन करती हैं सब और तुम हो कि कभी पहाड़ तो कभी समंदर के किनारों पर ले जाती हो । अब इस बार तो हद कर दी तुमने फूलों की घाटी का प्रोग्राम बना लिया ।"

अन्विता :" माँ सबसे पहले तो ये अच्छे से समझ लो कि किसी भी काम को करने की कोई उम्र नहीं होती । जिस काम मे मन को सुकून मिलता हो उसको अपने स्वास्थ्य और परिस्थितियों के अनुसार जरूर करना चाहिए । "
"अब तक अपनी जिम्मेदारियों को निबाहती रही और अपने जीवन का एक पल भी खुद की पसंद का नहीं बिताया । अगर अब भी आप अपनी इच्छाओं को लोकाचार के पीछे दबाती रहेंगी तब आपके साथ ही ये हम बच्चों के साथ भी अन्याय ही होगा । हम अपनी अंतिम साँस तक ख़ुद को माफ नहीं कर पाएंगे ।आप इस परिवार की नींव हैं और अगर हमने इस नींव की अनदेखी की तो न चाहते हुए भी ,अनजाने में ही सही पर नींव दरक जाएगी और ये इमारत नहीं बचेगी ।मुझे पता है कि आपको बागवानी का कितना शौक था पर जब स्थानाभाव हुआ तो अपनी बगिया को हटा कर हमारे पढ़ने का कमरा बनवा दिया था आपने । फ्लैट में आपका शौक रसोई में छोटे छोटे गमलों में सिमट गया था । अब जब आपने इस योग्य बना दिया है तो कि फूलों की घाटी ले जाकर आपके मन और चेहरे पर कुछ पलों को ही सही ,पर उस बगिया की महक तो जी ही सकती हूँ । "
"और हाँ उम्र की बात आप कीजिये ही मत । अब आपको अपने हर शौक को पूरा करना है । खूब घूमिये और सखियों के साथ इतने जोर के ठहाके लगाइए कि सब कुछ जिंदगी से भर जाए । हमसब में जिंदादिली भरनेवाली आप को अब जिंदगी का ब्रांड एम्बेसडर बनना है ।"
                                       ..... निवेदिता

शनिवार, 4 मई 2019

दर्द और मैं

अक्सर दर्द और मैं
दोनों ही देखते हैं
यूँ ही एक दूसरे को
अक्सर ही हम हँस पड़ते हैं

साथ न तुम छोड़ते न ही मैं
सच बड़ा अजीब सा है ये नाता
दर्द भरी हँसी का
या हँसते हुए दर्द का

तुम को बसेरा दिया दिल में
मैं तो बस हँसी बिखेरती
छुपाये रखती हूँ इस जहाँ से
और जानते हो सब कहते है
आपकी हँसी सच बहुत हसीन है .... निवेदिता