सोमवार, 31 जुलाई 2023

बिखरते परिवार

परिवार सिर्फ़ और सिर्फ़ परिवार होता है, चाहे वो एकल हो या संयुक्त, क्योंकि अपनी सोच के अनुसार ही इन दोनों ही तरह के परिवारों में सब सदस्यों की, रिश्तों की मान्यता रखते हैं। कभी पति , पत्नी और उनके बच्चे ही एकल परिवार कहे जाते हैं, जबकि वो भी अपने पड़ोसियों और दोस्तों को भी पारिवारिक सदस्यों जितना ही सम्मान देते हैं और संयुक्त परिवार जैसे ही अलग-अलग घरों में रहते हैं, तो कभी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के सभी सदस्यों के साथ रहते हुए भी वो स्नेहभाव या कह लूँ कि नेह का जुड़ाव नहीं रहता जो कि संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता और पहचान रहती है। मुझे तो लगता है कि सदस्य कम हों या ज्यादा, बस जिस परिवार में नेहबन्धन बना रहे वही संयुक्त परिवार है।


मुझको परिवार में बिखराव के मूल कारण सिर्फ़ दो लगते हैं ... पहला  अहं की भावना और दूसरी चुप्पी। विवाद को टालने के लिए चुप रह कर सही समय पर कारण न बताने से बात समाप्त नहीं होती है, बस कुछ समय के लिए टल जाती है।

आजकल के अभिभावक बेटे के साथ साथ ही बेटी की शिक्षा के लिए सजग रहते हैं और दोनों को ही जीवन में उन्नति करने के लिए प्रेरित करते हैं और बच्चे हर क्षेत्र में स्वयं को प्रमाणित भी करते हैं। यही प्रतिभाशाली बच्चे, अपने जैसे ही योग्य एवं सामाजिक रूप से समकक्ष जीवनसाथी के साथ जब जीवन के वास्तविक रूप और उसकी दैनन्दिन की चुनौतियों से परिचित होते हैं, तब स्वयं का परिश्रम अधिक दिखाई देता है और अपने हमसफ़र से उनकी अपेक्षाएं बढ़ती जाती हैं कि वो उनको समझे, जबकि अपने कार्यक्षेत्र में दूसरा भी लगभग उतना ही अथवा उससे अधिक परिश्रम भी करता है। यह अपेक्षा एवं अवहेलना, उन के जीवन में शनि की साढ़ेसाती बन कर क्रमशः पसरने लगता है और कभी चुप्पी तो कभी तीखे बोलों की चिटकन गूँजते हुए प्रस्तर प्रहार करती परिवार को बिखेर देती है।

विवाद न हो और बात वहीं समाप्त हो जाये सोच कर, दूसरे पक्ष की चुप्पी भी इन बिखरती दीवारों को और भी बिखरा देती है। किसी भी गलत्त लगती बात का मुखर और शालीन विरोध मन को भी शान्त कर देता है और सही अर्थों में बात को समाप्त भी, अन्यथा एक ज्वालामुखी मन ही मन धधकता रह जाते है और उस का विस्फोट रिश्ते में कोई भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

रिश्तों के बिखरने के मूल में अहं भाव ही विस्फोटक होता है। वहम तो अहं का सिर्फ पोषण ही करता है।
निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
लखनऊ

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

परिधान और उनका प्रभाव

परिधान में सिर्फ़ ओढ़े अथवा सिले हुए वस्त्र ही नहीं आते हैं, अपितु व्यक्ति के शरीर पर धारण की गई प्रत्येक वस्तु आती है, फिर चाहें वो हाथ में लिया हुआ पर्स हो अथवा सिर पर रखी हुई टोपी, पाँवों में पहने हुए जूते हों या इसी कलाई अथवा जेब में लगाई हुई घड़ी हो। संक्षेप में कहें तो पूरे व्यक्तित्व को परिभाषित करता है उसका परिधान।


परिधान को समय एवं परिस्थिति के अनुकूल होना चाहिए। औपचारिक एवं अनौपचारिक कार्यक्रमों के परिधान अलग होते हैं, जैसे विद्यार्थियों के दीक्षांत समारोह के गाउन और हैट उसी कार्यक्रम के मंच पर ही अच्छे लगेंगे, चुनावी रैली में नहीं। ऊँची हील्स के सैण्डल अथवा जूते शहरों की पार्टी या विभिन्न सम्मिलन में उचित हो सकते हैं परन्तु वही ग्रामीण परिवेश अथवा पहाड़ों पर असुविधाजनक होंगे और हँसी का पात्र भी बना सकते हैं।

परिधान का चयन परिस्थिति एवं अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार ही करना चाहिए क्योंकि यह कत्तई आवश्यक नहीं है कि जो दूसरे पर अच्छा लग रहा है वह स्वयं पर भी अच्छा ही लगेगा और सुविधाजनक होगा। वस्त्र हों अथवा उस की एक्सेसरीज उनको कैरी करने का गरिमापूर्ण तरीका भी व्यक्तित्व को निखार देता है।

व्यक्ति का परिधान, उसके व्यक्तित्व को परिभाषित करता है। देखने से ही आभास हो जाता है कि उस व्यक्ति का परिवेश क्या और कैसा है, साथ ही यह भी परिलक्षित होता है कि वह परिस्थितियों के प्रति कितना संवेदनशील है।
निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
लखनऊ

पलायन : कारण और निवारण

पौधे अपने प्राकृतिक परिवेश में ही ज्यादा पुष्पित एवं पल्लवित होते हैं। स्थान बदल कर अन्यत्र रोपित करने पर अतिरिक्त देखभाल और पोषण ही उनके जीवन को पुनः पुष्ट करता है, परन्तु कभी-कभी बोनसाई बन कर अपनी प्रकृति छोड़ने को विवश भी। इसी तरह हममें से अधिकतर अपने स्थान से ही जुड़े रहना चाहते हैं, वहाँ से हट कर अन्यत्र बसने की कल्पना भी हम को दारुण लगती है। सामान्यतया अपने स्थान पर उपलब्ध संसाधनों में ही हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास करते हैं। परन्तु कभी-कभी आवश्यकताएं इतनी बढ़ जाती हैं कि उनको अपनी सामर्थ्यानुसार संसाधन की तलाश में अपना स्थान छोड़ना ही पड़ता है। एक बार जब अपना स्थान छूटता है तब वापसी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है क्योंकि धीरे-धीरे हमारी सामर्थ्य बढ़ती जाती है और साथ ही महत्वांक्षाएँ भी। अपने स्थान पर वापसी के लिए उनको कोविड जैसी महामारी ही विवश कर सकती है, अन्य कुछ नहीं!


पलायन जैसे रक्तबीज का निवारण / उन्मूलन करने के लिए अपने मूल स्थान पर ही अच्छा और सुविधाजनक जीवन जी सकने योग्य काम मिलना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। यदि बच्चों को अच्छी शिक्षा छोटे से छोटे स्थान पर ही मिल जाये तो बच्चों को अपने पास से दूर भेजना तो कोई माता पिता नहीं चाहेंगे। उच्च शिक्षा के लिए बच्चों को महँगे विद्यालयों में भेजने के लिए, अभिभावकों द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने के लिए महँगे पैकेज की तलाश में बच्चों को अपनी जड़ों को छोड़ना नहीं पड़ेगा।

यदि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति अपने मूल स्थान पर ही होने लग जाये तो अपनी जड़ों को छोड़ कर जाना न तो किसी की चाहत होगी और न ही विवशता।
निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
लखनऊ

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

अपने सपने बच्चों के कन्धे


बच्चे के जन्म लेने से मिली खुशी के सपनीले झोंको से सम्हलते ही, मन स्वयं को ही झूला बना कर कितनी पेंगे भरने लगता है कि अपने हॄदयांश के लालन-पालन में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। उनके लिए आसमान के सितारों को भी तोड़ लाने का हौसला रखते हुए सोचने लगते हैं कि उनकी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहने देंगे। बस इसी क्रम में अपनी कुछ अनावश्यक सी अपूर्ण इच्छाओं की याद आ ही जाती है और हम सोचने लगते हैं कि उन को भी बच्चों से ही पूरा करवाएंगे।

इस सारे सिलसिले में बच्चों के नन्हे कन्धों पर दो बोझ डाल देते हैं, जिसमें से एक की चर्चा बोल के कर देते हैं तो दूसरी दिल की तहों में छुपा कर। हर माता पिता की पहली इच्छा यही होती है कि अन्तिम यात्रा उन बच्चों के कन्धों पर ही हो और दूसरी होती है कि हम अपनी ज़िन्दगी में जो भी नहीं कर पाए, वो सब हमारे बच्चे कर गुजरें। बस सारी गड़बड़ यहीं से प्रारंभ हो जाती है और नन्हे कन्धे बड़े हो कर भी बेताल सरीखा बोझ तले दबे रह जाते हैं।

बच्चे के किसी कलात्मक अभिरुचि एवं ईश्वरीय देन से सम्पन्न होने पर भी माता पिता उनको डॉक्टर, इंजीनियर इत्यादि कोई उच्च पदस्थ अधिकारी बना हुआ ही देखना चाहते हैं चाहें इस प्रक्रिया में बच्चे घुटन अनुभव करें या फिर तरक्की न कर कर पाएं, पर उनको अपने अभिभावकों की चाहतों को पूरा करना ही पड़ता है। जीवनसाथी में जिन गुणों की चाहत उनको होती है अथवा हो सकती है, उससे सर्वथा विपरीत साथी के साथ जीवन बिताना पड़ता है क्योंकि वो उनके अभिभावकों की चाहत होती / होते हैं और वो स्वयं सिर्फ़ अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के साधन।

माता पिता को यह समझना चाहिये कि जितना मुश्किल अपूर्ण इच्छाओं के  बोझ के साथ जीवन जीना कठिन है, उससे कहीं अधिक मुश्किल है कन्धों पर आभासी बोझ ले कर जीवन की चुनौतियों का सामना करना।

माता पिता को अपने अनुभवों के आधार पर मार्गदर्शन करते हुए भी बच्चों को अपने फैसले स्वयं उन बच्चों को ही करने देना चाहिए। वैसे भी ज़िन्दगी का सबसे अच्छा मूलमंत्र यही है कि जियो और जीने दो।

निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

लखनऊ

सोमवार, 24 जुलाई 2023

सती प्रथा क्या सच में बन्द हो गयी है

सती प्रथा के पक्ष और प्रतिपक्ष में, बचपन से ही सुनती और पढ़ती आ रही हूँ। तब इस के विषय में बहुत अधिक, या कह लूँ कि कुछ भी समझ नहीं आता था। बस एक विषय की तरह पढ़ा और परीक्षा में लिख कर फुर्सत पा लेते थे। परन्तु जब समझ में आया कि यह कृत्य कितना अमानवीय है, तब यह सोच कर ही काँप उठती थी। एक जीवित और स्वस्थ स्त्री को सिर्फ़ इसलिए ही जला देना होगा कि उसके पति की मृत्यु हो गई है ... यह मृत्यु भी कभी बीमारी की वजह से तो कभी उम्र की वजह से भी होती थी। उस दौर के अधिक आयु के अन्तर वाले बेमेल विवाह में कभी-कभी पत्नी अबोध बालिका भी होती थी तो पति उम्र के चौथेपन में!


उस दौर में जब सती प्रथा के बन्द होने के बारे में जाना तो कहीं न कहीं एक सुकून मिला कि अब विधवा स्त्री को भी अपनी ज़िन्दगी जीने का अधिकार होगा परन्तु ... इस परन्तु ने फिर से प्रश्न उठाया कि क्या सिर्फ़ पति के साथ, उसकी चिता में उसकी विधवा पत्नी को जलाये न जाने से ही क्या उस स्त्री को जीवन जीने का अधिकार मिलने लगा?

दुःख की बात है कि सती प्रथा नाम के लिए बन्द हो गयी है परन्तु अपना रूप बदल कर प्रत्येक पल विधवा स्त्री को जलाती रही है। यह बदला हुआ रूप कभी परम्पराओं के नाम पर बहुत ही सहज चीजों / बातों से वंचित करने लगा तो कभी आश्रय देने के नाम पर शारीरिक शोषण भी करवाता रहा।

समय के साथ जब शिक्षा का प्रचार प्रसार हुआ तो परिस्थितियाँ थोड़ी सुधरी परन्तु जिसको मानसिक दिवालियापन कहने का मन करता है, ने उनके वैधव्य को उनके उन बुरे कर्मों का परिणाम बता कर दंशित किया जो उनके इस जन्म के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों का परिणाम बताया।

आज की तकनीकी क्रान्ति के युग में भी, बेशक पति की चिता की लपटों में उसकी पत्नी को दैहिक रूप से बेशक नहीं जलाया जाता है, परन्तु प्रतिपल उसको दाहक दंशो के दावानल में जल कर के सती होने को विवश किया जाता है।
निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
लखनऊ

रविवार, 23 जुलाई 2023

पीपल : गीतिका

छाया इसकी कम घनी, कोमलता है पास।

प्राणदायिनी वायु दे, इस में प्रभु का वास।।

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साँस अटकती जब सखी, करे दर्द जब पेट।

छाल छाँव और अर्क सब, बन जाते हैं खास।।

*

विष प्रभाव को कम करे, रस का असर विशेष।

चलती शीतल जब हवा, आती सबको रास।।

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रंग त्वचा का निखरता, झुर्री करता साफ़।

वायु प्रदूषण का  सखे , पीपल करता ह्वास।।

*

पत्ते इसके कम विरल, आते विहग अनेक।

करना ऐसा यत्न है, बना रहे उच्छ्वास॥

*

ब्रम्हा विष्णु महेश प्रभु, करते इसमें वास।

सज्जा करें निवास की, समृद्ध हो आवास।।

*

पूजन अर्चन में सजे, घर का बंदनवार।

परमधाम जो जा चुके, उनका तरु ये ख़ास।।

*

बोधि वृक्ष कहते इसे, पूजन अलग विधान।

दूध धूप दीपक जले, मंत्र का हो अभ्यास।।

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दिवस अमावस सोम हो, करते विधी विधान।

परिक्रमा होती फलित, भरता घर उल्लास।।


निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

लखनऊ

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

गीतिका : कभी मुस्कराया करो ।।

हो सके ख़्वाब बन दिख ही' जाया करो ।

साथ तुम भी कभी मुस्कराया करो ।।


गुनगुनाती रही रात भर बन गज़ल।

साथ तुम भी कभी गुनगुनाया करो।। 


मुस्कराती रही बेबसी रात भर ।

हो सके सच कभी भी बताया करो ।।


साथ मेरे चलो शबनमी रात में ।

मैं बनूँ चाँदनी तुम सजाया करो ।।


साथ बेरहम हो कर भुलाना नहीं ।

भाव जो मन बसे ना छुपाया करो ।।


चल चलें साथ भी अब रुलाने लगा ।

दो कदम साथ 'निवी'  निभाया करो ।।

         

बेसबब चल दिये  तुम इस जहान से ।

निभ सके तो  'निवी' तुम निभाया करो ।।

  

         ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

गुरुवार, 6 जुलाई 2023

चाँद

चाँद बहुत उदास दिख रहा था

उजले और स्याह में भटक रहा था !


चन्द रेशे चुन लायी उम्मीदों के 

पिरो दिया उनमें सुनहले ख्वाबों को !


पलट कर देखना कभी 

चाँद भी अब इंद्रधनुष में हँसता है !


कुछ लम्हे चुभेंगे मन के पाँव में 

भटकेगा मन अपने बसाए गाँव मे !


रेशे सी किरच छलक उठी थी

चुभन हुई पलकों की छाँव में !


चाँदनी ने सरगोशियों में कहा

चाँद भी अब इंद्रधनुष में हँसता है ! 

#निवेदिता_श्रीवास्तव_निवी 

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