रविवार, 24 सितंबर 2017

दीवारें ........





दीवारों की भी कई किस्में होती हैं 
दीवारें खींचती हैं कुछ रेखायें
इधर सोना है तो उधर खाना खाना 
इस तरफ चप्पलें रखना 
पर हाँ उस तरफ बिल्कुल न ले जाना 
चलो इस छोटी रेखा के इधर पूजा कर लूँगी मैं
तुम उस बड़ीवाली रेखा के पार दोस्तों को बैठाना
सपनों सी होती हैं ये दीवारें
कभी अपनों सा समेट लेतीं हैं
कभी बेगानों सा दूर ढ़केल देतीं हैं
ये दीवारें सच बड़ी दिलफ़रेब होती हैं
..... निवेदिता