रविवार, 17 जनवरी 2021

ज़िन्दगी और बाग़वानी

 ज़िन्दगी का हर आता जाता पल और उसके अनुभव बदलते मौसम की बागवानी का एहसास कराते रहते हैं । कभी सब कुछ सही तो मन बसन्त अनुभव करता ,नहीं तो लू के थपेड़े सा झकझोर जाता है । मन खुश तो गुलाब की खुशबू ,नहीं तो काँटे की चुभन । 


बावरा मन ऐसे ही किसी लम्हे में ज़िन्दगी को बानी जैसा समझने लगता है । वैसे सच कहूँ तो जीवन का चक्र व्यक्ति का हो या पौधों का एक सा ही लगता है । वैसे ही गर्भ में जीवन का अंकुरण ,चन्द मुस्कराती पत्तियों की झलक से ठुमकते क़दम और उन डगमगाते कदमों को गिरने से बचाने के लिए बड़ों की सलाह रूपी बाड़ । कभी वो बाड़ काँटे चुभोती तो कभी उस पर अंदर से ममता के लेप जैसी किसी नरम गुच्छेदार लता की परत । माली जैसे कुछ आदतों को तराश कर हटाना ,तो कुछ को उनकी प्राकृतिक प्रकृति से सर्वथा विपरीत किसी अन्य आकार में ढाल देना मानो एक चित्रकार के हाथों में डॉक्टरों वाले उपकरण थमा देना ... क्योंकि माली उस पौधे को उस आकार में ही देखना चाहता है अन्य कुछ हुआ तो सब बेकार !

पौधों की एक बहुत अच्छी विशेषता होती है कि किसी सूखते हुए और फल न देने वाले पौधे के पास यदि किसी फलदार पौधे को रख दिया जाए तो पहले का सूखता हुआ पौधा भी लहलहा उठता है । ज़िन्दगी को बाग़वानी का पर्याय माननेवाले हम ,असली जीवन में यह भूल जाते हैं और कभी नज़र का अंदेशा जता कर तो कभी टोक लगने का डर बता कर परेशानहाल व्यक्ति को और भी उपेक्षित करते रहते हैं ,जो सर्वथा गलत्त है ।

एक चीज़ मुझे और खलती है कि पौधों को समुचित दूरी बना कर रखा जाए या एकदम झुण्ड बना कर ,उनमें आनेवाले फूलों की खुशबू कभी कम नहीं होती ,न ही उनका सौंदर्य । असल ज़िन्दगी में रिश्तों के बीच स्पेस की चाहत इस हद तक बढ़ जाती है कि उनकी पहचान ही विस्मृति के गर्त में डूब जाती है । यहाँ पर भी ज़िन्दगी और बाग़वानी थोड़ा अलग से होते जाते हैं ।

अन्त में मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगी कि सिर्फ जीवन के प्रारम्भिक दिन ही बागवानी से साम्यता रखते हैं ,फिर धीरे - धीरे दोनों की मूल प्रकृति अलग होती जाती है और हम आदर्शवाद की दुनिया मे विचरते 'करना चाहिए' की बात करने के लिये साम्यता देखने और दिखाने लगते हैं । यदि हम ज़िन्दगी और बागवानी को एक कहना और समझना चाहते हैं तो हमको एक - दूसरे को सकारात्मकता देने की दिशा में भी सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये । 

ज़िन्दगी आती हुई साँसें हैं और बाग़वानी जीवन शैली !
                                          ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी