गुरुवार, 23 जून 2011

मैं तारा ....बाली की पत्नी या फ़िर सुग्रीव की या फ़िर ......

 ये कैसी विडम्बना है ,
ये कैसा उद्वेलन है .......
अपने प्रश्नों के ही घेरे में ,
क्षत-विक्षत अंतर्मन है !
कैसे परिचय दूँ ? नहीं-नहीं 
ये कैसी आप्त पुकार है ,
क्या दूँ अपना परिचय !
तथाकथित अपनों से ,
गयी हमेशा छली .......
मैं एक नारी ,तारा ,
विवाह बाद कहलाई 
बाली की पत्नी ........
बाली - सुग्रीव युद्ध में ,
सुग्रीव की विजय और 
बाली के पराभव  का फल ,
बना दी गयी सुग्रीव की वधु !
दो पुरुषों के जय-पराजय का 
परिणाम भुगतने को  ,
अभिशप्त क्यों है नारी ......
शायद ऐसे  ही सरमा भी 
तड़पी होगी जब ,
सुग्रीव हुआ पराजित और 
विजय के चिन्ह सा बाली ने 
किया उससे विवाह ........
सच मानवता भी कलंकित हुई 
हमारे रिश्तों की भूलभुलैया में !
शायद मेरा परिचय सिर्फ इतना है ,
मैं हूँ अंगद की माँ.......
शायद नारीत्व सिर्फ माँ के रूप में ही ,
अनुशंसा पा सुरक्षित है ...........
अन्यथा तो नारी मात्र एक साधन है ,
गुमान या नफरत दिखाने का ,उसमें 
ना तो दिल है ,ना ही दिमाग ,वो तो है 
फकत एक नश्वर शरीर ............
                                  -निवेदिता


38 टिप्‍पणियां:

  1. prashna anuttarit nahin hai, tara ko sirph maan ke roop men jane jo usaka shashvat satya roop hai. patni to badal dete hain ya phir usaka darja kisi aur ko dekar patni bana lete hain lekin janani na kabhi badali ja sakti hai aur na hi usaka koi vikalp hai. isa liye nari ka parichay maan ke roop men shashvat hai.

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  2. शायद ऐसे ही सरमा भी
    तड़पी होगी जब ,

    सरमा का अर्थ समझ नहीं आया ...

    तारा के माध्यम से नारी की भावनाओं का सटीक चित्रण किया है ..बहुत अच्छी प्रस्तुति ..ऐसे प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं

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  3. नारी एक शक्ति है। बल है, संबल है।
    कविता के माध्यम से व्यक्त आपके आक्रोश द्वारा समाज की मनोवृत्ति दर्शाया गया है।

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  4. आप सभी विद्वमित्रों का आभार !

    @प्रवीण जी ,मेरे प्रश्न का उत्तर अन्तिम पंक्तियों में ही है ,जिसको रेखा जी की भी सहमति मिल गयी .....आने का धन्यवाद !

    @संगीता दी ,सरमा सुग्रीव की पत्नी का नाम है .....सादर !

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  5. नारी मन की को समझाने -समझाने में समर्थ

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  6. तारा के माध्यम से नारी की विवशता का मार्मिक चित्रण ..

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  7. गहन भावों के साथ ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  8. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (25.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  9. नारी मन की अन्तर्व्यथा का सटीक चित्रण किया है।

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  10. सच मानवता भी कलंकित हुई
    हमारे रिश्तों की भूलभुलैया में !
    ........shayad yahi uttar hai.
    Ek utkrisht aur marmik prastuti. Abhar!

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  11. निवेदिता ..शुक्रिया ... सुग्रीव की पत्नि का नाम ज्ञात नहीं था ..

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  12. दी ,आपका स्नेह और आशीष मिल गया :)

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  13. नारी का दर्द हर युग में काल में एक सामान ही रहा ... गहन पीड़ा को शब्द दिए आपने !

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  14. विडम्बना है कि नारी को सम्पत्ति समझा गया

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  15. नारी को साधन बना दिया गया है सदियों से,कभी दूसरे बनाते हैं तो कभी वह स्वयं बनती है !
    सुंदर भाव !

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  16. क्या कहूं कविता की शुरुआत ही बहुत बेहतर है। समझ में आ गया कि किस ओर जा रही है कविता। बहुत बढिया..

    ये कैसी विडम्बना है ,
    ये कैसा उद्वेलन है .......
    अपने प्रश्नों के ही घेरे में ,
    क्षत-विक्षत अंतर्मन है !

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  17. बहुत ही सुंदर कविता !
    ....और बहुत ही गहरे भाव !

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  18. बहुत सुंदर रचना और इस रचना के माध्यम से जो प्रश्न उठाये है बेहद गंभीर है. गहरे भाव की सुंदर कविता.

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  19. नारी तो मां, बहन, पत्नी के अलावा निवेदिता के नाम से भी जानी जाती है ना :)

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  20. उद्वेलित होने को मजबूर करती प्रभावशाली प्रस्तुति - कुछ-कुछ विश्वास जग रहा है कि तस्वीर बदलेगी.

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  21. हर युग ,हर काल में यही कथा-यही व्यथा ,न जाने कब तक दोहराई जाएगी ..?????????

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  22. सटीक प्रश्न उठाती सुन्दर कविता.

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  23. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 28 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच-- 52 ..चर्चा मंच

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  24. बहुत ही अच्छा और बढ़िया लिखा है |

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  25. जरुरत है स्त्री-विमर्श में ऐसी प्रभावी सृजन का ,/ सार्थक गंभीर मनोभाव लिए चिंतन को आभार जी .. /

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  26. वास्तव में नारी के पास दिल भी होता है और दिमाग भी, नश्वर शरीर तो सबका ही है फर्क़ इतना ही है कि पुरुष प्रधान समाज हमेशा नारी को दबाता रहा है और आज भी तथा अतीत में भी नारी अपने कुचले जाने के भाव को स्वीकार कर लिया है न जाने क्यों? शायद मजबूरी वश...नहीं यह मज़बूरी कैसी? तो स्वार्थ? या अकर्मण्यता? अथवा यह सब? जो भी हो आज की नारी जो अपने को बहुत आत्मबली मानती है उसके भी अन्दर कहीं न कहीं उसका डर सम्मान पाने की लालसा अथवा दिखावापन अथवा उसकी भीगवादी जीवन शैली ही उसके दमन का कारण है। नारी ने अपने को साधन मान लिया है इसी में वह अपना सुख तलाश रही है जो कि नहीं होना चाहिए। यह तो रहा मेरा उद्रार।
    आपकी यह रचना बहुत ही सुन्दर और विचारणीय है। बधाई

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  27. नारी मन की ब्यथा को ... सार्थक प्रश्नों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है आपने इस भावपूर्ण रचना में ...बहुत सुन्दर रचना......

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  28. पौराणिक सन्दर्भों के उद्धरण से संदर्भों की एक पुनर्रचना हो जाती है !
    अच्छी कविता ..जो भूल बालि की थी वही सुग्रीव ने भी की ...मगर राम भक्त हो जाने के कारण सुग्रीव् क्षम्य हुए ..
    हाँ नारी की नियति वही रही ....

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  29. इस प्रश्न का शायद कोई उत्तर है ही नहीं ...आज तो नारी मन के भावों का बहुत ही सुंदर शब्दों में सटीक चित्रण कर दिया आपने दी...

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