रविवार, 5 जून 2011

शब्द सारे नि:शब्द हैं ..............

  
शब्द सारे नि:शब्द हैं ,
स्वर सभी खामोश हैं ,
भावनाएं अवाक हैं ,
आत्मा भी स्तब्ध है ,
ये कैसी आज़ादी ,
ये कैसा देशप्रेम है !
प्रशासन के विकृत ,
आतंक के सामने ,
निर्जीव हर तंत्र है ,
हमारा कसूर क्या ,
सिर्फ यही है कि ,
हम भारतीय हैं !
हमारे पार्श्व-रक्षक ,
ना तो अमरीका है ,
और ना ही पाक है ,
अपने ही घर में ,
दुत्कार दिए जाने को 
विवश राष्ट्रभक्त हैं !
त्रासदी तो यही है ,
ये आतंकी ही हमारी  ,
सता में नीति-निर्धारक हैं,
हमला चाहे मुम्बई में हो ,
या फिर संसद में ,
आरोपितों के स्वत:ही ,
प्रमाणित अपराधों पर ,
लम्बी बहसें होती है ,
जेल की कोठरी भी ,
फाइव स्टार होटल सा ,
सजाई जाती है ,
ऐसा दोगला व्यहार क्यों !
विचारों की भिन्नता ,के 
विरोध का प्रकटीकरण ,
इतना वीभत्स क्यों ....
शायद यही हमारे ,
तथाकथित प्रजातंत्र के ,
अवसान की शुरुआत है !



33 टिप्‍पणियां:

  1. सच ही आज नि:शब्द हो गए हैं और लग रहा है कि
    तथाकथित प्रजातंत्र के ,
    अवसान की शुरुआत है !

    मन कि भावनाओं को सटीक शब्द दिए हैं

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  2. सही कहा है आपने, यह प्रजातंत्र के अवसान की शुरुआत है।

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  3. विचारों की भिन्नता ,के
    विरोध का प्रकटीकरण ,
    इतना वीभत्स क्यों ....
    शायद यही हमारे ,
    तथाकथित प्रजातंत्र के ,
    अवसान की शुरुआत है !


    बहुत सुंदर लिखा है निवेदिता जी ..
    एक एक शब्द ..सटीक ...दिल की गहराइयों में उतर गया है ..!!

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  4. यही तो रोंगटे खड़े कर देने वाली हमारी गति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भद्दा मज़ाक , बेहद प्रभावशाली रचना बधाई

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  5. एक अच्छी परिभाषा ...खोज

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  6. शब्द सारे नि:शब्द हैं..
    title in itself speaks a lot..
    lovely work.

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  7. शब्द सारे नि:शब्द हैं ,
    स्वर सभी खामोश हैं... such me apne bhut hi gambhir prashn kiya hai... jawab ke liye shabd bacte hi nhi hai..

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  8. acche sabdo ka prayog kiya hai aapne
    mere blog par bhi aaye aane ke liye ye rahi link -"www.samrat bundelkhand.blogspot.com"

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  9. यह काव्य प्रस्फुटन तो होना ही था -संवेदनाओं से जुडती उन्हें महसूस करती कविता !

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  10. ये राजनेताओं की वजह से है ... सबको एक साथ उतना होगा ... फिर से क्रांति की ज़रूरत है ...

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  11. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  12. बिल्कुल सही कहा है आपने, पर हम सब अपना कर्तव्य निभायें, तभी बदलाव आयेगा,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  13. bhut sahi likha hai apne nivadita ji
    vikasgarg23.blogspot.com

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  14. अपने घर में बेघर होने जैसी मन की व्यथा को शब्द दिए आपने ...

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  15. utkrsht kavy ka darshan...
    abhibhut kar gaya . sadhuvad ji .

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  16. ये घटना स्तब्ध और निशब्द कर देने वाली ही है। हमारे देश में जहाँ संस्कारों की दुहाई दी जाती है , वहां सोयी हुयी निर्दोष जनता के साथ ऐसी बर्बरता? आँसू आ गए इस पतन को देखकर।

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  17. कोई शब्द नहीं..कुछ कहने को नहीं...

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  18. सद्भावनाओं का अच्छा प्रस्फुटन

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  19. हम सभी स्तब्ध और निशब्द हो जाते हैं....

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  20. शायद यही हमारे ,
    तथाकथित प्रजातंत्र के ,
    अवसान की शुरुआत है !

    सच में सभी स्ताब्ब्ध हैं...आपने हर दिल की आवाज़ को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं..आभार

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  21. आरोपितों के स्वत:ही ,
    प्रमाणित अपराधों पर ,
    लम्बी बहसें होती है ,
    जेल की कोठरी भी ,
    फाइव स्टार होटल सा ,
    ....बहुत सुंदर लिखा है निवेदिता जी

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  22. कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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