शुक्रवार, 3 जून 2011

बाल - श्रम




आज सुबह सुबह घंटी की झंकार ने, 
मेरी उनींदी सपनीली आँखे खोली ,
देखा तो सामने एक लडकी खड़ी थी ,
काम की तलाश में पुकारती ,मैंने पूछा 
क्या काम कर पाओगी तुम तो हो इतनी छोटी ,
उसने कहा जो भी आप कहें कर लूंगी ,
घर की सफाई ,या फिर बर्तनों की धुलाई ,
रोटी ही बनवा लें ,या कपडे संवरवा लें !
उसकी अवस्था देखती मैं कुछ कह पाती 
तभी कुछ शोर सा सुन वो बाहर को भागी ,
मैं भी थी उसके पीछे-पीछे ,देखा दो-तीन बच्चे 
खाने को छीनाझपटी सी कर रहे थे ,
मैं अवाक उन्हें देखती ही रह गयी,
उसने उनका झगडा सुलझाया ,मेरी प्रश्न भरी 
निगाहों से नज़रें चुराती किसी तरह बोल गयी ,
"हाँ ! मेरे ही बच्चे हैं ये......."
मैं अवाक उसको देखती ही रह गयी  ,
खिलौनों से खेलने की नन्ही सी उम्र में ,
अपने ही बच्चों की उंगलियाँ थामे उनके 
बचपन को बचाने की चिंता में ,
कम उम्र में ही प्रौढ़  होती गयी  ,
मैं नि:स्तब्ध इसका कुछ भी समाधान निकाल पाने में 
असफल हो रही थी .................
अनायास ही मैंने कहा चलो कहीं तुम्हारे लिए  काम 
खोजती हूँ ,पर एक शर्त है ,काम सिर्फ 
तुम करोगी और बच्चों को स्कूल भेजोगी ....
अपने जैसा उनको न बनाओगी ,और 
उनका विवाह इस बचपन में भूल के भी न करोगी
अपने माँ बाप जैसा पाप तुम न करोगी ........   
अब उस की निगाहें थी प्रश्न भरी  ,
शायद मुझ को वो समझ ही नहीं पायी ,
या कहूं मैं ही उसको समझा नहीं पायी !!!
                                            -निवेदिता    

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा संदेश देती रचना।

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  2. गहरी सोच से ओतप्रोत रचना बधाई

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  3. क्या होगा भविष्य का? बड़ा ही चिन्तनीय विषय, दमदार प्रस्तुति।

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  4. shuru mein prashn hi ubharte hain , unke jeene ke dhang me aisi tabdili ... unhen bhi waqt lagta hai

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  5. आखिर क्यों माँ-बाप अपने बच्चों को मज़दूरी करने भेज रहे हैं बहुत से कारक हैं इसके जिनके लिये हम ही मुख्य रूप से ज़िम्मेदार हैं.
    बहरहाल कविता के माध्यम से बहुत अच्छा सन्देश दिया है आपने.

    सादर

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  6. kyun hota hai hai aisa...par sirf kyon tak hi kyon???
    kyun nahi ham uske samadhan ki aur soch pate hain...

    behtareen prastuti....
    agar aapne aisa kuchh bhi kiya to shat shat naman...!

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  7. कटु सत्य को कहती अच्छी रचना ...उनको जीने के लिए यह सब करना उनकी मजबूरी होती है

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  8. उफ़ ……………एक कडवी सच्चाई को बखूबी प्रस्तुत किया है…………जहाँ आकर हम सब निशब्द हो जाते हैं।

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  9. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
    स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

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  10. harsh reality !!
    innocent kids forced to do such acts.. what a pity.

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  11. असफल हो रही थी .................
    अनायास ही मैंने कहा चलो कहीं तुम्हारे लिए काम
    खोजती हूँ ,पर एक शर्त है ,काम सिर्फ
    तुम करोगी और बच्चों को स्कूल भेजोगी ....
    अपने जैसा उनको न बनाओगी ,और
    उनका विवाह इस बचपन में भूल के भी न करोगी
    अपने माँ बाप जैसा पाप तुम न करोगी ........
    अब उस की निगाहें थी प्रश्न भरी ,
    शायद मुझ को वो समझ ही नहीं पायी ,
    या कहूं मैं ही उसको समझा नहीं पायी !!!
    gahri soch sunder abhivyakti
    rachana

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  12. वाकई निःशब्द...जबरदस्त रचना.

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  13. मन को हिला गयी ये रचना ...
    विवशता प्रकट करती सुंदर अभिव्यक्ति ...!!

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  14. बहुत मार्मिक...बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..

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  15. दिल को छू लिया आपकी लेखनी ने ....बहुत खूब

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