मंगलवार, 11 जनवरी 2011

" इन्द्रधनुषी पल "

खुशियों भरे ये पल
इन्द्रधनुष से
झांकते बादलों से ,
माँ की गोद से
झांकते लाडले की तरह !
छुपा लूँ ...
हर निगाह से ,
लगा न दे कोई नज़र ,
कर न दे कोई
टोटका कहीं !
आज होना था
मेरे पास मेरी माँ को !
छुपा लेती मुझे
आंचल में  अपने ...
छा जाती मुझ पे
इक ढ़ाल की तरह !
रोक लेती इन पलों को
मेरे लिये ......
मेरी खुशियों पर
लगा जाती इक
नज़रटीका ...
मैं निभाती अपना फ़र्ज़
ले जाती इन सुख भरे पलों को
विरासत जैसे
अपने दुलारों तक ,
माँ होने का हक निभाती ,
और बन जाती मैं भी
इक नज़रटीका
अपने लाडलों का !
सहेज लेती इस
इन्द्रधनुषी खुशीको
अनन्त युगों के लिये !

9 टिप्‍पणियां:

  1. मर्मस्पर्शी एवं भावपूर्ण कविता.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. माँ होने का हक निभाती ,
    और बन जाती मैं भी
    इक नज़रटीका
    अपने लाडलों का !
    सहेज लेती इस
    इन्द्रधनुषी खुशीको
    अनन्त युगों के लिये !

    sundar abhivyakti

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर ...और सच से रूबरू करती सरपट दौड़ती है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. खुबसूरत एहसासों को समेटे हुई रचना !
    अच्छा लिखा है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदत.......मुस्कुराने पर
    किस बात का गुनाहगार हूँ मैं....संजय भास्कर
    नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  6. बच्चों के लिए माँ अंधविश्वासी भी हो जाती है ..खूबसूरत रचना

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह!!! एक नया अंदाज़ और अभिलाषा

    उत्तर देंहटाएं