बुधवार, 5 जनवरी 2011

"राम"नहीं "कृष्ण".....

हां ,ये सच है
चाहत राम की नहीं ,
चाहत तो है ...
बस कॄष्ण की !
राम तो करेंगे
पालन बस मर्यादाओं का !
कृष्ण आयें तो
वो सोचेंगे .....
मन की ,मान की..
राम की सीता बनने से .
अच्छा है ,सच में...
कृष्ण की बनूँ ...
 रुक्मणी न भी बनूँ
राधा बनने में भी है मान !
सीता बनने पर तो ..
मिल जायेगा वनवास
धोबी भी करेगा उपहास....
राधा बनने से ही
बन जाऊं मुरली कान्हा की !
राम भी गलत बस इतने ही हैं...
सबकी सोचा ,बस भूले अपना ही जीवन...
इसीलिये सीता को निकाल दिया
पर सिर्फ़ ,घर से ही
मन से तो निकाल ना पाये !
बस इसीलिये चाहत है पाऊँ...
कॄष्ण को ही .......
भूल कर भी ना आना तुम राम ..
कॄष्णमयी हो कर रहूँ ..
मन में ,घर में जन जन में ......
डरती हूँ राम तुम्हारे धनुष से..
भाती है कान्हा की मुरली.....
तो बस राम नहीं  कृष्ण ............

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेममयी रचना सोचने को भी मजबूर करती है.

    सादर

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  2. वाह निवेदिता जी , बहुत सुंदर /
    आज के नारी मन का सुंदर चित्रं

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  3. Nivedita ji sundar rachna he padh kar to sab ladkiya Krishna bhakt banna chahengi... Really nice work. :)

    Thanks,
    Nilesh Shukla

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  4. बबन पाण्डेय जी ,प्रिय यशवन्त और निलेश अभार !
    ॒॒निलेश जी लडकियां चाहे जिसकी भी भक्त बने ,आज के लडकों को राम में कान्हा के गुण -नारी को मान देना सीख लेना चाहिये!

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