मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

नदिया के दोनों किनारे ...........


नदिया के दोनों किनारे ,
साथ चलते-चलते भी ,
अलग-थलग ही रहते ,
दोनों के बीच सोच जैसी, 
जलधार उमड़ती आती ,
जब-जब धारा सकुचाती, 
किनारे उमगते-किलकते ,
सोचते पास आने को ,
पर ये क्या धारा में तभी ,
आ जाती बाढ़ सी ,
फिर ..................
पास आने की आस रखते , 
दोनों किनारे फिर छिटक जाते, 
दूरी अनवरत चलती जाती, 
विलगाव जब ज्यादा पीड़ा देने लगा ,
किनारों ने फैलायीं बाँहे,
मन के ,सोच के मिलाप सा ,
मिली बाँहों ने स्नेह का पुल बनाया, 
पुल ने न सिर्फ उन्हें ,
कई बिछड़ों को भी मिलाया ..................
                              -निवेदिता 



10 टिप्‍पणियां:

  1. किनारों को पुल ही जोड़ता है, पुल में अपनी ओर से आग न लगायी जाये, बस।

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  2. @प्रवीण जी ,
    मैने किनारों में ही पुल बनने की कल्पना की है ।दूसरों के बनाये हुए पुल तो टूट ही जाते हैं .....

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  3. निवेदिता जी , एक बेहत खूबसूरत इमगिनतिओन को स्थान दिया है आपने इस कविता में । वो किनारे जिनके मिलने की गुंजाइश न हो , उन्हें भी मिला दिया। बेहतरीन।

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  4. विलगाव जब ज्यादा पीड़ा देने लगा ,
    किनारों ने फैलायीं बाँहे,
    मन के ,सोच के मिलाप सा ,
    मिली बाँहों ने स्नेह का पुल बनाया,
    पुल ने न सिर्फ उन्हें ,
    कई बिछड़ों को भी मिलाया ..................
    bahut sundar

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  5. बहुत बढ़िया संकेतात्मक कविता....बढ़िया चित्रण...

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  6. किनारों ने फैलायीं बाँहे,
    मन के ,सोच के मिलाप सा ,
    मिली बाँहों ने स्नेह का पुल बनाया,
    पुल ने न सिर्फ उन्हें ,
    कई बिछड़ों को भी मिलाया .

    positive and wonderful approach.

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  7. विचारो में शामिल होने के लिये आभार ........

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