मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

डर........क्यों.....

        डर ,खौफ़ ,भय .....कभी सोचा ये है क्या ? सिर्फ एक भाव के लिए अलग -अलग शब्द या कुछ और ,ये भाव है क्या ? डर हमें  सिर्फ तभी
लगता है जब हमारे पास खोने के लिए कुछ होता है | हम सबसे ज्यादा कमज़ोर तब  होते  हैं जब  हमारे  पास हमारे अपने होते हैं | हम  उनका 
 भला  चाहते  हुए  अपनों  के  बारे  में  ही सब गलत सोच जाते हैं | ज़रा 
सा भी  नज़रों से  ओझल हो  जायें  दुश्चिन्ताओं  से  घिर  कर  मन सारे अपशकुनी विचारों से घिर  जाता है  | घंटी  बजने पर घरवालों  के जल्दी  वापस न आने पर वहम होता है कि किसी ने  उन का  अपहरण तो  नहीं
कर लिया | सड़क पर चलने वाला हर  वाहन  खतरनाक लगता है | 
          घर बैठी महिलाएं अपने परिवार की सुरक्षा की कामना  करते  हुए 
उस परम सत्ता ,जिसने  इस सम्पूर्ण  सृष्टि  की  रचना  की  है , से  गुहार 
लगाती हैं | बस यहीं सब संतुलन असंतुलित हो जाता है ,क्योंकि बीच में 
 इश्वर के मध्यस्थ बन के ढोंगी बाबा प्रकट हो जाते हैं |इन बाबा नामधारी 
महापुरुषों का इकलौता काम होता है पहले से ही डरी महिलाओं को  (वैसे डरते तो पुरुष भी हैं)  और डरा कर लाभ कमाना | इस तरह  का अंधविश्वास 
न करने वाली महिलाएं भी ये सोच कर के  ढकोसलों को पूरा कर देती  हैं ,
कि इससे कुछ नुकसान नहीं होगा | एक तरह से देखिये तो ये उनका किसी 
भी प्रकार का अंधविश्वास नहीं ,अपितु अपनों के लिए मंगलकामना ही है |
             अगर इस सबमें सच देखा जाए तो ,इस डर के लिए महिलाओं की 
प्रकृतिगत कोमलता ही दोषी है | वो कोमल  इसलिए भी  हैं  कि वो परिवार और  समाज नाम के कवच से सुरक्षित रखी जाती  हैं | 
             कहा जाता है कि दर्द की इंतिहा ही  उसकी दवा हो जाती  है | इसी प्रकार अगर डराने की इंतिहा हो जाए तो वो शक्ति  रूप में  अपने  बच्चे को अपरहणकर्ता का सामना कर उसे सुरक्षित बचा भी लाती है | महिलाओं की
कमज़ोरी ही उनकी ताक़त भी होती है | परिवार पर कोई संकट आ जाए तो 
उसका सामना करने में वो एक पल भी नहीं लगातीं | 
             ये कहना कि महिलाएं ज्यादा डरती हैं और अधिक अन्धविश्वासी 
हैं ,सच्चाई से  थोड़ा दूर लगता है | वस्तुत: वो  अपनी  हर व्यस्तता में  भी अपने घर- परिवार से अधिक जुड़ी रहती  हैं , इसीलिये  वो  ऐसे अधिकतर कामों को कर लेती जिनसे उम्मीद होती कि कुछ तो भला हो  ही जाएगा |         
           

5 टिप्‍पणियां:

  1. भय तो जीवन का हिसा है....मुझे याद है जब महाभारत के युद्ध में कर्ण को उनके सारथी ने कहा था "आप तो महाबली योद्धा है आपको दर तो नहीं लगता होगा"
    उस पर कर्ण ने मुस्कुराकर उत्तर दिया था...
    "वो काठ के योद्धा होते होंगे जिन्हें दर नहीं लगता."

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  2. डर तो सभी को लगता है पर बाबाओ के चक्कर मे पडना गलत है

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  3. सहमत हूँ आपके विचारों से.

    सादर

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